चर(Variable) का क्या अर्थ होता हैं
शाब्दिक रूप से Variable का अर्थ होता है कि जो vary कर सके अथवा परिवर्तिंत हो सके।
करलिंगर के शब्दों में, चर एक ऐसा गुण होता हैं कि जिसकी अनेक मात्रायें हो सकती हैं।
गैरट के शब्दों में, 'चर ऐसी विशेषतायें तथा गुण होते हैं, जिनमें मात्रात्मक विभिन्नतायें स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती हैं, तथा जिनमें किसी एक आयाम पर परिवर्तन होते रहते हैं।
मैठेसन के शब्दों में,'एक चर एक वैज्ञानिक अध्ययन में एक ऐसी स्थिति होती हैं, जिसमें मात्रात्मक तथा/ अथवा गुणात्मक परिवर्तन हो सकते हैं।
इस प्रकार चर से एक ऐसी स्थिति(condition) अथवा गुण (attribute) का बोध होता हैं कि जिसके स्वरूप में एक वैज्ञानिक अध्ययन के अन्तर्गत एक आयाम(dimension) पर विभिन्न मात्रात्मक अथवा गुणाात्मक परिवर्तन होते रहते हैं।
चरों का वर्गीकरण (Classification of Variables)
प्रायोगिक अनुसन्धानों में मुख्यत: दो चरों पर अध्ययन केन्द्रित रहता हैं:-
(1) स्वतन्त्र चर (Independent variables):-
साधारणत: प्रयोगकर्ता जिस कारक के प्रभाव का अध्ययन करना चाहता हैं, और प्रयोग में जिस पर उसका नियंत्रण रहता हैं, उसे स्वतन्त्र चर(I.V.) कहते हैं। उदाहरणार्थ, प्रतिक्रिया काल के प्रयोग में जब प्रयोगकर्ता उद्दीपक की प्रबलता का प्रतिक्रिया काल पर अध्ययन करता हैं, तब यहॉं उद्दीपक की मात्रा स्वतन्त्र चर होता हैं, ऐसे ही यहॉं अभ्यास, प्रेरणा, आयु व बुद्धि भी स्वतन्त्र चर हो सकते हैं। टाऊनसैण्ड के शब्दों में,'स्वतन्त्र चर वह कारक होता हैं, जिसमें प्रयोगकर्ता इस उद्देश्य से हेरफेर(manipulate) करता है जिससे उसका सम्बन्ध एक प्रेक्षित घटना से निश्चित रूप से ज्ञात किया जा सके।
केण्डलैण्ड के अनुसार, 'स्वतन्त्र चर एक प्रयोग के वे कारक होते हैं, जिन पर प्रयोगकर्ता का नियन्त्रण रहता है तथा जिसमें, वह जैसा चाहे, परिवर्तन कर सकता हैं।
इसी प्रकार डी मैटो के स्वतन्त्र चर की परिभाषा देते हुए लिखा है:'स्वतन्त्र चर वह चर होता हैं, जिसमें प्रयोगकर्ता प्रत्यक्ष रूप से या फिर चयन द्वारा, इस उद्देश्य से हेरफेर(manipulate) करता है, जिससे कि उसके प्रभावों का व्यवहार पर अथवा आश्रित चर का आंकन किया जा सकें।
इस प्रकार हम देखते हैं कि एक प्रायोगिक अध्ययन में स्वतन्त्र चर वह कारक होता हैं, जिस पर प्रयोगकर्ता का नियत्रंण रहता हैं तथा जिसकी मात्रा में वह प्रयत्क्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, हेरफेर (manipulation) इस आशय से करता है, ताकि उसके तथा आश्रित चर के सम्बन्ध को निश्चित रूप से ज्ञात किया जा सके।
स्वतन्त्र चर को कभी-कभी उद्दीपक चर(stimulus variable) भी कहा जाता हैं, क्योंकि प्रायोगिक अध्ययन में एक उद्दीपक के प्रभाव का ही अध्ययन किसी एक व्यवहार अथवा आश्रित चर पर किया जाता हैं। उदाहरणार्थ, प्रतिक्रिया काल के प्रयोग में प्रकाश की प्रबलता ( intensity of the stimulus) एक स्वतन्त्र चर अथवा उद्दीपक चर होता हैं। प्रकाश को प्रस्तुत करने और न करने पर प्रयोगकर्ता का नियन्त्रण रहता हैं, यही नहीं, वह जब चाहे, प्रकाश की प्रबलता को कम व अधिक कर सकता हैं, अथवा उसमें हेरफेर(manipulation) कर सकता हैं, और फिर इस हेरफेर के प्रतिक्रिया काल पर पडने वाले प्रभावों का विशुद्ध अध्ययन कर सकता हैं। प्रयोगकर्ता प्रत्येक प्रकार के स्वतन्त्र चर में हेरफेर सदैव प्रत्यक्ष रूप से( directly) नहीं कर सकता । जैसे यदि वह जब चाहे तब अपने प्रयोज्यों की आयु को घटा-बढा नहीं सकता; अथवा आयु में प्रत्यक्ष रूप से जोडतोड (manipulation) नहीं कर सकता : वह ऐसा केवल अप्रत्यक्ष रूप से (indirectly) ही कर सकता हैं, अथवा इसके लिए उसे कम और अधिक आयु वाले प्रयोज्यों का चयन(selection) करना होगा। इस प्रकार हेरफेर(manipulation) के प्रत्यक्ष रूप से किये जाने तथा अप्रत्यक्ष रूप से किये जाने के आधार पर स्वतन्त्र चर के दो निम्नलिखित रूप हो जाते हैं:
(i) स्वतन्त्र चर ई-टाइप(independent variable E-type)
(ii) स्वतन्त्र चर एस-टाइप(independent variable S-type)
(i) स्वतन्त्र चर ई-टाइप(independent variable E-type)
स्वतन्त्र चर ई-टाइप में प्रयोगकर्त्ता जब चाहे तब स्वतन्त्र चर मात्रा में हेरफेर कर सकता है, जैसे प्रतिक्रिया काल के प्रयोग में प्रकाश के उद्दीपक की मात्रा तथा प्रयोज्य के अभिप्रेरण (motivation) की मात्रा को घटाने या बढाने में वह प्रत्यक्ष रूप से सफल रहता हैं। चूँकि इस प्रकार के स्वतन्त्र चर पर प्रयोगकर्ता (experimenter) अथवा E का पूर्ण नियन्त्रण रहता हैं, अत: ऐसे चर को स्वतन्त्र चर E-type कहा जाता है; और ऐसे ही चर को तकनीकी आधार पर प्रायोगिक चर(experimental variable) कहा जाता हैं। करलिंगर ने ऐसे चर को सक्रिय चर (active variable) कहा हैं।
(ii) स्वतन्त्र चर एस-टाइप(independent variable S-type)
इसके विपरीत, जब प्रयोगकर्ता चयन प्रक्रिया ( selection procedure) के द्वारा स्वतन्त्र चर में हेरफेर (manipulation) करता हैं, तब ऐसे चयन अथवा select किये गये स्वतन्त्र चर को S-type कहा जाता है, क्योंकि यहॉं उसमें हेरफर का आधार अप्रत्यक्ष तथा S अथवा selection हैं। उदाहरणार्थ प्रयोज्यों की आयु, बुद्धिलब्धि, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि, शैक्षिक-स्तर आदि ऐसे स्वतन्त्र चर हैं कि जिनमें प्रयोगकर्ता केवल अप्रत्यक्ष रूप से तथा selection के आधार पर ही हेरफेर कर सकता है, अत: ऐसे चरों को स्वतन्त्र चर एस-टाइप कहा जाता हैं। करलिंगर ने ऐसे चर को निर्दिष्ट चर (assignable variable) कहा हैं।
(2) आश्रित चर(Dependent variable)-
स्वतन्त्र चर के प्रभाव के कारण जो व्यवहार परिवर्तित होता है,और जिसका अध्ययन तथा मापन किया जाता है, उसे आश्रित चर कहते हैं। उदाहरणार्थ,प्रतिक्रिया काल के प्रयोग में उद्दीपक की प्रबलता के कारण प्रतिक्रिया काल की मात्रा में जो परिवर्तन होता हैं, उस परिवर्तिंत प्रतिक्रिया काल को ही आश्रित चर (D.V.) कहते हैं। टाऊनसैण्ड के शब्दों में,'आश्रित चर वह कारक होता हैं, जोकि प्रयोगकर्ता द्वारा स्वतन्त्र चर के दिये जाने, हटाने अथवा परिवर्तित किये जाने पर तदनुसार प्रकट, लुप्त अथवा परिवर्तित होता हैं।'
आश्रित चर का सम्बन्ध प्राय: व्यवहार परिवर्तन अथवा प्रयोज्य की अनुक्रिया से रहता हैं। अत: आश्रित चर को कभी-कभी व्यवहार चर(behavioral variable) और कभी-कभी अनुक्रिया चर (response variable) भी कहा जाता हैं।
(3) बाह्य चर( Extraneous variable)-
बाह्य चरों को मध्यवर्ती चर (intervening variable) भी कहते हैं, क्योंकि ये स्वतन्त्र चर तथा उससे सम्बन्धित आश्रित चर के मध्य में विघ्न डालते रहते हैं। प्रयोग में विघ्न डालने के कारण कभी-कभी इनको विघ्न-कारक चर(nuisance variables) भी कहा जाता हैं।
डी मैटो के अनुसार बाह्यचरों के दो मुख्य प्रकार होते हैं:
(i) संगत चर ( Relevant variables)
(ii) असंगत चर (Irrelevant variables)
जो बाह्य चर आश्रित चर के परिणाम में प्रभावी(effective) होते हैं, उन्हें संगत चर(relevant variables) कहा जाता हैं, और जो अप्रभावी रहते हैं, उन्हें संगत चर ( Relevant variables) कहा जाता हैं, और जो अप्रभावी रहते हैं, उन्हे चर के आश्रित चर पर पडने वाले प्रभाव का मापन करने के लिए संगत चरों पर नियन्त्रण करने की आवश्यकता होती हैं। संगत चर तथा असंगत चर भी दो प्रकार होते हैं:-
(a) जैविक चर (Organismic variables)-
जैविक चरों का संबंध प्रायोगिक अनुसंधानों में प्रयोज्यों के विशेष मनोदैहिक तथा जैविक शीलगुणों होता हैं। एडवर्ड्स के शब्दों में, 'जैविक चरों का आधार जीवों (organisms) की विभिन्नतायें होती है तथा ये वे भौतिक, शारीरिक तथा मनोवैज्ञानिक विशेषतायें होती हैं, जिनमें उनकी प्रेरणा व मापन के द्वारा वर्गीकृत किया जा सकता हैं।'
इस प्रकार प्रयोज्यों की बुद्धि,ऊँचाई, भार, स्वास्थ्य, व्यक्तित्व चिन्ता व समायोजन के स्तर आदि जैविक चर होते हैं।
(b) पर्यावरणगत चर ( Environmental variables)-
मानव व्यवहार केवल स्वतन्त्र चर के प्रभाव से ही परिवर्तित नहीं होता हैं, बल्कि पर्यावरण के अनेक कारक उसको प्रभावित करते रहते हैं। वातावरण का घटता-बढता तापक्रम, परिवर्तनशील प्रकाश की मात्रा, कोलाहल, संगीत आदि मानव व्यवहार में अनेक संवेगात्मक परिवर्तन लाते हैं। प्रायोगिक अध्ययन में ऐसे कारकों को ही पर्यावरणगत(Environmental) चर कहते हैं।
विशेषताओं के आधार पर चरों की व्याख्या
(1) खण्डित(Discrete) चर- जब एक चर केवल संपूर्ण(whole) इकाई के रूप में ही व्यक्त किया जा सकता है (अथवा जब उसका उप-विभाजन सम्भव नहीं होता) तब ऐसे चर को खण्डित चर कहा जाता हैं। जैसे- दर्पण आलेखन के प्रयोग में त्रुटियों की संख्या, लिंग भेद के आधार पर एक प्रयोग में लडकों व लडकियों की संख्या, स्थिरता(steadiness) परीक्षण में शुद्ध (correct) अनुक्रियाओं की संख्या खण्डित (discrete) चर ही होती हैं।
(2) निरंतर (continuous) चर- खण्डित चरों के ठीक विपरीत निरन्तर चर होते हैं। इनकी मात्रा कभी भी शुद्ध नहीं होती, और उसमें निरन्तर उप-विभाजन सम्भव रहता हैं, जैसे- प्रतिक्रिया काल का समय 0.2, 0.24 व 0.2448 कुछ भी हो सकता हैं, क्योंकि सैकेण्ड के समय का दशमलव की अनेक संख्याओं तक उपविभाजन हो सकता हैं। डी मैटो के शब्दों में, 'निरन्तर चर एक ऐसा मात्रात्मक चर होता हैं, प्राय: जिसकी यथार्थता की शुद्धता का मापन उस काल्पनिक मात्रा तक सम्भव रहता है कि प्राय: जिस शुद्धता की मात्रा तक उसके मापन के लिए मापन-यंत्र उपलब्ध होते हैं।
(3) गुणात्मक(Qualitative) चर- गुणात्मक चरों का संबंध अध्ययन संबंधी जीवों (organisms) की विशेषताओं तथा शीलगुणों से होता है। उदाहरणार्थ, व्यक्तियों की जाति, धर्म, व्यवसाय आदि। ये प्रयोज्यों में ऐसी विशेषतायें होती हैं कि जिनमें मात्रा का इतना अन्तर न होकर प्रकार का अन्तर अधिक व्यक्त होता हैं। अत: एडवर्ड्स के अनुसार,' ऐसे चरों को जिनमें मात्रा की अपेक्षा प्रकार के अन्तर अधिक निहित रहते हैं, गुणात्मक(qualitative) चर कहा जाता हैं।
(4) मात्रात्मक(Quantitative) चर- समस्त निरन्तर (continuous) चरों को मात्रात्मक चर कहते हैं। डी मैटो के शब्दों में 'वह चर जिसकी मात्रा के आधार पर व्याख्या की जा सकती है, मात्रात्मक चर कहलाता हैं। इस प्रकार प्रतिक्रिया काल, आयु, बुद्धिलब्धि मात्रात्मक चर होते हैं।
स्वतन्त्र आश्रित तथा संगत चरों में पारस्परिक संबंध (Relationship among independent, dependent and relevant variables )
स्वतन्त्र, आश्रित तथा संगत चरों का स्वरूप स्थायी न रहकर परिवर्तनशील रहता हैं। अत: एक अध्ययन में जो चर स्वतन्त्र चर होता है, दूसरे अध्ययन में वही चर आश्रित चर हो सकता हैं, और इसी प्रकार जो चर एक प्रयोग में संगत चर रहता हैं, वही दूसरे प्रयोग में स्वतन्त्र चर हो सकता है। उदाहरणार्थ, अधिगम सम्बधी एक प्रयोग में अभिप्रेरण(motivation) एक स्वतन्त्र चर होता हैं, उसमें बुद्धि प्राय: एक संगत (relevant) चर होता हैं क्योंकि यहॉं अधिगम की मात्रा पर केवल प्रयोज्यों के अभिप्रेरण की मात्रा का ही प्रभाव नहीं पड रहा हैं, बल्कि उस पर प्रयोज्यों की बुद्धिलब्धि की मात्रा का भी साथ-साथ प्रभाव पड रहा हैं। ऐसे ही जब अधिगम के एक प्रयोग में बुद्धिलब्धि (I.Q.) एक स्वतन्त्र चर रहता है, तब उस स्थिति में प्रयोज्यों में अभिप्रेरण की मात्रा एक संगत चर के रूप में सक्रिय रहती हैं। इसी प्रकार एक अध्ययन में बुद्धि के स्तर तथा समायोजन (adjustment) के स्तर क्रमश: स्वतन्त्र चर तथा आश्रित चर हो सकते हैं, और दूसरे में इसके विपरीत समायोजन के स्तर स्वतन्त्र चर के रूप में लिये जा सकते हैं, और बुद्धि के स्तर को आश्रित चर बनाया जा सकता हैं। संक्षेप में , स्वतन्त्र,संगत तथा आश्रित चरों में घनिष्ठ पारस्परिक संबंध रहता हैं।

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