रोगभ्रम
(Hypochondriasis)
इस विकृति में रोगी अपने स्वास्थ्य के बारे में जरूरत से ज्यादा सोचता है तथा उसके बारे में चिंता करता हैा उसके मन में अक्सर यह बात बनी रहती है कि उसे कोई-न-कोई शारीरिक व्याधि या बीमारी हो गयी है और उसकी यह चिंता इतना अधिक हो जाती हैं कि वह अपने दिन-प्रतिदिन की जिंदगी के साथ समायोजन करने में असमर्थ रहता है। DSM-IV (TR) की कसौटी के अनुसार इस तरह की चिंता व्यक्ति में कम-से-कम छह महीना तक बने रहने पर ही उसे रोगभ्रम (Hypochondriasis) की श्रेणी में रखा जा सकता है अन्यथा नहीं। इस विकृति में रोगी की शिकायत किसी एक अंग विशेष तक सीमित नहीं रहती हैं। कभी-कभी उन्हें लगता है कि पेट में कोई भयानक रोग हो गया है तो कभी उनके सिर में कुछ गडबडी नजर आती है। इसी तरह से कभी उन्हें अपने यौन अंगों (sex organs) में किसी ढंग के शारीरिक रोग होने की खौफनाक चिंता होती है। जब ऐसे रोगियों से उनके लक्षण के बारे में विस्तृत रूप से पूछ-ताछ की जाती है, तो वे उसका सही-सही वर्णन करने से असमर्थ रहते हैं। मेडिकल परीक्षण से जब यह बात स्पष्ट हो जाती हैं कि वास्तव में उनकी आशंकाऍं निराधार हैं तो भी उन्हें यह विश्वास नहीं होता हैं कि उनमें कोई रोग नहीं हैं। बल्कि वे मेडिकल परीक्षणों में कुछ कमी रह जाने की बात करते हैं।

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