प्रक्षेपी प्रविधियॉं Projective Techniques


प्रक्षेपी प्रविधियॉं
(Projective Techniques)

प्रक्षेपी प्रविधियों में अनुसंधान से संबंधित विधियों पर प्रकाश डाला गया हैं। अनुसूची, साक्षात्‍कार, प्रेक्षण, अन्‍तर्वस्‍तु-विश्‍लेषण व वस्‍तुपरख-परिक्षण  आदि ऐसी विधियॉं हैं, जिनसे संबंधित आंकडों को अधिक वास्‍तविक, अनौपचारिक व गहनरूप प्रदान करने के लिए समाज-मनोवैज्ञानिकों ने कुछ ऐसी प्रविधियों को विकसित तथा अनुप्रयुक्‍त किया हैं। जिसके माध्‍यम से अप्रत्‍यक्ष रूप से(Indirectly) इस प्रकार की सूचना-संकलन का कार्य सफलतापूर्वक संपन्‍न किया जा सकता हैं। सूचना-संकलन की इन अप्रत्‍यक्ष विधियों को (Indirect Methods) को ही प्रक्षेपी विधियॉं (Projective Techniques) कहते हैं।

हेनरी ए-मुरे के शब्‍दों में,' प्रक्षेपी विधियॉ ऐसे यंत्र होते है जिसके माध्‍यम से कल्‍पना को उभारना, एकल प्रतिमाओं, अन्‍तराक्रिया के प्रति मनोभावों को उकसाना तथा इन्‍हे नग्‍न रूप से प्रस्‍तुत करना होता हैं।' 

प्रक्षेपण(Projection) क्‍या हैं।

प्रक्षेपी प्रविधि (Projective Techniques) में परिभाषाओं से प्रक्षेपण की स्‍थिति स्‍पष्‍ट हो जाती हैं। उस स्थिति में देखने मे आता हैं कि एक संबंधित प्रयोज्‍य को ऐसे उद्दीपक स्थिति प्रस्‍तुत की जाती हैं कि उसके प्रति वह अर्द्धचेतन रूप से अपने विचार व्‍यक्‍त करने मे, उसमें स्‍वयं अपनी अंतरिक दमित प्रतिक्रियाओं, स्‍वभाविक अभिवृत्तियों की छाया न देखकर वह उसमें बाह्य जगत के व्‍यक्तियों की अभिवृत्तियों का प्रतिबिम्‍ब ही देखता हैं। इस प्रकार प्रक्षेपी विधि के अन्‍तर्गत एक व्‍यक्ति अपने व्‍यक्तित्‍व के अन्‍तरिक पहलुओं को अपनी व्‍यख्‍याओं  व रचनाओं के द्वारा अपने शिलगुणों को प्रगट करता हैं। स्‍पष्‍ट होता हैं कि प्रक्षेपी विधि द्वारा अध्‍ययन में एक प्रयोज्‍य अपने आंतरिक मनोभावों को प्रत्‍यक्ष रूप से प्रगट नही कर सकता हैं। जबकि अचेतन रूप से उसकी अभिव्‍यक्ति करता हैं। ऐसी अभिव्‍यक्ति को ही प्राय: प्रक्षेपण की संज्ञा दी जाती हैं। 

प्रक्षेपण के निधारक(Determinants)

(1) उद्दीपक स्थिति की संचरना का स्‍वरूप
(Nature of the structure of the stimulus situation)- 

  एक उद्दीपक स्थिति की संचरना से  अभिप्राय यह है कि उद्दीपक स्थिति एक विषय अथवा घटना के स्‍वरूप को कितनी दिशा प्रदान कर रही हैं। अब यदि एक उद्दीपक स्थिति दिशा की निश्चित हैं, तब उसके प्रति अनुक्रिया का स्‍वरूप भी प्राय: निश्चित हो जाता हैं। इस कारण यह प्रक्षेपण का प्राय: अधिक अवसर नही रहता हैं, परंतु यदि उद्दीपक की स्थिति दिशा रहित रहती हैं। तब प्रयोज्‍य को विविध प्रकार की अनुक्रिया व्‍यक्‍त करने के लिए पर्याप्‍त अवसर व स्‍वतंत्रता होती हैं। अत: इस स्थिति में प्रक्षेपण की मात्रा अत्‍याधिक ही रहती हैं। उदाहरण के लिए शब्‍द-साहचर्य विधि में  प्रयोज्‍य को केवल एक उद्दीपक स्थिति के रूप में दिया जाता हैं।यह प्रयोज्‍य के लिए प्रक्षेपण का अत्‍याधिक अवसर रहता हैं। इसके विपरित, वाक्‍य-पूर्ति परिक्षण में उद्दीपक स्थिति का स्‍वरूप प्राय: अर्द्ध-संचरित (semi-structured) ही रहता हैं। अत: यह प्रक्षेपण की स्‍वतंत्रता व मात्रा सीमित ही रहती हैं। यही स्थिति प्राय: T.A.T. में भी देखने मे आती हैं, परन्‍तु रोर्शा-परिक्षण उद्दीपक स्थिति अत्‍याधिक असंचरित(unstructured) रहती हैं। अत:ऐसी प्रक्षेपी परिक्षण में प्रक्षेपण की मात्रा सर्वाधिक रहती हैं। संक्षेप में एक उद्दीपक स्थिति की संरचना की मात्रा अधिकांशत: उससे संबंधित प्रक्षेपण की मात्रा को विपरित रूप से निर्धारित करती हैं। उद्दीपक स्थिति अधिक संरचित रहती हैं तो उसमें प्रक्षेपण की मात्रा कम ही रहती हैं और यदि उद्दीपक स्थिति बहुत कम संरचित रहती हैं उस स्थिति में प्रक्षेपण की मात्रा अत्‍याधिक रहती हैं। 

(2) उद्दीपक स्थिति में संदिग्‍धता
(Amount of ambiguity in the Stimulus Situation)-

  यहॉ संदिगधता से यह अभिप्राय है कि एक स्थिति मेें विषमता अथवा अनिश्चित्‍यात्‍मकता (vagueness) की मात्रा कितनी हैं एक उद्दीपक- स्थिति का स्‍वरूप जितना अधिक सरल रहता हैंं। प्राय: उसके प्रति संबंधित प्रयोज्‍य में प्रक्षेपण की मात्रा अपेक्षाकृत उतनी ही कम रहती हैं, और इसके विपरित उद्दीपक स्थिति की विषमता उसमें विभिन्‍न प्रकार की प्रतिक्रियाओं को उभारती रहती हैं। अत: उद्दीपक स्थिति की विषमता के प्रति प्रक्षेपण की मात्रा प्राय: उतनी ही अधिक रहती हैं। जितनी की स्थिति की विषमता की मात्रा रहती हैं। संक्षेप में प्रक्षेपण की मात्रा प्रत्‍यक्ष रूप से अधिकांशत: उद्दीपक की स्थि‍ति की विषमता व अस्‍पष्‍टता पर आधारित रहती हैं परंतु एक महत्‍वपूर्ण तथ्‍य यह भी है कि एक उद्दीपक की स्थिति सरलता तथा विषमता प्रयोज्‍य की सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि पर आधारित रहती हैं। 

(3) उद्दीपक-स्थिति की विषमता तथा संस्‍कृति
(Comp-City of the stimulus-situation and Role of Culture )- 

  एक स्थिति सामान्‍यत: विभिन्‍न उद्दीपकों के प्रभाव के कारण भी विषम बनती हैं। तथा व्‍यक्ति की सांस्‍कृतिक पृष्‍ठभूमि के परिपेक्ष्‍य में भी इसकी विषमता के रूप निर्धारित होता हैं। अत: इसका निर्धारण का निर्णय प्राय: प्रयोज्‍य से संबंधित सांस्‍कृतिक संदर्भ पर आधारित रहता हैं। संक्षेप में, एक स्थिति एक संस्‍कृति के व्‍यक्ति के लिए अति सरल हो सकती हैं, और यही स्थिति एक विभिन्‍न संस्‍कृति वाले व्‍यक्ति के लिए अति विषम भी हो सकती हैं। दूसरे शब्‍दों में एक  विशेष टी.ए.टी. प्रपत्र(Card) में दी गई स्थिति विभ‍िन्‍न संस्‍कृतियों से व्‍यक्तियों के लिए उद्दीपक की कसोटी पर भिन्‍न-भिन्‍न होती हैं।  

 

  


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