श्रवण उद्दीपक (Auditory Stimulus )
श्रवण की संवेदनशीलता व्यक्ति को कान के द्वारा होती है। विभिन्न उद्दीपकों से निकली ध्वनि तरंगे ( Sound Waves) हमारे कानों को उद्दीप्त करती है। यह देखा गया है कि भौतिक वातावरण के उद्दीपकों में जब कम्पन उत्पन्न होता है अथवा जब ध्वनि स्रोत में कम्पन्न उत्पन्न किया जाता है तो उद्दीपक अथवा ध्वनि स्रोत से ध्वनि तरंगे उत्पन्न होती है। यह ध्वनि तरंगें चारों ओर के वातावरण में फैल जाती है। ध्वनि तरंगो को फैलने के लिए माध्यम की आवश्यकता होती है; भौतिक वाता वरण में बहुधा हवा माध्यम हुआ करती है। यह ध्वनि तरंगें हवा में होती हुई जब कान में प्रविष्ट होती है तो कान में स्थित ग्राहक उद्दीप्त होते हैं. और जब प्रद्दीपक की सूचना मस्तिष्क को पहुँचती है तब व्यक्ति को ध्वनि संवेदनशीलता का अनुभव प्राप्त होता है ध्वनि तरंगों की गति 1100 फुट प्रति सेकण्ड होती है। विभिन्न उद्दीपकों से निकली ध्वनि तरंगों की आवृत्ति भिन्न-भिन्न होती है। भिन्न-भिन्न आवृत्तियों वाली ध्वनि तरंगें हमारे कान पर भिन्न-भिन्न मात्रा में प्रभाव डालती है। यह देखा गया है कि 20 मे 20,000 आवृत्ति प्रति सेकण्ड वाली ध्वनि तरंगें ही मनुष्य के कान को प्रभावित करती है। इस सीमा से अधिक या कम की ध्वनि तरंगें व्यक्ति को सुनाई नहीं पड़ती हैं।
ध्वनि तरंगों की प्रमुख भौतिक विशेषताएँ आवृत्ति और तीव्रता है। ध्वनि तरंगों की कुछ मनोवैज्ञानिक विशेषताएं भी है- (1) वारता (Pitch) ध्वनि तरंग की तीक्ष्णता और मोटाई के सूचक है (2) उच्चता (Loudness) मन्द, मध्यम, तेज, अतितीव आदि विशेषताएँ उच्चता सूचक है। (3) लक्षण (Timbre or Quality) - इस लक्षण के आधार पर समान आवृत्ति वाले दो स्वरों में अन्तर की पहिचान की जाती है।
(Auditorp Receptors) श्रवण-संग्राहक कान है। ध्वनि तरंगों की अनुभूति कान की संरचना पर भी निर्भर करती है। मनुष्य के पास यदि कान न हों तो वह वातावरण के तमा उद्दीपकों को न सुन पाता, न आनन्द ले पाता और उसे इन उद्दीपकों को समझने में भी अधिक कठिनाई रही होती मुख्यतः कान की संरचना को निम्न तीन भागों के बाँटा गया है :-
1. बाहरी कान (Outer Ear ):-
( बाह्य कान के तीन मुख्य भाग बाह्य हस्थमान भाग (Pinna), कान की नली (Ear Canal) तथा कान का पर्दा (Tympanic Membrane or Ear Drum) है। पिना का मुख्य कार्य ध्वनि तरों, जो इसके सामने की ओर से टकराती है. को कान की नमी की ओर मोट देना होता है। इसकी संरचना इस प्रकार होती है कि इस पर सामने की ओर से टकराने वाली ध्वनि तरंगे स्वतः ही कान की नमी की ओर मुड़ जाती है। कुछ पशुओं में इनकी संरचना इस प्रकार होती है कि वह इसे घुमा-फिरा सकते हैं, इससे ध्वनि को ग्रहण करने में अधिक सरलता होती है। द्वितीय भाग कर्ण नलिक (Ear Canal or Auditory Meatus) है. इसकी लम्बाई लगभग 25 मि० मी० तथा व्याय 7 मि० मी० होता है। यह टेढ़ी-मेढ़ी होती है. इसमें एक भूरा स्राव निकलता है, जिससे हानिकारक वस्तुओं से कान की रक्षा होती है। मध्य कान का प्रारम्भ कान के पद (Ear Drum) से होता है। यह झिल्ली संवेदनशील होती है। बाहर से आई अवनि तरंगें इस झिल्ली में कम्पन उत्पन्न करती हैं।
2. मध्य कान (Middle Ear ):-
कान के पर्दे के पीछे वाले छोटे स्थान को मध्य कान कहा जाता है। कान के इस छोटे भाग में तीन छोटी हड्डियां होती है- होरा (Malicus), निहाई ( Incus) तथा रकाब (Stapes) | यह तीनों हडिडयाँ कान के पर्दे से जुड़ी हुई होती हैं। पर्दे से हथौड़ा, हथोड़े से निहाई और निहाई में काय जुड़ी हुई होती है। अतः कान के पर्दे में होने वाले कम्पन इन हड्डियों में कम्पन उत्पस कर देते है। यह हड्डियां ध्वनि तरंगों की ऊंचाई (Amplitude) को कम कर आन्तरिक कान में भेजती हैं। रकाब (Stapes) मध्य काल के अन्त में बनी एक अण्डाकार खिड़की से जुड़ी हुई होती है, अतः रकाब में उत्पन्न कम्पन इस सड़क के द्वारा आन्तरिक कान में प्रविष्ट कर जाते हैं। जब मध्य कान की यह हडिय ध्वनि तरंगों की ऊँचाई को कम करती हैं तो ध्वनि तरंगों में आगे बढ़ने का दबाव बड जाता है यह दबाव बढ़ना इसलिए आवश्यक होता है कि अण्डाकार खिड़की का क्षेत्र कान के पर्दे का केवल एक बीसवां भाग होता है। मध्य कान की आस्टी शियन ट्यूब (Austachian tube) का कार्य काम के पर्व के दोनों ओर वायुमण्डलीय (Atmospheric) दबाव का सन्तुलन बनाए रखना होता है।
3. आन्तरिक कान (Inner Far):-
इसकी संरचना अपेक्षाकृत अधिक जटिल होती है। अवण संवेदना का मुख्य ग्राहक कोकिलया ही है। इसकी आकृति घोष जैसी घुमावदार होती है। घुमावदार (Coiled) आकृति के कारण ही इसका नाम कोकिलिया पड़ा । इस कोकिनिया का आधार चौड़ा तथा अन्त पतला नौकनुमा होता है। कोकलिया की गुहा (Cavity) में तीन नलिकाएं होती हैं Scala Vestibuli, Scala Media तथा Scala Tympani यह तीनों नलिकाएँ कोफिलिया की पूरी लम्बाई तक होती हैं तथा इनमें तरल पदार्थ भरा हुआ होता है। Scala Vestibuli तथा Scala Media के मध्य जो झिल्ली होती है वह Reissner's membrane कहलाती है। इसी प्रकार Scala media तथा Scala tympani के मध्य जो झिल्ली होती है वह Basilar membrane कहलाती है। Scala media तथा Scala tympani के मध्य बेगलर मेम्बरेन पर एक संरचना होती है जिसे Organs of Corti कहते हैं। इस संरचना में अनेक सेल्स होते हैं, इन सेल्स में प्रमुख सेल्स हेयर होते हैं क्योंकि यही सेल्स श्रवण उत्तेजना के प्रति दैहिक प्रत्युत्तर देते हैं। चूंकि Organs of Corti कोकिलिया के बेस से अन्त तक होती है, अतः यह हेयर सेल्म भी इस पूरी संरचना में होते हैं। यह देखा गया है कि Basilar membrane पर ध्वनि तरंगें आती है। तो यह हेयर सेल्स को उद्दीप्त करती है, जिससे हेयर केल्स में विद्युत रासायनिक आवेग बनता है यह आवेग जब स्नायुओं द्वारा मस्तिष्क को पहुँचता है, तब व्यक्ति को ध्वनि की संवेदनशीलता होती है।
कोकिलिया का ध्वनि वर्द्धन (Cochlear Microphonics) -
कोकिलिया के ध्वनि वन का व्यवस्थित रूप से अध्ययन डेविस (Davis, 1959) ने किया है। स्वेला मिडिया के आन्तरिक भाग में विद्युत का धनात्मक आवेग होता है। इस आवेग को इन्डोकाकिलियर पोटेन्शियल या Endolymphatic Potential कहा जाता है। श्रवण उद्दीपक को समझने के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण कोफिलियर माइको- फोनिक पोटेन्शियल है यह पोटेन्शियल हेयर सेल्स में उत्पन्न होता है तथा जनरेटर पोटेन्शियल का कार्य करता है। इस जनरेटर पोटेन्शियल से ही हेयर सेल्स से सम्बन्धित नर्व फाइबर्स जो मस्तिष्क को जाते हैं, उद्दीप्त होते हैं । चूंकि यह सिस्टम माइक्रोफोन के विद्युत रिकार्ड की भाँति होता है, इसीलिए इसे माइक्रोफोनिक कहते हैं ।


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