भारतीय हिन्दी पत्रकारिता में दलित एवं शोषित विमर्श


 

भारतीय हिन्दी पत्रकारिता में दलित एवं शोषित विमर्श

भारतीय समाज का पूर्ण विकास तब तक नहीं हो सकता जब तक उसमें रहने वालों की मूलभूत जरूरतों की पूर्ति नहीं हो जाती है। समाज में असमानता है तो विकास की गति प्रभावित होती है। आज शासकीय प्रयासों एवं योजनाओं के बाद भी समाज में असमानता और सामाजिक स्वरूप में जातीयता का जो उन्माद फैला है, वह अनेक प्रष्न खड़े कर रहा है। हम चाहें जितनी भी प्रगति कर लें, लेकिन आर्थिक एवं सामाजिक असमानता ने भारतीय समाज को विकृत कर रखा है।

भारतीय समाज का जाति तथा उपजाति में बंटवारा कर हमारे प्राचीन विद्वानों ने एक तरह से समाज में विष  फैलाने का कार्य किया। इसी जाति व्यवस्था के कारण हजारों वर्षों से निम्न एवं दलित वर्ग का शोषण  होता चला आ रहा है। इन्हें न तो उचित शिक्षा-दीक्षा दी गयी है

प्राचीनकाल से ही भारतीय समाज में दलितों एवं शोषितों के प्रति विचार सदैव अच्छा नहीं रहा है, उन्हें उपेक्षित और हेय की दृष्टि से देखा गया। अपने को सभ्य और सुसंस्कृत मानने वाली उच्च जातियॉं  इनका मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, राजनीतिक आदि हर तरह से शोष्‍ण किया है। हिन्दू समाज में भी इनका बहुत शोश ण हुआ है । वेदों, पुराणों एवं उपनिश दों में भी इनके प्रति निम्न एवं हीन दृष्टिकोण की बातें पढ़ने को मिलती है।

बदलते सामाजिक परिवेश  के साथ भारतीय हिन्दी पत्रकारिता के सामाजिक स्वरूप में परिवर्तन आया है। आज के युग में पत्रकारिता संवाद का सशक्त माध्यम है। समाज में पत्रकारिता के माध्यम से जन-चेतना फैलाने का सबसे महत्वपूर्ण काम राजा राममोहन राय ने किया है, इसके माध्यम से वे सती-प्रथा, बाल-विवाह, जाति-प्रथा, छुआछूत, ऊॅंच-नीच आदि कुप्रथाओं का विरोध किया। उन्होंने समाज में इस बात का बहुत प्रचार किया कि- ‘‘ईश्‍वर  के यहॉं जाति भेद का कोई स्थान नहीं है। सभी जातियों के व्यक्ति ईश्‍वर की पूजा, आराधना कर सकते हैं।’’1

राजा राममोहन राय के बाद उनके अनुयायियों ने पत्रकारिता के द्वारा कुरीतियों का विरोध तथा जाति-भेद को समाप्त करने का प्रयास और अन्तर्जातीय विवाह को प्रोत्साहित किया। स्वामी दयानंद सरस्वती (आर्य समाज) ने जगह-जगह घूमकर शिक्षा के महत्व बताए। वे महसूस करते थे कि कुछ लोग अपनी श्रेष्ठता कायम रखने के लिए सारे नियम और बंधन बना लिए हैं, इसीलिए ऐसे अंधविष्वासी, पुरातन रीति-रिवाजों से समाज को मुक्त करना है। ‘रामकृष्ण मिशन’ स्थापना का उद्देश्‍य  भी यही है।

महात्मा गांधी ने पत्रकारिता के माध्यम से अस्पृष्यता , ऊॅंच-नीच, जाति-भावना, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक शोषण दूर करने का अथक परिश्रम किया। वे अपने विचारों, भावों, मंतव्यों को ‘यंग इंडिया’, ‘नवजीवन’, ‘हरिजन’ नामक समाचार पत्रों के माध्यम से जनता तक पहुँचाते रहे। उन्होंने अस्पृष्यता  के खिलाफ विशेष  अभियान भी चलाया। वे मानसिक गुलामी से समाज को उबारना चाहते थे। ‘यंग इंडिया’ में वे लिखते हैं- ‘‘यदि हम भारत की आबादी के पॉंचवें हिस्से को स्थायी गुलामी में रखना चाहते है और उन्हें जान बूझकर राष्ट्रीय संस्कृति के फलों से वंचित रखना चाहते हैं तो स्वराज्य एक अर्थहीन युद्ध मात्र होगा। आत्मबुद्धि के इस महान आंदोलन में हम भगवान की मदद की आकांक्षा रखते हैं, लेकिन उसकी प्रजा के सबसे ज्यादा सुपात्र अंश  को हम मानवता के अधिकारों से वंचित रखते है।’’2

महात्मा गांधी नहीं चाहते थे कि भारतीय समाज छुआछूत, अस्पृष्यता, ऊॅंच-नीच एवं जातीय व्यवस्था का शिकार हो, वे अस्पृष्यता  को समाप्त कर समतामूलक समाज के पक्षधर थे। उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से दलित एवं शोषित वर्गों के लिए एक ऐसी जमीन तैयार की, जिस पर वे खड़े होकर जीवन-बसर कर सकें। भारतीय समाज में फैली असमानता को उन्होंने पत्रकारिता के माध्यम से दूर करने का प्रयास किया। गांधी के विचारों से उच्च जातियों के विचारों में परिवर्तन आया जिससे समाज में धीरे-धीरे अस्पृष्यता की भावना कम होने लगी। उन्होंने लोगों से कहा- ‘‘ईष्वर ने किसी व्यक्ति को न छोटा बनाया था, न बड़ा। छुआछूत भारत की एक सड़न है, जिसमें सदियों का कचरा एकत्रित है, उसे समाप्त करना है। साम्राज्य की डायरषाही को मैं शैतानियत कहता हूँ । अस्पृष्यता को भी मैं उतना ही भयंकर शैतानियत मानता हूँ ।’’3 गांधी ने छुआछूत के खिलाफ व्यापक अभियान चलाया, जिसका सुखद परिणाम आज हम देख रहे हैं।

गांधी के बाद डॉं0 भीमराव अम्बेडकर ने पत्रकारिता के माध्यम से दलितों, शोषितों एवं अछूतों के लिए बहुत महत्वपूर्ण कार्य किए हैं। गांधी ने पत्रकारिता के द्वारा समाज के दृष्टिकोण में बदलाव किए, वहीं अम्बेडकर ने जातीय चेतना को जागृत किया, उन्होंने इसे एक आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया। वे राजनीतिक अधिकारों के साथ दलितों को सम्मान जनक स्थान समाज में दिलाने के पक्षधर थे। इसके लिए उन्होंने पत्रकारिता का सहारा लिया। साप्ताहिक ‘मूकनायक’ के प्रथम अंक के संपादकीय में वे लिखते हैं- ‘‘आज जितने भी समाचार पत्र मौजूद हैं। सत्ता और ज्ञान के अभाव में अब्राह्मण तथा दलित वर्ग प्रगति से वंचित है। गरीबी, अयोग्यता और अज्ञान ने विषाल दलित समाज को गहरे गर्त में डाल रखा है।’’4 इस समाचार पत्र में अम्बेडकर ने दलितों-अछूतों-शोषितों की दर्द, वेदना एवं पीड़ा को उजागर किया। उनका उद्देश्‍य  दलितों के लिए संघर्ष करना एवं समाज में फैली अंधविष्वासों, कुरीतियों एवं अत्याचारों को समाप्त करना था। डॉं0 अम्बेडकर ने अपने संदेश  को जन-जन तक पहॅंुचाने के लिए पत्रकारिता का सहारा लिया। उन्होंने ‘मूकनायक’ के बाद ‘बहिष्कृत भारत’ दूसरा समाचार पत्र निकाला। इसमें वे सम-सामयिक समस्याओं को उठाते थे। इस पत्र के माध्यम से उन्होंने अछूतों से अपील की कि वे सारे ऐसे काम करना बंद कर दें जो उनके व्यक्तित्व विकास में बाधक है। मंदिरों एवं जलस्रोतों पर अछूतों के प्रवेश  के लिए भी इस पत्र को माध्यम बनाकर दलितों को संगठित किया, फलस्वरूप उन्हें सफलता मिली और सार्वजनिक क्षेत्रों में प्रवेश  का अधिकार भी मिला। डॉं0 अम्बेडकर का कहना था कि अस्पृष्यता देश , जाति एवं अन्य लोगों के लिए जो अपने आपको उच्च मानते है, उनके लिए भी अच्छा नहीं है।

डॉं0  अम्बेडकर जन्म आधारित जाति-व्यवस्था के खिलाफ थे। उनका मानना था कि समाज में सच्चे लोकतंत्र की स्थापना के लिए जातिवाद का विनाश  आवष्यक है। वे दलितों-शोषितों के ‘मसीहा’ बनकर उभर रहे थे तो ‘लड़ाई वाले विचार’ कहकर कुछ समाचार पत्र जिसमें ‘केसरी’ भी शामिल था, व्यंग्य कर रहे थे। 

आज शोषित एवं दलितों के अंदर अपने ही समाज में फैली कुरीतियों-अंधविष्वासों से लड़ने की जिज्ञासा पैदा हो गई है। वे इस कुरीतियों-अंधविष्वासों से उबरकर समाज की मुख्यधारा में मिलने के लिए सहर्ष तैयार हैं। स्वतंत्रता के पहले दलितों के अंदर परिवर्तन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो गयी थी लेकिन स्वतंत्रता के बाद इस प्रक्रिया में बहुत तेजी आयी है। आज उन्हें हर प्रकार की सुविधायें दी जा रही हैं। उनके विकास की धारा में आधुनिक पत्रकारिता ने बहुत योगदान दिया है। आज कहीं पर भी दलितों के ऊपर अत्याचार या उनका शोषण होता है, तो समाचार पत्र इसे प्रमुखता से छापकर शासन/प्रशासन का ध्यान इनकी ओर खींचते हैं और उस समस्या का हल निकाला जाता है।

पत्रकारिता शोषणमुक्त लोकतांत्रिक समाज की स्थापना के लिए बहुत कदम उठा रही है। समाज में फैली अंधविश्‍वासों,  कुरीतियों, अत्याचारों, जातिवाद, छुआछूत, ऊॅंच-नीच इन सबको दूर करने में पत्रकारिता का बहुत योगदान है। गांधी एवं अम्बेडकर के साथ जो लोग छुआछूत दूर करने के लिए कार्य कर रहे थे, उसमें पत्रकारिता के योगदान को नकारा नहीं जा सकता है। 

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