प्रायोगिक अभिकल्प (Experimental Designs)


 प्रायोगिक अभिकल्प
(Experimental Designs)

            मनोवैज्ञानिक अध्ययनों के लिए अनेक अभिकल्प है। नीचे कुछ अभिकल्पों नाम दिए हुए हैं। इनमें से प्रत्येक अभिकल्प के अन्तर्गत कई-कई प्रकार हैं :- के
(1) साधारण अभिकल्प (Simple Designs),
(2) कमजोर अभिकल्प (Poor Designs),
(3) समृद्ध अभिकल्प (Rich Designs),
(4) नवरत्न अभिकल्प ( Nine Designs),

(5) प्रकारान्तर अभिकल्प (Variant Designs).

(6) अभिकल्प (Complex Designs).
(7) कारक अभिकल्प (Factorial Designs),
(8) क्रियात्मक अभि (Functional Designs) 

अमेटो (1970) ने योगात्मक अभिकों को दो भागों में बाँटा है:-

(1) एक समूह वा अन्दर प्रयोज्य अभिकल्प (Single Group or Within Subject Design) (2) अलग समूह या मध्य प्रयोज्य अभिकल्प (Separate Group or Between Subject Design) मैकगुइगन (1969) ने अलग समूह अभिकल्पों के कुछ प्रकार बतलाये हैं; जैसे (1) दो संयोगीकृत समूह अभिकल्प (Two Randomi- zed Group Design), (2) समेल समूह अभिकल्प (Matched Group Design), (3) दो से अधिक संयोगीकृत समूह अभिकल्प ( More than two Randomized Grop Design), (4) कारक अभिकल्प (Factorial Design) उपरोक्त अभिकल्पों का संक्षिप्त वर्णन निम्न प्रकार से है:

(अ) एक समूह अथवा अन्दर समूह अभिकल्प (Single Group or Within Subject Design)-

            इस प्रकार के अभिकल्प में प्रयोज्यों का केवल एक समूह होता है और इसी एक समूह पर स्वतन्त्र चर के दो या अधिक मूल्यों को प्रशासित किया जाता है। स्वतन्त्र चर के प्रत्येक मूल्य के प्रभाव में आश्रित चर प्राप्तांक नोट किये जाते हैं। फिर विभिन्न प्रयोगात्मक अवस्थाओं (Treatments or Conditions or Methods) में प्राप्त आश्रित चर प्राप्तांकों की तुलना कर स्वतन्त्र चर के परिवर्तन के प्रभावों को ज्ञात किया जाता है या मूल्यांकन किया जाता है। संक्षेप में एक समूह अभिकल्प में एक ही प्रकार के प्रयोज्यों का भिन्न-भिन्न प्रयोगात्मक अवस्थाओं में अध्ययन करते हैं और इस प्रकार अध्ययन द्वारा प्रयोगात्मक अवस्थाओं के प्रभावों को नोट किया जाता है। उदाहरण के लिए, यदि प्रयोगकर्त्ता प्रत्यक्षात्मक शुद्धता पर LSD का प्रभाव ज्ञात करना चाहता है तो वह इस अभिकल्प में कुछ प्रयोज्यों के एक समूह को चुन लेगा फिर सामान्य अवस्था में उनकी प्रत्यक्षात्मक शुद्धता परीक्षण द्वारा ज्ञात कर लेगा। फिर प्रयोज्य जब LSD के प्रभाव में होंगे तब उनकी प्रत्यक्षात्मक शुद्धता पुनः परीक्षण द्वारा ज्ञात की जायेगी ।

        इस विषय पर हिन्दी में लिखने वाले कुछ विद्वानों का विचार है कि यह अभिकल्प प्रयोग की दृष्टि से उत्तम नहीं है । परन्तु यह सत्य प्रतीत नहीं होता है । सम्भवतः इस अभिकल्प का सर्वप्रथम प्रयोग एविंगहास (1913) ने अपने स्मृति सम्बन्धी प्रयोगों में किया स्मृति और मनोभौतिकी से सम्बन्धित अनेक अध्ययनों में इस अभिकल्प का उपयोग किया गया है (Woodworth & Schlosberg, 1968; Underwood, 1965) आधुनिक अध्ययनों में इस बात के प्रमाण हैं कि कुछ केसेज मैं स्वतन्त्र पर के घटाव बढ़ाव के प्रभाव का जितना अच्छा अध्ययन इस अभिकल्प द्वारा हुआ है उतना अलग समूह अभिकल्प द्वारा नहीं। उदाहरण के लिए शेरियर (Schrier, 1958) ने दृष्टि विभेदक कार्यों पर बन्दरों के कार्य सम्पादन का अध्ययन कर देखा कि अलग समूह अभिकल्प की अपेक्षा एक समूह अभिकल्प अधिक श्रेष्ठ है। इसी प्रकार के परिणाम प्राइस और हन्टर (Grice & Hunter, 1964) ने भी अप्त किये। इन विद्वानों ने आंख की पलकों के अनुबन्धन (Conditioning) पर उत्तेजना की तीव्रता के प्रभाव का अध्ययन किया।

(ब) अलग समूह अभिकल्प अथवा मध्य प्रयोज्य समूह अभिकल्प (Separate Group Design or Subject Design ) - 

           इस प्रकार के अभिकल्प के नाम से ही स्पष्ट है कि इसमें एक से अधिक समूह होते हैं। इस अभिकल्प में स्वतन्त्र चर के प्रत्येक मूल्य के लिए या प्रत्येक प्रयोगात्मक परिस्थिति के लिए एक अलग समूह का प्रयोग किया जाता है। फिर प्रत्येक समूह के आश्रित चर प्राप्तांक के मध्यमान के आधार पर विभिन्न समूहों के कार्य सम्पादन के अन्तर की सार्थकता ज्ञात कर स्वतन्त्र चर के परिवर्तनों के प्रभावों का अध्ययन किया जाता है।
 

मैकगुइगन (1969) ने इस प्रकार के अभिकल्प के निम्नलिखित प्रकार बताये हैं:-

1. दो संयोगीकृत समूह अभिकल्प (Two Randomized Group Design ) - 

            यह अभिकल्प दो समूह अभिकल्प भी कहलाता है। जैसा कि इस अभि कल्प के नाम से स्पष्ट है कि इस प्रकार के अभिकल्प में प्रयोगकर्ता को दो समूह रखने होते हैं तथा वह स्वतन्त्र चर की दो अवस्थाएं (Conditions or Treatments or Methods) चुनता है। ये दो अवस्थाएं वह अवस्थाएँ होती हैं जो परतन्त्र चर को प्रभावित करती हैं स्वतन्त्र चर की धनात्मक अवस्था का प्रयोगात्मक समूह पर उपयोग किया जाता है तथा स्वतन्त्र चर की शून्य अवस्था या मात्रा ( Amount) का नियन्त्रित समूह पर उपयोग किया जाता है। यहाँ यह स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि अध्ययनकर्त्ता दोनों समूहों का चुनाव संयोग या अनियत (Random) विधि द्वारा करता है। इस विधि की विशेषता यह है कि इस विधि द्वारा प्रतिदर्श (Sample ) चुनते समय सम्पूर्ण जाति (Population) की सभी इकाइयों को बराबर महत्त्व दिया जाता है और सभी इकाइयों के चुने जाने की सम्भावना समान भी रहती है। इस विधि द्वारा चुनी हुई इकाइयों को फिर अनियत विधि द्वारा ही दो समूहों में बाँटते हैं। प्रयोग के प्रारम्भ में इन दोनों ही समूहों के मध्यमान में सायंक अन्तर नहीं होता है । इन दोनों संयोगीकृत समूहों में एक को प्रयोगात्मक तथा दूसरे को नियन्त्रित समूह माना जाता है

            प्रयोग में दोनों समूहों के परतन्त चर से सम्बन्धित प्राप्तांक नोट किये जाते हैं । फिर सांख्यिकीय विधियों द्वारा दोनों समूहों के अन्तर की सार्थकता (Significance) शात की जाती है। यदि अन्तर सायंक होता है तो यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि दोनों समूहों के परतन्त्र चर से सम्बन्धित प्राप्तांकों में अन्तर का कारण स्वतंत्र चर का प्रभाव है परन्तु यह निष्कर्षं प्रयोगकर्त्ता तभी निकाल सकता है जब उसने प्रयोग नियन्त्रित दशाओं में किया हो। इस विधि का सबसे बड़ा दोष यह है कि इसमें अध्ययन इकाइयों (Units) या प्रयोज्यों (Subject) की संख्या अधिक रखनी होती है बहुधा इस अभिकल्प में मध्यमान की सार्थकता ज्ञात करने के लिए टी-परीक्षण (t-test ) का उपयोग किया जाता है।

2. दो से अधिक संयोगीकृत समूह अभिकल्प (More than two Ran domized Group Design ) - 

            इस अभिकल्प को बहु-समूह ( Multi-Group) अभिकल्प भी कहा जाता है। मनोविज्ञान के अध्ययनों में दो समूह अभिकल्प की अपेक्षा इस अभिकल्प का उपयोग अधिक किया जाता है क्योंकि इसमें प्रयोज्यों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती है और प्रयोगात्मक नियन्त्रण अपेक्षाकृत अधिक होता है। इस अभिकल्प का प्रयोग बहुधा ऐसी समस्याओं पर किया जाता है; जैसे कार्य पर प्रेरणा का प्रभाव, थकान पर विश्राम का प्रभाव, कार्य परिस्थितियों का उत्पादन या कान पर प्रभाव, सीखने पर अभ्यास का प्रभाव आदि। इस अभिकल्प में अध्ययन- कर्त्ता तीन या अधिक समूहों को संयोगीकरण (Randomization) द्वारा चुनता है । इन समूहों में एक नियन्त्रित समूह होता है तथा अन्य समूह प्रयोगात्मक समूह कहलाते हैं। उदाहरण के लिए, यदि इस अभिकल्प में चार समूह हैं तो एक समूह नियन्त्रित समूह होगा तथा अन्य तीन समूह प्रयोगात्मक समूह होंगे। इस चार समूह अभिकल्प में प्रयोगकर्त्ता स्वतन्त्र चर की चार अवस्थाएँ (Treatments) चुनेगा । स्वतन्त्र चर की तीन धनात्मक मात्राओं का उपयोग तीनों प्रयोगात्मक समूहों पर होगा तथा स्वतन्त्र चर की शून्य मात्रा का उपयोग नियन्त्रित समूह पर होगा ।

            प्रयोग में चारों समूहों के परतन्त्र चर से सम्बन्धित प्राप्तांक नोट किए जायेंगे फिर सांख्यिकीय विधियों द्वारा चारों समूहों के अन्तर की सार्थकता ज्ञात की जायेगी । चारों समूहों में सार्थक अन्तर स्वतन्त्र चर के प्रभाव को दर्शाता है। इस अभिकल्प में सार्थक अन्तर ज्ञात करने के प्रसरण विश्लेषण (Analysis of Variance) अथवा डंकन का रेंज परीक्षण (Duncan's Range Test : Duncan, D. B., 1957) का उपयोग किया जाता है। इस अभिकल्प की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि स्वतंत्र चर के प्रभावों का सूक्ष्म और शुद्ध अध्ययन किया जा सकता है।

3. समेल समूह अभिकल्प ( Matched Group Design ) -

            समेल समूह अभिकल्प 'दो संयोगीकृत समूह अभिकल्प' के समान ही है अन्तर केवल समूह बनाने की विधि में है पहिले अभिकल्प में संयोगीकरण विधि द्वारा प्रयोज्यों को छाँट कर समूह बनाए जाते हैं जबकि इस अभिकल्प में परतन्त्र चर के प्राप्तांकों के आधार पर प्रयोज्यों के समेल जोड़े तैयार किए जाते हैं फिर जोड़े के एक प्रयोज्य को प्रयोगात्मक समूह में तथा दूसरे को नियन्त्रित समूह में रखते हैं। उदाहरण इसी अध्याय में समूहों को समान करने के उपाय शीर्षक के अन्तर्गत समेल जोड़ा विधि पढ़ें। इस अभिकल्प में प्रयोगकर्ता की यह धारणा रहती है कि प्रयोगात्मक उपचार (Treatment) से पहले ही दोनों समूहों के परतंत्र चर मूल्य एक समान हो । प्रयोगात्मक उपचार देने के बाद यह अभिकल्प दो संयोगीकृत समूह अभिकल्प के लगभग समान है। 

4. कारक अभिकस्य ( Factorial Design)-

             इससे पहले वर्णित सभी अभिकल्पों में केवल एक स्वतन्त्र नर का अध्ययन किया जाता है। कारक अभिकल्प में एक से अधिक स्वतन्त्र चरों का अध्ययन एक ही प्रयोग में सम्भव है। मैकगुइन के अनुसार, "एक पूर्ण फारक अभिकल्प वह है जिसमें प्रत्येक स्वतन्त्र पर के चुने हुए मूल्यों के सभी सम्भव संयोजन (Combinations) का अध्ययन किया जाता है। अन्तःक्रिया (Interactions) एक महत्त्वपूर्ण प्रत्यय है तथा इसके ज्ञान का उपयोग अनेक परिस्थितियों में किया जा सकता है। इन अन्तः क्रियाओं के माध्यम से व्यवहार को अधिक अच्छी तरह समझा जा सकता है। इन अन्तःक्रियाओं का अध्ययन भी इस अभिकल्प द्वारा सम्भव है। कारक अभिकल्प की सबसे बड़ी विशेषता ही यहीं है कि इसके द्वारा अन्तःक्रियाओं का अध्ययन सम्भव है। कारक अभिकल्प अनेक प्रकार के होते हैं। 2 x 2 कारक अभिकल्प सबसे सरल है. इसमें दो स्वतन्त्र पर होते हैं तथा प्रत्येक घर के दो स्तर होते हैं। इस प्रकार 2 x 3 कारक अभिकल्प में दो स्वतन्त्र चर होते है तथा एक चर के दो स्तर तथा दूसरे के तीन स्तर होते हैं। हरले तथा हरले (Harley and Harley, 1966) का 2 x 2 कारक अभिकल्प पर एक प्रयोग है जिसमें हिपनोसिस में सीखने का अध्ययन किया गया है। इस प्रयोग में दो स्वतन्त्र चर हैं- (1) प्रयोज्यों की हिप्नोसिस की मात्रा (2) हिप्नोसिस की ग्रहणशीलता चूंकि इन दोनों स्वतन्त्र परों का अध्ययन 2 x 2 कारक अभिकल्प से किया गया है। अतः दोनों स्वतन्त्र घरों के दो-दो स्तर हैं। इस 2 x 2 कारक अभिकल्प में चार प्रयोगात्मक अवस्थाएँ निम्न प्रकार बनती है।

 

 उपरोक्त चित्र से स्पष्ट है कि अभिकल्प में चार प्रकार के प्रयोज्य होंगे या चार प्रायोगिक दशाएँ होंगी। 

ये दशाएँ निम्न होंगी (1) हिफ्नोटाइज्ड एवं निम्न हिपनाटिक ग्रहणशील, (2) नाट पिनोटाइज्ड एवं निम्न हिपनाटिक ग्रहणशील, (3) पिनाटा एवं अधिक पिनाकि ग्रहणशील (4) नाट हिपाटाइड एवं अधिक हिपनाटिक ग्रहणशील सरल सांख्यिकीय गणना के लिए आवश्यक है कि चारों प्रायोगिक दशाओं में समान संख्या के प्रयोज्य होने चाहिए। कारक अका 1, "A complete factorial design is one where all possible combi- nations of the selected values each of the independent variables are used."-F. J. McGuigan, 1969.

सांख्यिकीय विश्लेषण प्रसरण विश्लेषण (Analysis of Variance) तथा F-test द्वारा किया जाता है। उपरोक्त उदाहरण में सांख्यिकीय विश्लेषण से निम्न तीन उपकल्पनाओं की जांच की गई है : ( 1 ) क्या हिपनाटाइज्ड होना सीखने को प्रभावित करता है, (2) क्या हिपनाटिक ग्रहणशीलता सीखने को प्रभावित करती है, (3) क्या हिपनासिस की मात्रा और हिपनाटिक ग्रहणशीलता में अन्तःक्रिया हैं। हरले और हरले ने प्रयोग के उपरान्त पहली उपकल्पना सही पाई तथा दूसरी और तीसरी उपकल्पना गलत सिद्ध हुई । 

5. प्रयोग की कार्य-विधि (Experimental Procedure)

            प्रयोग की कार्य-विधि को प्रयोग आरम्भ करने से पहले ही निर्धारित कर लिया जाता है प्रयोगकर्ता इसके अन्तर्गत विस्तारपूर्वक निश्चित करता है कि किन प्रायोगिक दशाओं में किस ढंग से प्रयोज्यों का परीक्षण किया जायगा, किस प्रकार से कौन-से निर्देश देने होंगे और कौन-से यन्त्र उपकरणों का प्रयोग किया जायगा । प्रयोग की कार्य विधि में तैयारी भी सम्मिलित है; जैसे- प्रयोग में काम आने वाले यन्त्रों को पहले से जांच लिया जाता है तथा प्रयोग में काम आने वाली अन्य सामग्री को भी तैयार कर लिया जाता है । प्रयोग की प्रयोग से पूर्व जो भी कार्य विधि प्रयोगकर्त्ता निश्चित करता है प्रयोग के अन्तर्गत उसमें किसी भी प्रकार का वह परिवर्तन नहीं करता है प्रयोग विधि का अनुसरण कर प्रयोग द्वारा जो आंकड़े प्राप्त होते हैं, उन आंकड़ों का सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है। आधुनिक प्रायोगिक मनोविज्ञान में इस प्रकार के विश्लेषण का बहुत महत्त्व है क्योंकि इस प्रकार के विश्लेषण से प्राप्त frori अधिक शुद्ध और वैज्ञानिक होते हैं। प्रयोग की कार्य विधि में प्रयोगकर्ता को आरम्भ से अन्त तक किस प्रकार और क्या-क्या करना है, इसका वर्णन होता है। 

6. परिणाम, व्याख्या, निष्कर्ष और सामान्यीकरण (Results, Discussion, Conclusion & Generalization)

             प्रयोग द्वारा प्राप्त आंकड़ों को सर्वप्रथम तालिकाबद्ध किया जाता है फिर सांख्यिकीय विश्लेषण किया जाता है तथा जिन आंकड़ों को रेखाचित्र द्वारा प्रदर्शित करना सम्भव होता है उन्हें रेखाचित्रों द्वारा प्रदर्शित किया जाता है। फिर सांख्यिकीय विश्लेषण की सहायता से विवेचना या व्याख्या द्वारा प्रयोग की उपकल्पना पर प्रकाश डालते हैं व्याख्या में परिकल्पनाओं के सही सिद्ध होने या न होने के कारणों पर भी प्रकाश डाला जाता है। प्रयोगकर्त्ता अपने निष्कर्षो की तुलना पूर्व अध्ययनों से भी करता है। यदि प्रयोगकर्त्ता के निष्कर्ष पूर्व अध्ययनों से भिन्न हैं तो वह भिन्नता के कारणों पर भी प्रकाश डालता है। इस प्रकार वह अपने प्रयोग द्वारा प्राप्त निष्कर्षो और अन्य विद्वानों द्वारा प्राप्त निष्कर्षो में सम्बन्ध स्थापित कर प्रयोग से उत्पन्न समस्याओं पर भी प्रकाश डालता है ।

             सामान्यीकरण का अर्थ प्रयोग द्वारा प्राप्त निष्कर्यों के आधार पर इस प्रकार व्याख्या करना है कि प्रतिदर्षं (Sample) पर किये गये प्रयोग के निष्कर्ष सम्पूर्ण जनसंख्या (Population) पर लागू हो सके । सामान्यीकरण तथा निष्कर्ष निकालने की विधियों को अनुमान की विधियाँ भी कहा जाता है इन्हें वैज्ञानिक ज्ञान प्राप्ति की तार्किक विधियाँ भी कह सकते हैं । फ्रान्सिस बेकन (Francis Bacon, 1561- 1626) ने सर्वप्रथम इन तार्किक विधियों के सम्बन्ध में लिखा, तत्पश्चात् मिल (John Stuart Mill, 1806-1873) ने इनको नियमों के रूप में प्रकाशित करवाया । यह विधियाँ निम्नलिखित हैं- (1) धनात्मक सहमति विधि (Positive Agreement_Method), (2) अन्तर विधि (Method of Difference), (3) सहमति तथा अन्तर की संयुक्त विधि (Joint Method of Difference and Agreement), (4) सहपरिवर्तन की विधि (Method of Concomitant Variation), (5) अवशेष विधि (Method of Residue) ।

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