जीने पियाजे (jean Piaget) का जन्म 1896 में हुआ था। उनकी प्रारम्भिक शिक्षा जीव विज्ञान विषय में हुई तथा इसी विषय में उन्होंने डाक्टरेट की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने बच्चों की बुद्धि के मापन तथा गलत प्रत्युत्तर देने के कारणों को जानने में विशेष रूचि दिखाई। पियाजे ने जेनेवा(Geneva) में बच्चों के विकास के अध्ययन के लिए एक लेबोरेटरी स्कूल आरम्भ किया । वह जन्तुविज्ञान में प्रशिक्षित थे लेकिन उनका कार्य मनोविज्ञान के क्षेत्र में अधिक होने के कारण वह एक मनोवैज्ञानिक के रूप में ही प्रसिद्ध हुए।
बैद्धिक विकास की व्याख्या करने के लिए उपयोग किये शब्दों जैसे- सात्मीकरण, व्यवस्थापन एवं संगठन आदि को चुनने में पियाजे का जैविक प्रभाव स्पष्ट दिखाई पडता हैं। पियाजे ने व्यक्ति को एक क्रियाशील जैविक जीव की तरह माना है जो कि स्थिर रूप से वातावरण के साथ अन्त:क्रिया करता है तथा इस अन्त:क्रिया के द्वारा वह अपने ज्ञान को तीन रूपों में प्राप्त करता हैं:-
(i) बाह्य पदार्थ के बारे में।
(ii) स्वयं के बारे में और,
(iii) अपने तथा पदार्थ के संबंध में।
विकास की चार मुख्य अवस्थायें निम्न प्रकार से हैं:-
1. संवेदना गति अवस्था
(Sensory-motor Period)
यह जन्म से 24 महीने की अवस्था हैं। इस आयु में बालक की बुद्धि उसके कार्यों द्वारा व्यक्त होती हैं। जैसे चादर पर पडे खिलौने को बच्चा चादर खींचकर प्राप्त कर लेता हैं। पियाजे इस कार्य को ऑपरेशन(Operation) न कहकर कार्य योजना(scheme of action) की संज्ञा देते हैं। पियाजे ने सेन्सोरोमोटर अवस्था को पुन: निम्न छ: अवस्थाओं में विभाजित किया हैं-
(i) Reflexes- जन्म से एक माह तक ।
(ii) Primary circular reactions- एक से तीन माह तक।
(iii) Secondary circular reactions- चार से छ: माह तक।
(iv) Coordination of secondary reactions- सात से दस माह तक।
(v) Tertiary circular reaction- ग्यारह से अट्ठारह माह तक।
(vi) Final stage of this period- अट्ठारह से चौबीस माह तक।
2. प्री- ऑपरेशनल अवस्था
(Preoperational Period)
यह अवस्था दो वर्ष से सात वर्ष तक की होती हैं। इस अवस्था में नई सूचनाओं और अनुभवों का संग्रह होता हैं। यह अवस्था पहली अवस्थाओं की अपेक्षा अपनी समस्याओं का समाधान करने योग्य हो जाता हैं। इस अवस्था में आत्म केन्द्रीकरण(self-centralization) का उदय होता हैं। इस अवस्था के अन्त तक जब बालक में पूर्णता सामाजिक विकास हो जाता हैं। तब उसका आत्म-केन्द्रित होना कुछ कम होने लगता हैं।
3. कॉन्क्रीट ऑपरेशन अवस्था
(Concrete Operation Period)
यह अवस्था सात वर्ष से ग्यारह वर्ष तक की होती हैं। इस अवस्था में बालक यह विश्वास करने लगता हैं कि उसकी लम्बाई, भार, उॅचाई आदि स्थिर रहते हैं। वह कार्यों की मानसिक प्रतिभा प्रस्तुत कर सकता हैं। वह किसी कथन या उसके संबंध में तर्क-विचार कर सकता हैं, अर्थात् वह अपने चारों ओर के वातावरण के साथ अनुकुल रहने के लिए अपने अनुसार नियमों को सीख लेता हैं।
4. फॉरमल ऑपरेशन अवस्था
(Formal Operation Stage)
यह अवस्था ग्यारह वर्ष से प्रारंभ होकर प्राैढावस्था तक की होती हैं। इस अवस्था में वह परिकल्पनात्मक ढंग से विचार कर अपनी समस्याओं का समाधान कर सकता हैं। वह अनेक ऑपरेशन को संगठित कर उच्च स्तर के ऑपरेशन का निर्माण कर सकता हैं। इस प्रकार वह विभिन्न प्रकार की समस्याओं के समाधान के लिए वह अनेक नियमों का निर्माण कर इस योग्य हो जाता है कि एक समस्या विशेष का प्रत्येक संभव तरीके से विचार कर समाधान कर सकें। बालक की अवस्था से दूसरी अवस्था में जाना उसकी परिक्वता एवं अनुभवों को प्रभावित करता हैं। एक विशिष्ट बालक के विकास में वातावरण या संस्कृति का एक विशेष स्थान होता हैं। जिसके फलस्वरूप मानसिक वृद्धि होती हैं लेकिन मानसिक विकास की अवस्था का फिर भी सामान्य रहता हैं। पियाजे ने इस सिद्धांत को तीन वर्गों में महत्वपूर्ण बतलाया हैं:-
(i) बालक अधिक या कम क्रमिक फैशन में एक आदर्श विचार को विकसित करता हैं।
(ii) बालक समप्रत्यय संबंधी विचार की उच्च अवस्था पर जाने से पहले निम्न अवस्था पर
जिस प्रकार की निर्भर रहता हैं। मास्टरी हासिल करता हैं।
(iii) बालकों मे तार्किक चिन्तन (Logical- Thinking) के विकास के लिए प्रशिक्षण और
साधन दोनों महत्वपूर्ण होते हैं।
पियाजे ने आधारभूत प्रत्यय
(Basic Concept of piaget’s Theory)
पियाजे के सिद्धांत के कुछ आधारभूत प्रत्यय निम्न हैं:-
(i) निर्माण और खोज ( Construction and invention)
बालक अपने व्यवहारों और विचारों का का समय-समय पर खोज तथा निर्माण करते रहते हैं, जिन व्यवहारों और विचारों का उन्होनें भी नही देखा होता हैं। पियाजे का मत है कि ज्ञानात्मक विकास केवल नकल(Copying) न होकर खोज पर आधारित हैं। उदाहरण :- एक चार वर्ष का बालक अलग-अलग के आकार क ब्लॉकों को क्रमानुसार लगा लेता हैं तो यह उसके बौद्धि विकास एवं नैतिक विकास से संबंधित हैं।
(ii) कार्य-क्रिया का अर्जन (Acquisition of Operation)
कार्य-क्रिया का तात्पर्य बालक में उस विशिष्ट प्रकार के मानसिक क्रम(Mental Routine) से हैं, जिसकी विशेषता उत्क्रमणीयता हैं। प्रत्येक कार्य की क्रिया का एक तर्कपूर्ण उद्देश्य होता हैं। उदाहरण:- पियाजे का विचार है कि जबतक बालक किशोरावस्था तक नही पहूंचता तबतक वह भिन्न-भिन्न विकास अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न वर्गों में कार्य-क्रियाओं का अर्जन करता रहता हैं। उसके विकासावस्था से दूसरी अवस्था के पदार्पण के लिए निम्न दो तथ्य आवश्यक हैं:-
(a) सात्मीकरण(Assimilation)
सात्मीकरण का अर्थ हैं, बालक में उपस्थित विचार या वस्तु में किसी नये विचार या वस्तु का समावेश हो जाना। पियाजे के विचार से तात्पर्य बालक के प्रत्यक्षात्मक-गत्यात्मक समन्वय(perceptual co-ordination ) से हैं।
(b) व्यवस्थापन तथा सन्तुलन स्थापित करना(Accordonate and equilibration)
व्यवस्थापन का अर्थ किसी नयी वस्तु या विचार के साथ समायोजन करना हैं, अथवा अपने विचारों एवं क्रियाओं को नये विचार एवं वस्तुओं में विद्यमान करना हैं। मानसिक विवृद्धि में सात्मीकरण और व्यवस्थापन में उत्पन्न तनाव का हल निहित होता हैं। यह उस समय उत्पन्न होता हैं, जब बालक नई अनुक्रियाओं को नई समस्याओं के समाधान में फिट करता हैं। जिसका उसका बौद्धिक विकास परिपक्व होता हैं । इस प्रकार का व्यवस्थापन संतुलित कहलाता हैं। पियाजे ने बालविकास में रूचि रखते हुए। उन्होने अपने विकास की अवस्थाओं के शैक्षिक उपयोग को विशेष रूप से नही बतलाया हैं।

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