मानव विकास की अवस्थाएं (Process of Human Development)


 मानव विकास की अवस्‍थाएं (Process of Human Development) 

Process of Human Development
मानव विकास की अवस्थाएं

 प्रस्‍तावना(Introduction):- 

संसार के प्रत्‍येक जीव प्राणी के विकास की प्रक्रिया जन्‍म से लेकर मृत्‍यु पर्यन्‍त तक निरन्‍तर क्रम में चलती रहती हैं। विकास की प्रक्रिया कभी तीव्र अथवा कभी धीमी गत‍ि से चलती हैं। यह प्रक्रिया व्‍यक्ति केे शारीरिक मानसिक व सामाजिक विकास पर निर्भर करती हैं।

मानव विकास की प्रक्रिया में बालक के व्‍यवहार तथा विकास से संबंधित समस्‍याओं का अध्‍ययन किया जाता हैं। इसके अन्‍तर्गत मानव के शारीरिक, नैतिक, बौध्दिक तथा संवेगात्‍मक विकास में परिवर्तन तथा उनके भिन्‍न-भिन्‍न आयु स्‍तर में होने वाले कार्यों एवं क्षमता का अध्‍ययन किया जाता हैं।

''ई. बी. हरलॉक के अनुसार''- विकास प्रगति शील परिवर्तनों का एक नियमित क्रमबध्‍द तथा सुसंबध्‍द क्रम हैं। यह पूर्णत: विकास को निर्देशित करता है। इसमें प्रत्‍येक अवस्‍था में विकास क्रम बध्‍द तथा सुसंगठित होता हैं।

अत: विकास मनोविज्ञान मानव विकास का पूर्णत: प्रदर्शित एवं अध्‍ययन करने वाला विज्ञान हैं।

प्रमुख बिन्‍दु (Main Topic):-

  1. मानव विकास क्‍या हैं।

  2. मानव विकास का अध्‍ययन

  3. मानव विकास के सिध्‍दांत एवं महत्‍व

  4. मानव विकास मे होने वाले परिवर्तन 

  5. मानव विकास के वृद्धि का अर्थ 

  6. विकास में वृद्धि का अर्थ

  7. विकास का महत्‍व

  8. निष्‍कर्ष 

  • मानव विकास क्‍या है:-( What is Human Development)

’पीकूनस और अलब्रेच के अनुसार विकास एक प्रक्रिया है। जिसके द्वारा बच्‍चे या व्‍यक्ति की क्षमताओं का विकास होता हैं, तथा व्‍यक्ति के नपे गुण, योग्‍यताओं नये कौशल का समावेश होता हैं।

विकास की प्रक्रिया जीव में गर्भाधान(जन्‍म) से लेकर मृत्‍यु तक निरंतर रूप से चलती रहती हैं।

अत: मानव व्‍यक्तित्‍व तथा व्‍यवहारों को समझने के लिए गर्भावस्‍था से लेकर प्रौढावस्‍था तक जो अनुक्रम परिवर्तन और संयोजन होते है। उनका अध्‍ययन हम विकासात्‍मक मनोविज्ञान के अन्‍तर्गत करते हैं। साथ ही मानव जीवन से जुडी प्रमुख समस्‍याऍं जैसे:- (1) जन्‍म के समय बच्‍चे की स्थिति (2) बचपन मे बच्‍चे का व्‍यवहार (3) अलग-अलग परिस्थितियों में समान आयु वाले बालकों का बौध्दिक विकास, व्‍यवहार भिन्‍न प्रकार का क्‍यों होता हैं। (4) शैशावस्‍था, बाल्‍यावस्‍था, किशोरावस्‍था तथा प्रौढावस्‍था में होने वाले विकास क्‍या-क्‍या समास्‍या उत्‍पन्‍न होती है।(5) बालक पर जैविक, पर्यावरणीय  तथा सामाजिक कारण किस प्रकार प्रभाव डालते हैं।

इन समस्‍याओं का समाधान कर मानव विकास के अध्‍ययन में प्रमुख शिक्षाथियों, मनोवैज्ञानिक, गृहविज्ञान वेत्‍ता तथा समाजशास्त्रियों ने विकासात्‍मक मनोविज्ञान में अपना योगदान दिया हैं। मानव विकास में, व्‍यवहार, रूचियों तथा लक्ष्‍यों मे होने वाले परिवर्तनों का अध्‍ययन किया जाता हैं। व्‍यक्ति की आवश्‍यकतायें, इच्‍छायें, आकंक्षा सतत् रूप से परिवर्तित होती रहती हैं। 

अत: कहा जा सकता हैं कि मानव विकास के विभिन्‍न पहेलुओ का अध्‍ययन विभिन्‍न आयुस्‍तरों पर संवेगात्‍मक बौध्दिक, विचारात्‍मक, रचनात्‍मक जैसे पहलुओं को ध्‍यान मे रखते हुए गर्भाधान से मृत्‍यु पर्यन्‍त तक अध्‍ययन करने वाला मनोविज्ञान हैं।

  • मानव विकास का सिद्धांत एवं महत्‍व :- (The Study of Human Development Principles and Importance )

मावन विकास का अध्‍ययन करने केे लिए हमे सर्वप्रथम मानव की बाल्‍यावस्‍था की विकास की प्रक्रिया को जानना आवश्‍यक हैं। यह माना जाता हैं,कि बालक का विकास जन्‍म के बाद प्रारम्‍भ होता है। किन्‍तु शिक्षाशास्त्रियों एवं गृह शास्त्रियों के अध्‍ययन से यह बात स्‍पष्‍ट हैं, कि बालक का विकास उसके जन्‍म के बाद न होकर गर्भधारण के समय ही प्रारम्‍भ हो जाता हैं। और यह विकास निरंतर अविराम गति से चलता रहता हैं।

  1. मानव विकास मे होने वाले परिवर्तन:-

हारलॉक- ने विकास से संबंधित चार प्रकार के परिवर्तन बतलाये हैं।

वह प्रक्रिया जिसके अन्‍तर्गत बालक मे शारीरिक तथा मानसिक परिवर्तन निरंतर होते है। यह परिवर्तन सभी बालकों मे एक समान रूप से नही दिखाई पडते। एक समान आयु वाले बालको के यह परिवर्तन भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार से दिखलायी पडते हैं। यह बालक के विकास को प्रभावित करते हैं।

यह निम्‍नलिखित प्रकार हैं:-

(1) आकार मे परिवर्तन (Change-in-size) बालक मे जन्‍म से ही शारीरिक विकास से संबंधित आकार संबंधित परिवर्तन स्‍पष्‍ट रूप से दिखालायी पडते हैं। जैसे-जैसे बालक की आयु बढती हैं। उसके साथ-साथ बालक की लम्‍बाई व वजन मे भी परिवर्तन होता जाता हैं। जैसे बालक के शरीर का आकार व भार जैसे फेफडे,हृदय, आंतो आदि अंगों का आकार व भार आयु वृद्धि के साथ-साथ बढता जाता हैं। और यदि बालक का शारीरिक विकास मे बाधा रहती हैं, तब किसी कारणवंश वह असामान्‍य होता हैं। जैसे कि यदि बालक का मानसिक विकास पूर्ण रूप से नही हो पाता है तो उसका प्रभाव बालक के शारीरिक विकास पर भी पूर्णरूप से पडेगा। बालक की आयु बढने से साथ-साथ शिशु के शब्‍द भण्‍डार (भाषा-विकास), चिन्‍तन क्रिया, स्‍मरणशक्ति ,तर्कशक्ति, कल्‍पनाशक्ति आदि मेे भी विस्‍तार हो पाता हैं।

(2) परिणाम मेें परिवर्तन:- (Change-in-proportion) बालक के बाह्य अंगों तथा आन्‍तरिक अवयवों के आकार मे ही परिवर्तन नही होता बल्कि उसके अनुपात मे भी परिवर्तन होता हैं। एक शिशु व एक वयस्‍क को शारीरिक अनुपात मे पर्याप्‍त अन्‍तर स्‍पष्‍ट रूप से दिखलायी पडता हैं।

(3) पुराने अंगो का गायब होना:-(Disappearance of old features) विकास के अन्‍तर्गत एक महत्‍वपूर्ण परिवर्तन यह है, कि व्‍यक्ति मे कुछ अंगों का धीरे-धीरे लुप्‍त हो जाना जैसे- थाइमस ग्रंथि पीनियल ग्रंथि व बचपन के बाल तथा दांतों का लुप्‍त हो जाना।

(4) नयी विशेषताओं का उदय :- (Acquisition of new features)  पुराने अंगों के लुप्‍त होने के साथ कुछ नये अंगो का विकास भी होता हैं। शारीरिक विकास जैसे:- दॉंतो का निकलना मानसिक विकास, भावना का ज्ञान, इच्‍छा नैतिकता,धर्म, विश्‍वास, विभिन्‍न क्षेत्र भाषाओं का ज्ञान आदि का समय-समय के साथ उदित होना, विकसित नई विशेषताओं का उदित होना हैं।

  • विकास में वृद्धि का अर्थ:-(Meaning of Growth)

मानव मनोविज्ञान में हम वृद्धि और विकास का अध्‍ययन साथ-साथ करते हैं। वृद्धि का तात्‍पर्य शारीरिक आकार(size) से हैं। यह शारीरिक वृद्धि गर्भाधान के दो सप्‍ताह से लेकर 20-22 वर्ष की अवस्‍था तक बढती जाती हैं। इस प्रकार वृद्धि एक विशिष्‍ट विकास से संबंधित हैं। जो शारीरिक संरचना से संबंधित हैं। गैसल के अनुसार ''Growth is a process so intricate and so sensitive there must be powerful stabilizing factors intrinsic rather extrinsic which preserve the balance of the child pattern and the direction of the growth. 

अत: जीव में वृद्धि और विकास की प्रक्रिया साथ-साथ चलती हैं। 

  • विकास का अर्थ:- (Meaning of Development)

विकास एक निरन्‍तर चलने वाली प्रक्रिया हैं। यह निरन्‍तर चलती रहती हैं। यह किसी समय तीव्र गति से और किसी समय मन्‍द गति से चलती हैं। जबकि परिवर्तन इसमें निरंतर होता रहता हैं। 

अत: हम कह सकते है कि व्‍यक्ति का शा‍रीरिक एवं मानसिक विकास जीवन पर्यन्‍त चलता रहता हैं। 

  • विकास का महत्‍व (Importune of Development) 

बालक के विकास का क्रमबद्ध अध्‍ययन करने पर यह ज्ञात होता हैं कि व्‍यक्ति में किस प्रकार नयी-नयी विशेषतायें एवं योग्‍यतायें उत्‍पन्‍न होती हैं। मानव विकास की प्रक्रिया में हमें व्‍यक्ति के सामान्‍य विकास को समझने में मद्द मिलती हैं। इससे बच्‍चों के विभिन्‍न अवस्‍थाओं जैसे शारी‍रिक, मानसिक, सामाजिक विकास के संबंध में पूर्ण रूप से समझने मे सहायता मिलती हैं। 

  • मानव विकासात्‍मक अवस्‍थायें एवं विशेषतायें:- (human Development Stages and characteristics) 

लाउटन(Lowton) ने विकास की प्रमुख अवस्‍थाओं की चर्चा करते हुए कहा हैं कि हमारे जीवन का विकास अनेक भागों में बॉंटा हुआ हैं। प्रत्‍येक भाग में व्‍यावहारिक गतिशीलता की अपनी समस्‍याऍं हैं। 

अत: यह समस्‍या को हल करने की एक प्रणाली हैं। 

विकास की प्रक्रिया यद्यपि एक हैं किन्‍तु उसका विभाजन अनेक अवस्‍थाओं में होता हैं। 

शैले -(shelly) ने विकास का वर्गीकरण निम्‍नलिखित प्रकार से किया हैं

  •  शैशावस्‍था (Infancy) जन्‍म से 5 वर्ष तक

  • बाल्‍यकाल(Childhood) 6 वर्ष से 12 वर्ष तक 

  •  किशेरावस्‍था(Adolescent) 12 से 18 वर्ष तक 

 रॉस ने विकास की अवस्‍थाऐं निम्‍न लिखित प्रकार से बतलायी:- 

  •  शैशावस्‍था 1 से 3 वर्ष तक 

  • आरंभिक बाल्‍यकाल 3 से 6 वर्ष तक 

  • उत्‍तर बाल्‍यकाल 6 से 12 वर्ष तक 

  •  किशोरावस्‍था 12 से 18 वर्ष तक 

 कॉलसनिक (Kolosnic) ने विकास प्रक्रिया का वर्गीकरण अपेक्षाकृत अधिक चरणों में किया हैं:-

  •  गर्भाधान से जन्‍म काल तक पूर्व जन्‍मकाल (prenatal period) 

  • नवशैशव (Neonatal) जन्‍म से 3 या 4 सप्‍ताह तक

  • आरंभिक शैशव (Early infancy) 1 से 15 माह 

  • अन्‍तर शैशव(Late infancy) 15 से 30 माह तक 

  • पूर्व बाल्‍य काल (Early childhood) 2 से 5 वर्ष तक

  • मध्‍य बाल्‍यकाल (Middle childhood) 6 से 12 वर्ष तक 

  • किशोरावस्‍था (Adolescence) 12 से 21 वर्ष तक 

उर्पयुक्‍त वर्गीकरण को ध्‍यान में रखते हुए हम विकास की विभिन्‍न अवस्‍थाओं का वर्णन निम्‍नाकिंत प्रकार से कर सकते हैं। 

  •  जन्‍म से पूर्व अवस्‍था (Prenatal period ) 

  • शैशवास्‍था (Infancy)

  • पूर्व बाल्‍यावस्‍था (Early childhood )

  • उत्‍तर बाल्‍यावस्‍था ( Late childhood)

  • किशोरावस्‍था ( Adolescence )

  • प्रोढावस्‍था ( Adulthood )

(1) जन्‍म से पूर्व की अवस्‍था( Prenatal period) यह अवस्‍था गर्भधारण से लेकर जन्‍म काल तक की अवस्‍था हैं। माता के रजकण  डिम्‍ब (ovum) तथा पिता के शुक्राणु (Sperm) का जैसे ही निषेचन (fertilization) होता है । वैसे ही विकास प्रारम्‍भ हो जाता हैं। 

इस अवस्‍था मे भ्रूण नौ माह तक तीव्रगति से माता के गर्भ मे विकसित होता रहता  हैं। 9 माह बाद यह पूर्ण विकसित शिशु के रूप में जन्‍म लेता हैं। 

इस अवस्‍था को 3 भागों में बांटा गया हैं। 

(a) डिम्‍ब अवस्‍था ( The period of ovum) 

(b) भ्रूण अवस्‍था ( The period  embryo)

(c) गर्भस्‍थ शिशु अवस्‍था ( The period foetus)

(a) डिम्‍ब अवस्‍था:- यह अवस्‍था बीजावस्‍था (germinal period) कहलाती हैं। जिसकी अवधि गर्भधारण से दो सप्‍ताह तक होती हैं। इस अवस्‍था में निषेचित डिम्‍ब (fertilised ovum ) तथा जाइगोट (zygote) गर्भधारण के बाद लगभग एक सप्‍ताह तक गर्भाशय में तैरता रहता है। 10 - 12 दिन में वह डिम्‍ब गर्भाशय की दीवाल से चिपक जाता हैं। 

(b) भ्रूण अवस्‍था:- यह अवस्‍था 2 से 8 सप्‍ताह तक होती हैं। यह जीव भ्रूण अवस्‍था कहलाती हैं। इस अवधि में भ्रूण में अनेक बाह्य तथा आन्‍तरिक अंगों का विकास होता हैं। 2 महिने के अन्‍त तक भ्रूण की आकृति मानव रूप ग्रहण कर लेती हैं। इस अवस्‍था में भ्रूण को अपेक्षित संरक्षण एवं पोषण विशेष रूप से प्राप्‍त होना चाहिए , तथा मानसिक तनाव व शारीरिक कष्‍टो से बचना चाहिए । उचित पूर्ण पोषण प्राप्‍त न होने पर शिशु में विकासात्‍मक विकृतियॉ उत्‍पन्‍न हो जाती हैं। 

(c) गर्भस्‍थ शिशु अवस्‍था:- यह अवधि 8 सप्‍ताह से जन्‍मकाल तक की होती हैं। इस अवस्‍था मे बाह्य एवं आंतरिक अंगों का विकास निरंतर चलता रहता हैं। समयावधि के साथ-साथ गर्भस्‍थ शिशु का वजन व लम्‍बाई बढने लगती हैं। जन्‍म के समय शिशु का औसत वजन 2.4 किलोग्राम से 3.2 किलोग्राम तथा लम्‍बाई सामान्‍यत: 47 से.मी. से 52 से;मी. तक हो जाती हैं। सिर का भार सम्‍पूर्ण शरीर के लगभग 1/4 भाग के बराबर होती हैं। सम्‍पूर्ण ज्ञानेन्द्रियों का विकास भी इसी अवधि मे शुरू हो जाता हैं। अन्‍त में ऑंख का रेटिना (Retina) कान की यूस्‍टेशियन नलिका ( Eustachian Tube ) स्‍पर्श संवेदना आदि विकसित हो जाती हैं। 

(2) शैशावस्‍था (Infancy) - यह अवस्‍था जन्‍म से 2 वर्ष तक की हैं। जन्‍म अवधि में विकास की गति बहुत कम होती हैं। 2 सप्‍ताह बाद शिशु के विकास की प्रक्रिया बहुत तीव्र हो जाती हैं। बच्‍चों मे संवेदी तथा मांसपेशीय कौशलों का विकास होता हैं। दूसरे वर्ष केे अंत तक बच्‍चे मे पर्याप्‍त सुक्ष्‍म क्रियात्‍मक कौशल का विकास हो जाता हैं। इस अवस्‍था मेे बालक अपनी आवश्‍यकताओं के लिए दुसरों पर निर्भर रहता हैं, साथ ही मांसपेशियों पर उसका नियंत्रण भी बढता जाता हैं। जैसे:- वह वस्‍तुओं को पकडने स्‍वयं चलने उठने, बोलने, खेलने, जैसी क्रियाओं निपुण हो जाता हैं। 

(3) पूर्व बाल्‍यावस्‍था (Early Childhood) - यह अवस्‍था 2 वर्ष से 7 वर्ष की होती है इस अवस्‍था मे बालक बोलने संबंधित क्रियाऍं जैसे चलना,दौडना, गेन्‍द को फेकना आदि क्रियाऐं सीख जाता हैं। 3 वर्ष की आयु मे बच्‍चा वयस्‍कों की तरह भाषा का प्रयोग करने लगता हैं। धीरे-धीरे बच्‍चे मे प्रेरणा,इच्‍छाशक्ति का विकास होता हैं। इस अवस्‍था मेे बच्‍चा प्रश्‍न पुछना तथा उत्‍तर सीख जाता हैं। 

(4) उत्‍तर बाल्‍यावस्‍था (Late Childhood)- यह अवस्‍था की अवधि 6-7 वर्ष से लेकर 11 वर्ष तक की होती हैं। इस अवस्‍था मे पूर्ण आत्‍मविश्‍वास तथा गुणों विकास होता हैं। इस अवस्‍था मे बच्‍चे खेलना पसंद करते हैं। बच्‍चे स्‍कूल जाने लगते हैं, मित्र तथा समाज के बीच रहकर वह जीवन की वास्‍तविकता से परिचित होने लगते हैं। इस अवस्‍था मे बालक लिखना, स्‍नेह  आदि की भावना को समझने लगते हैं। 

(5) किशोरावस्‍था (Adolescence)- प्राय: 11 -12 से लेकर 21 वर्ष तक की अवस्‍था किशोर अवस्‍था होती हैं। इस अवस्‍था मेे विकास तीव्रगति से होता हैं। यह परिवक्‍वता की अवस्‍था कही जाती हैं। इस अवस्‍था में आवाज मे भारीपन प्रजनन अंग(Reproductive System) मे तीव्रता से विकास, विपरित लिंग का प्रति आकर्षण तथा किशोरों केे मन मे तनाव उत्‍पन्‍न हो जाता हैं। साथ ही वे काफी संवेदनशील हो जाते हैं। 

(6) प्रौढावस्‍था ( Adulthood) - यह अवस्‍था 21 से 40 वर्ष की होती है इसमे मानव पूर्ण परिपक्‍व व्‍यक्ति होता है, इस अवस्‍था में उत्‍तरदायित्‍व, कर्तव्‍य तथा उपलब्‍धि प्राप्‍त करने का भार बढ जाता हैं। आवश्‍यकताओ की पूर्ति, भरण-पोषण करना व्‍यक्ति के दायित्‍व हैं। 

अत: जो जीवन पर्यन्‍त चलती हैं इस विकास की कुछ अवस्‍थायें होती हैं।जिनके अनुसार बालक का संपूर्ण विकास होता हैं। 

निष्‍कर्ष:- 

विकास शारीरिक व्‍यवस्‍था में एक लंबे समय से होने वाले सतत् परिवर्तन का एक अनुक्रम हैं। अत: मानव विकास मे बालक के व्‍यवहार तथा विकास संबंधी समस्‍याओं का अध्‍ययन एवं मानवों के शारीरिक, नैतिक, बौद्धिक विकास संवेगात्‍मक परिवर्तनों तथा विभिन्‍न आयु स्‍तरों वाले कार्यों एवं क्षमता का अध्‍ययन किया जाता हैं।







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