अवधान (ध्यान) ATTENTION


 अवधान (ध्यान) ATTENTION

         दैनिक जीवन में हम सभी ध्यान शब्द का प्रयोग अक्सर करते हैं। अवधान से सम्बन्धित कई प्रत्यय हैं । व्यवहार सिद्धान्त, मनोभौतिकी, शरीर मनोविज्ञान, कागनीटिव-परसेप्चुअल मनोविज्ञान आदि क्षेत्रों में ध्यान से सम्बन्धित ज्ञान का विकास बड़ी तीव्र गति से हुआ है, परन्तु यह विकास काफी हद तक एक-दूसरे से स्वतन्त्र रूप से हुए हैं । अवधान से सम्बन्धित विभिन्न क्षेत्रों में अवधान की परिभाषाएँ भिन्न भिन्न हैं, तथा साथ ही साथ एक क्षेत्र में भी अवधान की परिभाषाएँ भिन्न-भिन्न- हैं अवधान से सम्बन्धित यदि प्राचीन साहित्य को देखा जाय तो इस प्राचीन साहित्य में अवधान की परिभाषा चेतना के ज्ञान (Conscious awareness) के रूप में की गई है। संरचनावादी मनोविज्ञान में अवधान की परिभाषा चेतना में उद्दीपकों की स्पष्टता (Clearness of items in Consciousness) से है। वुण्ट (Wundt) के अनुसार अवधान वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा उद्दीपक चेतना के सीमा प्रदेश (Peripheral Consciousness) से चेतना के केन्द्र (Core or Focus of Consciousness) में आता है। बोरिंग (Boring 1929) के अनुसार प्रत्यक्षीकरण अवधान के द्वारा स्पष्ट प्रत्यक्षीकरण (Apperception) में बदल जाता है। अवधान प्रत्यक्षीकरण को स्पष्टता प्रदान करता है। विलियम जेम्स (1890) जो एक प्रकार्यवादी मनोवैज्ञानिक था, के अनुसार अवधान वह प्रक्रिया है जो चेतना के बाहर के उद्दीपकों का चयन करती है तथा इन चयन किए हुए उद्दीपकों में से कुछ चेतना में रहते हैं तथा अन्य बाहर रहते हैं। जेम्स ने आगे यह भी कहा है कि चेतना में स्पष्टता के लिए अवधान आवश्यक है। इन उपर्युक्त मनोवैज्ञानिकों की परिभाषाओं के आधार पर अवधान को परिभाषित करते हुए कहा जा सकता है कि "अवधान प्रत्यक्षीकरण को स्पष्टता प्रदान करने वाली वह प्रक्रिया है जो चेतना के बाहर के उद्दीपक या उद्दीपकों का चयन करती है तथा जिसके द्वारा उद्दीपक या उद्दीपक समूह चेतना के सीमा प्रदेश से चेतना के केन्द्र में आते हैं।

हेब्‍ब (1949) के अनुसार, "अवधान वह स्वतन्त्र केन्द्रीय प्रक्रिया है जो सांवेदिक प्रक्रियाओं के लिए एक प्रकार से पुनर्बलन का कार्य करती है तथा अधिगम से बहुत अधिक प्रभावित होती है। जिस प्रत्यक्षपरक संगठन तथा प्रत्युत्तर चयन में संवेदना का एक विशिष्ट योगदान होता है, अवधान उसको निर्धारित करता है। उपर्युक्त परिभाषाओं के आधार पर कहा जा सकता है कि अवधान प्रत्यक्ष- परक संगठन (Perceptual Organization) को स्पष्टता प्रदान करने वाली वह स्वतन्त्र केन्द्रीय प्रक्रिया है जो सांवेदिक प्रक्रियाओं के लिए एक प्रकार से पुनर्बलन (Reinforcement) का कार्य करती है । प्रत्युत्तर चयन की निर्धारित करने वाली इस प्रक्रिया के द्वारा उद्दीपक या उद्दीपक समूह चेतना के सीमा प्रदेश से चेतना के केन्द्र में आते हैं। 

अवधान की विशेषताएं (Characteristics of Attention):-

अवधान की अनेक विशेषताओं में से कुछ प्रमुख निम्न प्रकार से है-

  1. स्वतन्त्र केन्द्रीय प्रक्रिया (Central Autonomic Process) - अवधान स्मरण, कल्पना तथा चिन्तन आदि की भांति एक केन्द्रीय मानसिक प्रक्रिया है। जिसकी प्रकृति स्वतन्त्र है। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिकों जैसे- टिवनर आदि ने इसे ध्यान के स्थान पर 'ध्यान देना' (Attending) कहा है। 
  2.  प्रत्यक्ष परक संगठन को स्पष्टता प्रदान करता है (Clarity to Per-ceptual Organization ) – अवधान में प्रत्यक्षीकरण स्पष्ट हो जाता है। अवधान की उपस्थिति में प्रत्यक्षीकरण से सम्बन्धित संगठन अधिक स्पष्ट हो जाते है यदि   1. "Attention is a process of selection among item of items (stimulus or stimuli) not yet in consciousness and it imparts clarity to perception. By this process item or items in peripheral consciousness are brought into the focus of conciousness."- D. N. Srivastava, 1984, Adhunik Samanya Manovigyan, Fourth Edn.

    2. Attention is a autonomous central process acting as a reinforcement of sensory process and strongly influenced by learning. Attention determines perceptual organization and the selection of a response, given a particular sensory input."-- Donald Hebb, 1949.

    3. "Attention is a autonomic central process imparting clarity to perceptual organization and which acts as a reinforcement of sensory processes. By this process, which determines the selection of a response, stimulus or stimuli are brought into the focus of consciousness."-D. N. Srivastava, Adhunic Samanya Mano- vigyan, Fourth Edn., 1984.

    प्रत्यक्षीकरण में से अवधान हटा लिया जाय तो प्रत्यक्षपरक संगठन की स्पष्टता समाप्त हो जाएगी।

  3.   संवेदनात्मक प्रक्रियाओं के लिए यह एक प्रकार का पुनर्वसन है (A type of Reinforcement to Sensory Processes) - मनोविज्ञान शब्दावली में पुनर्बलन के दो प्रकार के अर्थ है-पहले प्रकार का अर्थ प्रोसीजर (Procedure) से सम्बन्धित तथा दूसरे प्रकार का अर्थ प्रक्रिया से सम्बन्धित है। प्रक्रिया के रूप में पुनर्बलन वह मैकेनिज्म है जो किसी भी प्रकार से एक विशिष्ट प्रत्युत्तर को एक विशिष्ट प्रक्रिया से जोड़ता है ।"" यह अवधान पुनर्बलन संवेदनात्मक प्रक्रियाओं को प्रत्युत्तर भयन से जोड़ने में सहायक होता है ।
  4.  प्रत्युतर चयन ( Response Selection ) - अवधान चयनात्मक मानसिक प्रक्रिया है । वातावरण में उपस्थित अनेक उद्दीपकों में से व्यक्ति केवल एक या कुछ ही उद्दीपकों पर एक समय में ध्यान दे सकता है। अर्थात् व्यक्ति केवल चुनी हुई उत्तेजनाओं या उत्तेजना के प्रति ही प्रत्युत्तर देता है ।
  5. अवधान के द्वारा उद्दीपक या उद्दीपक समूह चेतना के सीमा प्रदेश से चेतना के केन्द्र में लाए जाते हैं (Stimulus or Slimuli are brought into the Focus of Consciousness) - उदाहरण के लिए, जब एक विद्यार्थी कक्षा में बैठता है तो कक्षा में बैठे अन्य विद्यार्थी कुर्सियों, कमरे की दीवारें, अध्यापक, ब्लैक- बोर्ड आदि सभी की चेतना उस विद्यार्थी को होती है परन्तु उसके चेतना के केन्द्र में इन तमाम उद्दीपकों में से केवल कुछ ही उद्दीपक होते हैं। चेतना के सीमा प्रदेश के उद्दीपक अवधान प्रक्रिया के द्वारा चेतना के केन्द्र में लाए जाते हैं ।
  6. गत्यात्मक (Dynamic) - अवधान प्रक्रिया की प्रकृति गत्यात्मक होती है। इसी कारण से अवधान को चंचल कहा गया है। अवधान प्रक्रिया में इतनी अधिक गत्यात्मकता पाई जाती है कि चेतना के केन्द्र में कभी एक उद्दीपक होता है तो कभी दूसरा उद्दीपक।
  7. अवधान अन्वेषणात्मक होता है (Attention is Exploratory)— जब व्यक्ति किसी उत्तजना पर ध्यान लगाता है तो वह उस उद्दीपक के गुण या उस उद्दीपक में नवीनता खोजने लगता है परन्तु जब व्यक्ति को उद्दीपक में गुण और नवीनता नहीं दिखाई देते हैं तब उस उद्दीपक के स्थान विशेष से या उस उद्दीपक से व्यक्ति का ध्यान हट जाता । चूंकि ध्यान अन्वेषणात्मक होता है इसीलिए उसमें चंचलता पाई जाती है । अवधान प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति निरन्तर नई वस्तु को परीक्षा के लिए ढूँढ़ता रहता है। (Attention is mobile because it is explora- tory, it continuously secks something fresh for examination. = R. S. Woodworth, 1954) ।1. "It is said to be a mechanism which, somehow, connects a particular respnose to a particular stimuli."-H. J. Eysenck, et, al., 1972.
  8.  संकीर्णता (Narrowness ) अवधान प्रक्रिया का कुछ न कुछ विस्तार होता है जो विस्तृत न होकर सीमित होता है। बिस्टोस्कोप से सम्बन्धित प्रयोगों के आधार पर यह स्पष्ट हुआ है कि सामान्यतः उसका विस्तार छः उद्दीपकों तक ही होता है ।
  9. सेट या तत्परता ( ( Set or Readiness) – अवधान प्रक्रिया की उप- स्थिति में व्यक्ति में सेट या तत्परता पाई जाती है इस तत्परता के कारण व्यक्ति को अव धान प्रक्रिया से सम्बन्धित शारीरिक अनुक्रियाएँ करने में सुविधा और सरलता होती है।
  10. अवधान के दो पक्ष होते हैं (Two Aspects of Attention ) --जब कोईउद्दीपक या उद्दीपक समूह हमारी चेतना के केन्द्र में होता है तो इस समय उपस्थित अवधान प्रक्रिया अवधान का पक्ष धनात्मक पक्ष (Positive Arpect) कहलाता है तथा चेतना के केन्द्र से उद्दीपक या उद्दीपक समूह के हटते ही अवधान प्रक्रिया का पक्ष अवधान का ऋणात्मक पक्ष ( Negative Aspect ) कहा जाता है।
  11. ध्यान में शारीरिक समायोजन (Physical Adjustment ) - अवधान के समय प्रयोज्य की एक विशेष मुद्रा होती है क्योंकि इस क्रिया में अनेक आन्तरिक और बाह्य परिवर्तन होते हैं आँख, नाक, कान आदि ज्ञान इन्द्रियों का झुकाव ध्यान उद्दीपक की ओर होता है। शारीरिक मुद्रा (Postural) समायोजन भी अवधान प्रक्रिया के समय देखा जा सकता है। सिनेमा हाल में बैठे या कक्षा में ब्लैक बोर्ड पर ध्यान दे रहे विद्यार्थियों की एक विशेष मुद्रा होती है। अवधान प्रक्रिया में माँस- पेशियों का भी अभियोजन होता है। अवधान की प्रक्रिया की अवस्था में सम्बन्धित ज्ञान इन्द्रियों की मांसपेशियों में तनाव अधिक मात्रा में होता है । अवधान की प्रक्रिया की उपस्थिति में आन्तरावयव सन्तुलन (Visceral Adjustments) भी पाया जाता है। हृदय गति, नादी गति, रक्त-संचार, श्वास-गति, शारीरिक तापमान आदि सभी में अवधान की अवस्था में कुछ न कुछ परिवर्तन हो जाता है, जो व्यक्ति के अवधान अवस्था में शारीरिक समायोजन के लिए सहायक है ।

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