ग्रामीण महिलाओं का सशक्तीकरण
सारांश:-
आज की नारी न सिर्फ सपने देखती है बल्कि उन्हें साकार करना भी जानती है। यह बात नगरीय शिक्षित महिलाओं के लिये तो कही जा सकती है, पर ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं और वह भी गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाओं के बारे में सोची भी नहीं जा सकती थी। लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की यही गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ी है, जहां वे स्वयं निर्णय लेने में सक्षम है तथा छोटी-छोटी बचत के द्वारा पहले से बेहतर स्थिति में आकर अब सपने देखने और उन्हें पूरा करने में सक्षम हो रही हैं। ग्रामीण महिलाओं में साक्षरता बढ़ी है और वे स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर हो रही है । ग्रामीण नेतृत्व पूरी क्षमता के साथ कर रही है । उनमें राजनैतिक समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है । शिक्षा के चलते उनके विचारों में परिवर्तन आया है । ग्रामीण महिलओां की परंपरागत स्थिति एवं भूमिकाओं में परिवर्तन आया है ।
मुख्य बिन्दुः-ग्रामीण महिला, सशक्तीकरण ,विकास, बचत
भारत के नियोजित विकास के लिये प्रारंभ किये गये प्रयास इस सिद्धांत व विश्वास पर आधारित थे कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक समान रूप से पहुँचेगा। लेकिन वास्तविकता में ऐसा नहीं हो पाया और समाज का एक बड़ा तबका, खासकर कमजोर वर्ग और महिलाएं विकास चक्र के दायरे से बाहर छूट गये। महिलाओं में भी शहर क्षेत्रों में रहने वाली महिलाओं की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली महिलाएं कहीं ज्यादा पीछे रह गई। अशिक्षा, कुपोषण, घर और बाहर दोनों मोर्चों पर काम का बोझ तथा आर्थिक विषमताओं के चलते ग्रामीण महिला की स्थिति और भी दयनीय है।
ग्रामीण महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण........
भारत गांवों का देश है । देश की 68 प्रतिशत आबादी गांवों में निवास करती है जिसमें आधी जनसंख्या महिलाओं की है । भारत ही नहीं विश्व के अधिसंख्य समाजों में सामाजिक व सांस्कृतिक मूल्यों के चलते घरेलू कार्य, परिवार की देखभाल व सामुदायिक कार्यो की जिम्मेदारी महिलाओं की है ग्रामीण क्षेत्र में जो महिलाये घरेलू खेती बाड़ी , पशुपालन , ईंधन बटोरने तथा कुटीर उद्योग जैसे कार्य में लगी हुई है उन्हें रोजगार की श्रेणी में भी नहीं माना जाता । महिलाओं के अधिकांश कार्यो की गणना का आर्थिक मूल्यांकन नहीं किया जाता । यदि एैसे कार्यो की गणना की जाये तो ग्रामीण क्षेत्रों में 88 प्राितशत व शहरों में 68 प्रतिशत महिलाये आर्थिक दृष्टि से उत्पादक है । फसल के मौसम में एक महिला घर के कार्यो के साथ कृषि कार्य में सहभागिता करते हुए लगभग 15 घंटे कार्य करती है जबकि पुरूष मात्र 7-8 घंटे कार्य करता है किन्तु फसल प्रबंधन, फसल की आय पर पुरूषों का ही नियंत्रण होता है । इसी प्रकार जब रोजगार की तलाश में पुरूष गांवों से पलायन करते है तो महिलाये घर की जिम्मेदारी के साथ साथ खेती , पशुपालन आदि का भी कार्य करती है । महिला सशक्तिकरण के लिये बहुत जरूरी है कि वे आर्थिक रूप से स्वतंत्र व आत्मनिर्भर हो । सरकार के द्वारा ग्रामीण महिलाओं की आय व स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिये अनेक प्रयास किये जा रहे है जैसे नोराड,, राष्ट्रीय महिला कोष, स्व सहायता समूह, स्वयंसिद्वा, स्वशक्ति परियोजना, महिला प्रशिक्षण व रोजगार कार्यक्रम सहयोग, स्वावलंबन, स्वर्ण जयंती स्वरोजगार योजना, जवाहर ग्राम समृद्वि योजना, इंदिरा आवास योजना, राष्ट्रीय सामाजिक सहायता कार्यक्रम इत्यादि । महिला व बाल विकास विभाग के द्वारा ग्रामीण क्षेत्र की महिलाओं को संगठित कर 650 ब्लाक में स्वयंसिद्वा योजना चलाई गई है । इसके माध्यम से स्वसहायता समूहों का गठन कर ग्रामीण निर्धन महिलाओं का आर्थिक सशक्तिकरण किया गया । स्वशक्ति योजना के माध्यम से समूहों का गठन कर महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने की कोशिश जारी है । स्वावलंबन कार्यक्रम का उद्देश्य महिलाओं को गैर परंपरागत क्षेत्रों में प्रशिक्षण देकर उन्हें स्वरोजगार के लिये प्रेरित करना है । इसके लिये ग्रामीण महिलाओं को स्वयंसेवी अथवा गैर-सरकारी संगठन द्वारा कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग, घड़िया, रेडियों व टी.वी. ठीक करना, हाथ करघा कार्य, सिलाई, कढ़ाई इत्यादि के लिये प्रशिक्षण दिया जाता है । वर्ष 1999 में स्वर्ण जयंती रोजगार योजना में अन्य सभी कार्यक्रमों को समाहित कर दिया गया है व महिलाओं को स्वसहायता समूहों के माध्यम से सशक्त बनाया जा रहा है । प्रशिक्षण ऋण, तकनीकी संसाधन, बाजार आदि तक की सुविधायें महिलाओं का प्रदान की जा रही है । समूह की बचत को ही उधार लेन देन में इस्तेमाल किया जाता है । उनके लिये एस.एच.जी. बैंक लिंकेज कार्यक्रम के तहत रिवाल्विंग फंड बैंक ऋण व सब्सिडी जैसी सुविधायें मुहैया कराई जाती है ।इसके अंतर्गत ऐसे गरीब परिवारों को चुना गया जो गरीबी रेखा के नीचे आते है। ऐसे परिवारों के व्यक्ति को स्वरोजगार दिया जाता है। वह व्यक्ति जो इस योजना से रोजगार पाता है उसे स्वरोजगारी कहा जाता है। ये स्वरोजगारी समूह में रहकर कार्य करते है और इस समूह को ही स्व-सहायता समूह कहते है।महिला सशक्तीकरण की अवधारणा को ध्यान में रखते हुए स्वर्णजयंती ग्राम स्वरोजगार योजना में यह स्पष्ट उल्लेखित किया गया है कि विकासखंड/ जनपद पंचायत स्तर पर कुल समूहों में से न्यूनतम आधे समूह केवल महिला समूह होंगे।
स्व-सहायता समूह......
10 से 20 व्यक्तियों का ऐसा समूह जो खुद की बचत से खुद की सहायता करता है, स्व-सहायता समूह कहलाता है। स्व-सहायता समूह के सदस्य प्रति सप्ताह या प्रतिमाह एक निश्चित राशि जमा करते है।खाते का संचालन करने के लिये दो व्यक्तियों का चुनाव समूह स्वयं करता है।एकत्रित राशि में से समूह के सदस्य न्यूनतम निर्धारित ब्याज दर पर ऋण ले सकते है।गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाले व्यक्तियों का स्व-सहायता समूह बनाया जाता है।स्व-सहायता समूह नियमित बचत करते हुए अपने क्षेत्र की आवश्यकताओं के अनुसार स्वरोजगार का चयन कर सकता है।स्वरोजगार हेतु उन्हें बैंक से ऋण व रिवाॅल्विंग फंड भी मिलता है।स्वरोजगार हेतु प्रशिक्षण की व्यवस्था भी की जाती है।स्व-सहायता समूहों के निर्माण का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने वाले लोगों की सहायता प्रदान करना व उन्हें तीन वर्षों में गरीबी रेखा से ऊपर उठाना है। किसी भी समुदाय की महिला के द्वारा स्व-सहायता समूह बनाया जा सकता है। ये महिलाएं सामाजिक, आपाती, आपदा और आर्थिक कार्यों के लिये एक दूसरे से जुड़ती हैं।गाँवों में आर्थिक विकास का मुख्य आधार बने स्व-सहायता समूह गरीबों के आर्थिक उत्थान में बेहद मददगार साबित हो रहे है।
उद्देश्य......
महिलाओं की आर्थिक स्थिति को सुधारना।
महिलाओं के आत्म विश्वास व आत्म निर्भरता को बढ़ाना।
महिलाओं में सामुहिक निर्णय की क्षमता को विकसित करना।
महिलाओं में बचत की प्रवृत्ति को बढ़ाना और स्वयं के पूँजी संसाधनों को विकसित करना।
ग्रामीण महिलाओं का सामाजिक सशक्तीकरण.......
भारतीय समाज में आये क्रांतिकारी परिवर्तनों के दौर में ग्रामीण महिलायें विकास की राह पर आगे बढ़ रही है । इस दिशा में सरकार द्वारा महिला सशक्तिकरण हेतु निम्नांकित कदम उठाये गये:-
कन्या भ्रूण हत्या रोकने के लिये प्रसव पूर्व जांच तकनीकी अधिनियम 1994 जिसे वर्ष 2002 में संशोधित कर कन्या भ्रूण हत्या को अपराध घोषित किया गया ।
रोजगार के समान अवसर व समान कार्य के लिये समान वेतन का निर्धारण किया गया ।
असंगठित क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के लिये विशेष योजनायें/ कार्यक्रम बनाये गये ।
महिलाओं की सुरक्षा व संरक्षा के लिये विशेष कानून बनाये गये ।
.पंचायती राज व्यवस्था में 33 प्रतिशत आरक्षण उपलब्ध कराया गया ।
महिला स्वास्थ्य संबंधी कार्यक्रमों पर ज्यादा ध्यान दिया गया ।
राष्ट्रीय जनसंख्या नीति 2000 में जनसंख्या रोकथाम के लिये गर्भनिरोधक सेवाओं को सर्वव्यापी बनाया गया व लड़कियों के लिये बड़ी उम्र में शादी व प्रसव के लिये संस्थागत ढॅांचे के विस्तार को महत्व दिया गया ।
ग्रामीण महिलाओं का शैक्षणिक सशक्तीकरण
शिक्षा मानवीय विकास का केन्द्र बिन्दु है । सदियों से शिक्षा के अभाव में ग्रामीण महिलाये जीवन के प्रत्येक क्षेत्र- आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक, शैक्षणिक इत्यादि में शोषण व अन्याय का शिकार हुई है। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात हमारे भारतीय संविधान में 14 वर्ष तक की आयु के सभी बच्चों के लिये शिक्षा की निःशुल्क व्यवस्था कर दी गई थी । इसके बाद विभिन्न पंचवर्षीय योजनाओं में भी महिला शिक्षा के विभिन्न प्रयास किये गये जैसे- अनौपचारिक शिक्षा, आपरेशन ब्लैक बोर्ड, पोषाहार राष्ट्रीय कार्यक्रम, लोक जुंबिश कार्यक्रम, शिक्षाकर्मी परियोजना, महिला समाख्या कार्यक्रम इत्यादि । वर्तमान समय में सर्वशिक्षा अभयान महिला शिक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है । ग्रामीण क्षेत्रों में साक्षरता के सार्थक प्रयासों के चलते ग्रामीण महिलाओं की शैक्षणिक स्थिति में पर्याप्त अंतर आया है । वे रूढ़ीवादी परंपराओं को लांघ कर आगे आई है । उनमें गुणात्मक परिवर्तन का आना शुरू हुआ है । अपनी हर भूमिका में वे अपनी परंपरागत छवि को कहीं पीछे छोड़ कर एक दूसरे ही रूप में सामने आई है । साक्षरता के कारण आया आत्म विश्वास साफ झलकने लगा है ।लेकिन दूसरी ओर एक कड़वी सच्चाई यह है कि स्त्री पुरूष साक्षरता में विगत दशकों से एक निश्चित अंतराल लगातार बना हुआ है । शिक्षा के क्षेत्र में किये गये एक अध्ययन से यह बात सामने आई है कि ग्रामीण क्षेत्र में स्कूलों में प्रवेश लेने वाली 100 बालिकाओं में से कक्षा पांच तक पहुंचते पहुंचते उनकी संख्या एक तिहाई रह जाती है, आठवीं तक मात्र 18, दसवीं तक 8 और 12वीं तक केवल 1 या 2 छात्रायें ही पहुंच पाती है । ग्रामीण क्षेत्रों में किये जाने वाले लैंगिक भेदभाव को लड़कियों के बीच में पढ़ाई छोड़ने का मुख्य कारण माना जाता है ।
ग्रामीण महिलाओं का राजनैतिक सशक्तीकरण
भारतीय समाज का गहराई से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि सभ्य शिक्षित नगरीय समाजों में भी महिलाओं की राजनैतिक सहभागिता की स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही है तब ग्रामीण समाज में जहां सदियों से पर्दा प्रथा प्रचलित रही हो पारिवारिक निर्णय संयुक्त परिवार के पुरूष सदस्यों के हाथ में रहो हो, वहां राजनैतिक सहभागिता का प्रश्न ही नहीं उठता । यद्यपि पिछले कई दशकों से चले आ रहे महिला आन्दोलनों के चलते कई महिलाये राजनीति के क्षेत्र में आई है पर उनकी संख्या बहुत कम रही है । ग्रामीण महिलाओं के विकास में संविधान का 73वां और 74वां संशोधन एक ऐतिहासिक कदम है इसमें देश भर की शहरी व ग्रामीण स्वायत्त संस्थाओं में महिलाओं को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिला । इससे ग्रामीण स्तर पर करीब दस लाख महिलाओं ने नेतृत्व की कमान संभाली । इनमें से 75000 महिलायें ग्रामीण, ब्लाक व जिला स्तर पर अध्यक्ष के पद पर आसीन है । इस प्रकार ग्रामीण महिलायें जो अब तक उपेक्षित रहने को मजबूर थी उन्हें 33 प्रतिशत आरक्षण देकर केवल सदस्य के रूप में नहीं बल्कि पंचायत के मुखिया के रूप में चुने जाने का अवसर प्रदान किया है । इसके माध्यम से हाशिये पर बैठी ग्रामीण महिला को स्थानीय स्तर पर जरूरतें पूरी करने के लिये अवसर मिला , जिससे लोकतंत्र में मजबूती आई है । पंचायतों में महिला आरक्षण नीति ने ग्रामीण महिलाओं की तकदीर व तदबीर भी बदली । यद्यपि विभिन्न अध्ययनों और सर्वेक्षणों से यह बात उभर कर सामने आई है कि महिलाओं को अभी इस अधिनियम के तहत अपनी शक्तियों का स्पष्ट ज्ञान नहीं है । अधिकांशतः वे बैठकों में उपस्थित नही होती या होती भी है तो अपनी निरक्षरता के चलते प्रभावी भूमिका नही निभा पा रही है । लेकिन दूसरी ओर यह भी सच है कि पंचायत स्तर पर इतनी बड़ी संख्या में महिलाओं की भागीदारी ने स्थानीय स्तर पर सामूदायिक जीवन में परिवर्तन ला दिया है । निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों में दलित , आदिवासी, पिछड़ी तथा मुस्लिम महिलायें भी है । एसी नीलसन ओआरजी मार्ग के अध्ययन से पता चलता है कि पंचायती राज संस्थाओं में बड़ी संख्या में बी.पी.एल. और निरक्षर उम्मीदवार भी है ।पंचायती राज संस्थाओं के माध्यम से महिलाओं ने अपनी प्रतिभा समर्पण व कार्यकुशलता से सभी को परिचित करा दिया है । पितृसतात्मक समाज में महिलाओं द्वारा सत्ता चलाना अपने आप में एक चुनौतीपूर्ण कार्य है जिसे वे बखूबी निभा रही है । इन महिलाओं द्वारा घरेलू हिंसा, दहेज प्रथा, शराबखोरी, पर्यावरण संरक्षण इत्यादि की दिशा में महत्वपूर्ण कार्य किये जा रहे है । इसके अलावा दोपहर का भोजन कार्यक्रम, सर्वशिक्षा अभियान, ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, रोजगार गारंटी योजना आदि के क्रियान्वयन में भी फर्क पड़ा है । समग्र रूप से देखे तो स्पष्ट होता है कि ग्रामीण महिलाओं की राजनैतिक सहभागिता के चलते उनके व्यक्तित्व में परिवर्तन आया है । आत्म विश्वास और जोश से भरी हुई ये महिलायें आसपास की घटनाओं के प्रति सजग हुई है । सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि राजनैतिक सशक्तिकरण की दृष्टि से भारत की महिलाओं का स्थान 128 देशों में 21वें स्थान पर है ।
परंपरागत ग्रामीण सामाजिक व्यवस्था में महिलायें जन्म के पूर्व से ही लैंगिक भेदभाव का शिकार रही है । जन्म के पश्चात बचपन से ही भोजन व शिक्षा के क्षेत्र में भेदभाव का सामना करना पड़ता है । अल्प आयु में ही परिवार के आर्थिक कार्यो में सहयोग करना पड़ता है । कम आयु में ही वैवाहिक व पारिवारिक दायित्वों के कारण उनके शारीरिक, मानसिक व बौद्विक विकास में बाधा पहुंचती है । परंपरागत तरीके से वे लगभग 18 घंटे काम करती है । कृषि कार्यो में महत्वपूर्ण सहभागिता निभाती है । इन सबके बावजूद समाज में उनकी स्थिति दोयम दर्जे की रही है । लेकिन ग्रामीण क्षेत्र की यही गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करने वाली महिलाएं स्वरोजगार से जुड़ी है, जहां वे स्वयं निर्णय लेने में सक्षम है तथा छोटी-छोटी बचत के द्वारा पहले से बेहतर स्थिति में आकर अब सपने देखने और उन्हें पूरा करने में सक्षम हो रही हैं। इस प्रकार ग्रामीण महिलाओं के संदर्भ में निष्कर्षतः हम पाते है कि ग्रामीण महिलाओं में साक्षरता बढ़ी है और वे स्वरोजगार के माध्यम से आत्मनिर्भर हो रही है । ग्रामीण नेतृत्व पूरी क्षमता के साथ कर रही है । उनमें राजनैतिक समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है । शिक्षा के चलते उनके विचारों में परिवर्तन आया है । ग्रामीण महिलओां की परंपरागत स्थिति एवं भूमिकाओं में परिवर्तन आया है । सबसे बड़ी बात यह है कि ग्रामीण महिलायें शिक्षा के महत्व को समझने लगी है । कभी स्वयं लैंगिक भेदभाव का शिकार रही ये महिलायें स्वयं इस भेदभाव को दूर कर लड़कियों को भी समान महत्व दे रही है लड़कियों के भविष्य के लिये परिवार अब अधिक जागरूक हो गये है ।


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