भारतीय समाज में परिवर्तन


 

भारतीय समाज में परिवर्तन

                वैज्ञानिक और औधोगिक युग में नगर प्रगतिशील संस्कृति के द्योतक है। किन्तु नगरीय संस्कृति की कोई स्थायी पहचान नहीं होती आधुनिकता के नाम पर बदलाव युवा पीढ़ी तीव्रता से करती है। औधोगीकरण, यंत्रीकरण और विज्ञान के विकास और प्रगति ने नगर के आर्थिक सामाजिक और सांस्कृतिक ढॉचे को ही बदल दिया जिससे नगर के व्यक्तियों की जीवनशैली कार्य पद्धति सोच और मानसिकता आधुनिकता के साचे मे ढलते जा रही है आधुनिक नगरीय भौतिक संस्कृति ने अभौतिक संस्कृति से जुड़ी मान्यताओं विश्‍वासों मूल्यों आदर्शों परम्पराओं आदि के स्वरूप को ही बदल दिया है सामूहिक मूल्यों के स्थान पर वैयक्तिक मूल्यों व स्वार्थी का जन्म हुआ ।नगर भौतिक सुख और महत्वाकांक्षाओं का केन्द्र बन गया। नगरीय आकर्षण जनसंख्या वृद्धि के साथ अनेक समस्याओं का कारण भी बना है। जिनमें बेरोजगारी आवास समस्या भुखमरी, अपराध, गंदीबस्ती, वेष्यावृत्ति, आत्महत्या, मद्यपान, भ्रष्टाचार साम्प्रदायिकता जैसी अनेक समस्याओं ने व्यक्ति का वैयक्तिक विघटन किया। इन सब से नगर सुविधाओं के नही बल्कि समस्याओं के केन्द्र बनते जा रहे। आर्थिक विकास व प्रगति के प्रभाव ने व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित किया है जिसने व्यक्ति को प्रगतिशील व्यक्तिवादी महत्वाकांक्षी और अवसरवादी बनाया है। इतना अधिक की भौतिकता व सुख सुविधा एवं स्वार्थ की पराकाष्टा से सब कुछ बनावटी पन पर आधारित है जिसने संबंध व्यवहार क्रियाओं ने इतने औपचारिकता की प्रधानता की है कि नगर में भीड़ भाड़ में भी अंत तक व्यक्ति अपनेपन प्रेम स्नेह तलाशता रहता है।

    वर्तमान में नगरों में  तीव्रता से परिवर्तन हो रहे है। धनी जनसंख्या अनेक प्रकार के व्यवसाय और व्यापार विशेषीकरण औधोगिक उत्पादन मशीनी सभ्यता और संस्कृति अवैयक्तिक संबंध महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व मलिन बस्तियां असंख्य नगरीय समस्यायें आदि नगरीय जीवन का प्रतीक बन गये है और व्यक्तित्व का निर्माण बहुत कुछ व्यक्ति के चारों तरफ फैले हुए वातावरण पर निर्भर करता है ।नगरीय वातावरण व्यक्ति को चालाक, शिक्षित, प्रगतिशील धूर्त मक्कार स्वार्थी महत्वाकांक्षी और अवसरवादी बनाता है जो अपने स्वार्थ की पूर्ति में किसी भी प्रकार का भ्रष्ट से भ्रष्ट और अनैतिक से अनैतिक कार्य कर सकता है ।वह अपने बनाये हुए मूल्यों में जीवन जीता है। साथ ही नगर में शिक्षा आर्थिक स्वतंत्रता तर्कपरकता सुखमय और विलासिता युक्त जीवन जीने की इच्छा आदि के कारण परिवर्तनों को स्वीकार करने की तत्परता अधिक रहती है और वैज्ञानिक प्रौधोगिकी में होने वाले परिवर्तनों संचार के उन्नत साधन मीडिया का प्रभाव आदि के कारण भी परिवर्तन तेजी से घटित होते है ।परिवर्तन की इस प्रक्रिया में नगरीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हो रहा है जो परिवर्तन निम्नांकित क्षेत्र में हुये हैः-

परिवार में परिवर्तन:- मानव जाति अजर अमर है जिसका आधार परिवार नामक संस्था है लेकिन विज्ञान और प्रौधोगिकी के विकास औधोगीकरण यातायात और वृहद् संचार के उन्नत साधनों तथा नगरीय सुविधाओं ने जन सामान्य का नगरों के प्रति आकर्षण बढ़ा दिया फलतः नगरों की संख्या में तथा नगरीय जनसंख्या में तेजी से वृद्धि हुई है । इसी का परिणाम है कि वर्तमान में संयुक्त परिवार की जगह एकांकी परिवार का निर्माण कर नगरों में निवास कर रहे है क्योंकि बदलती परिस्थिति से आवास समस्या सीमित आय सुखमय जीवन की कामना व्यक्तिवादी मूल्य शिक्षा महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता परिवार में नियंत्रण की कमी आदि कारणें से नगरीय परिवार परिवर्तन के दौर से गुजर रहे है।

जातिप्रथा में परिवर्तन:- जाति व्यवस्था भारतीय समाज की सांस्कृतिक पहचान है । जाति व्यवस्था अतीत में भारत में सामाजिक  स्तरीकरण स्थिति व कार्य तथा सामाजिक संबंधों को निर्धारित करने का आधार थी। वर्तमान में नगरीय समाज में यद्यपि जाति अब अपने परम्परागत महत्व को खो चुकी है । नगरीय सामाजिक व्यवस्था जाति प्रधान नही बल्कि वर्ग प्रधान होती है । औधोगीकरण नगरीकरण आधुनिक शिक्षा का प्रभाव पाषाच्त्य समाज का प्रभाव नगरीय समाज का वर्गात्मक आधार उन्नत जीवन स्तर के अवसर आदि के कारण नगरों में जाति व्यवस्था के प्रति आस्था नही पायी जाती है क्योंकि नगरीय क्षेत्र में भेदभाव की कमी जातिगत व्यवसाय का न होना राजनीतिक जागरूकता अधिकारों और कर्त्‍तव्‍यों के प्रति जागरूकता तार्किकता का महत्व शिक्षित परिवार होने के कारण जाति प्रथा का महत्व कम हो रहा है और व्यक्ति अपने हितों को ध्यान में रखकर अपने समान हित आवश्‍यकताओं वाले व्यक्तियों से संबंध कायम करने के कारण वर्गो को प्रधानता मिल रही है । नगरीय क्षेत्र में वर्ग व्यवस्था के आधार पर व्यक्ति की स्थिति का निर्धारण होता है।

विवाह में परिवर्तनः- परम्परागत भारतीय समाज जिन चीजों पर गर्व करता है उनमें विवाह संस्था प्रमुख है। विवाह को सितारों द्वारा कराया मेल जो जन्म जन्मांतर का बंधन माना जाता था जिसे पवित्र और मधुर बंधन बताकर उसकी तारीफ में अनेक कसीदे पढ़े जाते थे लेकिन आज की तेज रफ्तार जिदंगी में निजी पहचान महत्वाकांक्षा कैरियर पैसा और अपनी मर्जी के मुताबिक जीवन जीने की चाहत के कारण विवाह अब धार्मिक संस्कार न होकर सामाजिक समझौता बन गया है जो दो लोगों की पंसद पर आधारित है और वह पंसद अपने प्रोफेशन व रूचि सोच व विचारधारा वाले जीवनसाथी के रूप में होती है ।इसी विचार से नगरीय क्षेत्र में विलम्ब विवाह प्रेमविवाह अन्तरर्जातीय विवाह को प्राथमिकता दी जा रही है जिसमें तकनीकी का विषेश सहयोग से मेट्रोमोनियल विज्ञापन नेट में विज्ञापन मैरिज गार्डन प्रोफेशनल मैरिज कॉउसलंर वैडिंग प्लानर जैसे कई  व्यावसायिक क्षेत्रों का विकास हुआ है। जिसने विवाह बंधन को पूरी तरह से व्यवसाय बना दिया। यही सब परिवर्तन से विवाह किसी भी वजह से असहनीय होते वैवाहिक बंधन से यथा शीघ्र मुक्त होने की प्रवृत्ति जोर पकड़ रही है। हम और हमारे की जगह ‘‘मै‘‘ और ‘‘तुम‘‘ ले रहे है। बदलते विचार में शादी बोझ नजर आने लगी है।

आर्थिक क्षेत्र में परिवर्तनः-  नयी शिक्षा प्रणाली पवित्रता और अपवित्रता से संबंधित नये विचार आधुनिक मूल्य तथा तेजी से बढ़ती हुई गतिशीलता के कारण नगरों में जन्म पर आधारित सामाजिक संस्तरण की अपेक्षा वैयक्तिक कुशलता और योग्यता पर आधारित है और जैसे जैसे भौतिक मूल्यों का प्रभाव बढ़ने से लोगों की आवश्‍यकतायें बढ़ती गयी बढ़ती विभन्न क्षेत्रों में नयी नयी वस्तुओं और सेवाओं की आवश्‍यकताओं ने श्रम विभाजन विशेषीकरण पर आधारित नगरीय समाज में संगंठित बाजार व्यवस्था से प्रत्येक व्यक्ति का जीवन प्रतिस्पर्धा पर आधारित होता गया ।नगरों में उपलब्ध सुविधाओं के कारण नगरों में औधोगीकरण अधिक हुआ है जहॅा विषमता भरी आर्थिक संरचना में वर्ण संघर्ष की समस्या पायी जाती है। वर्तमान में नगरों में आर्थिक क्रियाओं और सस्थाओं ने अनेक परिवर्तन उत्पन्न किए है ।आज नगरों में बड़े बड़े उधोग उत्पादन के केन्द्र बन गए है। नगर में बाजार बैंक मुद्रा व साख आदि की सुविधायें भी उपलब्ध है इसी कारण नगर व्यापार और वाणिज्य के केन्द्र बन गए है।

धार्मिक क्षेत्र में परिवर्तनः- परम्परागत भारतीय समाज में धर्म आध्यात्मिक शक्तियों में विश्‍वास पर आधारित है जिसे कर्तव्‍य से जोड़कर जैसा कर्म करोगे वैसा फल पाओगे के विचार ने व्यक्ति को भाग्यवादी बना दिया था लेकिन नगरीय जीवन ने व्यक्ति के परम्परात्मक मूल्यों और विश्‍वासों के ढॅाचे को परिवर्तित कर दिया है। औधोगिक और भौतिक वादी सभ्यता व संस्कृति ने धर्म संबंधी अंधविश्‍वासों को समाप्त करने में सहायता की। नगरीय जीवन में पूजा पाठ के महत्व में कमी, औपचारिकता पर आधारित नगरीय समाज में भावना कम और दिखावा अधिक हैं ।वैज्ञानिक आविष्कारों और उपलब्धियों ने व्यक्ति को तार्किक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण का बनाया है जिससे वह धर्म के नाम पर सब कुछ स्वीकार नही करता बल्कि धर्म संबंधी विश्‍वासों और क्रियाकलापों का तार्किक विश्‍लेषण करता है। शिक्षा योग्यता व कुशलता आधुनिक मूल्य अवसरवादिता तार्किकता के विचार ने धर्म के प्रति अंधविश्‍वासों को समाप्त किया है। आधुनिक समाज की बदलती हुई परिस्थितियों ने नगरों में धार्मिक कट्टरता में कमी, धार्मिक संकीर्णता में कमी, मानवतावादी धर्म का विकास धर्म का व्यवसायीकरण धर्म का लौकिकीकरण धर्म मनोरंजन के रूप जैसे परिवर्तित स्थितियॉ उत्पन्न हुई है।

राजनीतिक क्षेत्र में परिवर्तनः- परम्परागत रूप से समाज में उच्च जाति व आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों द्वारा नेतृत्व किया जाता था लेकिन वर्तमान में नेतृत्व में परिवर्तन हुआ। नगरीय समाज राजनीति के केन्द्र है ।नगरों में ही विभिन्न राजनीतिक दलों के मुख्यालय स्थित होते है तथा सभी राजनीतिक दलों द्वारा नगरवासियों को अपनी ओर आकर्षित करने का प्रयत्न किया जाता है नगरों में भी जातिगत समीकरण का प्रभाव के साथ तुलनात्मक रूप से राजनीतिक जीवन अधिक स्वतंत्र और जागरूक होता है। संचार और प्रचार माध्यमों द्वारा ही विभिन्न राजनीतिक दल अपने विचारों को लोगों तक पहूँचाने नगरीय समाज की भूमिका निर्णायक होती है ।यही कारण है कि विभिन्न राजनीतिक दलों के कार्यालय नगरों में पाये जाते है जो लोगों को अपने विचारों से प्रभावित करते है।

    उपर्युक्त परिवर्तनों से स्पष्ट है कि नगरीय समाज तीव्रता से परिवर्तन की ओर अग्रसर है ।कुछ समाज में अच्छे परिवर्तन एवं कुछ बुरे परिवर्तनों को स्पष्ट कर रहे है लेकिन औधोगिक तकनीकी रूप से होने वाले परिवर्तन समाज में लोगों को भावनात्मक रूप से विरक्त करके अपने हितों के आधार पर अपेक्षा को पूरा करने के रूप में व्यक्तित्व का निर्माण कर रहा है लेकिन एक सीमा के बाद वही व्यक्ति जब अकेला खालीपन तनाव अवसाद से ग्रसित हो जाता है तो समाज के विखण्डन का कारण बनकर समाज में गलत कार्यो को अंजाम देता है अतः नगरीय समाज में हो रहे तीव्र परिवर्तनों को रोकने के साथ मूल्यों पर भी विशेष जोर दिया जाये जिससे नगरीय समाज में हो रहे परिवर्तनों को सही दिशा में परिवर्तित करके समाज के प्रगति व विकास का कारण बने।


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