फ्रायड का मनोविश्‍लेषणवाद (Freud’s Psychoanalysis)



  व्‍यक्तित्‍व व्‍यक्ति के मनोदेहिक शील गुणों(Traits) का गतिक या गत्‍यात्‍मक संगठन मनोविश्‍लेषणवाद हैं। व्‍यक्ति पर्यावरण के साथ प्रतिक्रिया करता हैं। तथा इन्‍ही के आधार पर व्‍यक्तित्‍व के मनोदेहिक शील गुणों का विकास होता हैं, अर्थात व्‍यक्तित्‍व के गतिक उपागमों के आधार पर हम व्‍यक्तित्‍वशील गुणों को समग्र रूप से समझा सकते हैं। इसकी व्‍याख्‍या मनोसामाजिक- जैव(Psycho-Socio-biological) के आधार पर करते हैं। असामान्‍य व्‍यवहारों को इन्‍ही आधारों पर समझा जा सकता हैं तथा असामान्‍य व्‍यवहारों के गतिक उपागम की शुरूआत करने का श्रेय फ्रायड का मनोविश्‍लेषणवाद को हैं। व्‍यवहार के मनोगतिकीय को समझने के लिए फ्रायड के योगदानों के समझना आवश्‍यक हैं क्‍योंकि फ्रायड ने एक लंबी अवधि तक इस संबंध में उल्‍लेखनीय शोध-कार्य किये हैं, तथा उसें अनेक आलोचनाओं वह विरोधों का सामना करना पडा। इस विरोध का मुख्‍य कारण फ्रायड का अत्‍याधिक लैंगिग तत्‍वों को महत्‍व देना था। फ्रायड का जन्‍म आस्‍ट्रेलिया में सन् 1856 में हुआ था। शुरूआत मे उन्‍होंने वियाना(Vienna) में न्‍युरोलोजिस्‍ट की तरह कार्य किया।फ्रायड पहले व्‍यक्ति थे। जिन्‍होने सर्व प्रथम बाल्‍यावस्‍था के अनुभवों को व्‍यस्‍क व्‍यवहार और चैतन्‍यता का आधार बतलाया। वह यह विश्‍वास रखते थे कि व्‍यस्‍क व्‍यक्ति का व्‍यक्तित्‍व समायोजन काफी कुछ उसके बाल्‍यावस्‍था एवं प्रौढावस्‍था से संबंधित होता हैं। उन्‍होने जीवन के प्रारंभिक वर्षों( जन्‍म से 14 वर्ष) की अवस्‍था को अधिक महत्‍व दिया। इस अवस्‍था में बाल्‍यावस्‍था के अनुभवों,उनका महत्‍व, अध्‍ययन का व्‍यक्तित्‍व विकास के गुण दोष, इस अवधि में अत्‍याधिक रूप से प्रभाव डालते हैं। इस सिद्धांत के अनुसार व्‍यक्तित्‍व अवस्‍थाओं को विकास होता हैं और बाल्‍यावस्‍था में प्रवेश के साथ आगे बढती जाती हैं। यह सिद्धांत यह बतलाता हैं कि प्रत्‍येक व्‍यक्ति के लिए काम या आनंद की इच्‍छा के लिए उर्जा की मात्रा सीमित हैं । बाद की अवस्‍थाओं मे व्‍यक्ति के लिए उर्जा की उतनी ही कम मात्रा रहती हैं। शैशवास्‍था और इससे आगे की अवस्‍थाओं तक व्‍यक्ति अपनी आवश्‍यकताओं को पूरा करने के लिए सीमीत साधनों का उपयोग करने की कोशिश करता हैं, बच्‍चें को यदि प्रारंभ में ही अत्‍याधिक प्रारंभिक प्रशिक्षण और प्रतिबन्‍ध लगाया जाता हैं, तो इससे बच्‍चों में दमन की भावना आ जाती हैं। जिसके कारण उसमें एक सुसंगठित व्‍य‍क्तित्‍व का विकास नही हो पाता हैं। फाइड सिद्धांत के आधारभूत विचार निम्‍नलिखित हैं:- 

1 व्‍यक्तित्‍व का जैविक सिद्धांत 

(Biological Theory of Personality) 

मनोविश्‍लेषणात्‍मक सिद्धांत को व्‍यक्तित्‍व के एक जैविक सिद्धांत के रूप में भी देखा जा सकता हैं। बच्‍चा अपनी शैशवावस्‍था में कुछ अवस्‍था तक काल्‍पनिक दुनिया में रहता है और जीवन की परिस्थितियों को प्राप्‍त कर उनसे समायोजन रखने की योग्‍यता रखता हैं। यदि बच्‍चा अपनी बाद की अवस्‍थाओं में सुख या आनन्‍द अपर्याप्‍त मात्रा में प्राप्‍त करता है तो वह आनन्‍द की प्राप्ति के लिए अपने व्‍यवहार के प्रतिमान की अपनाता हैं। इस प्रक्रिया को मनोविश्‍लेषक 'प्र‍तीक गमन' के नाम से जानते हैं। मिथ्‍या धारणा(fictation) और प्रतिगमन (regression) के प्रत्‍यय विकास के क्रम से संबंधित हैं। 

2. व्‍यक्तित्‍व संरचना 

(The Structure of Personality) 

फ्रायड के अनुसार व्‍यक्तित्‍व के तीन भाग हैं- इड, इगो तथा सुपर इगो(Id Ego, Super ego )।

इड(Id) - यह जन्‍म से व्‍यक्ति में उपस्थित रहता हैं। इड, अचेतन मस्तिष्‍क का प्रतिनिधित्‍व करता हैं। यह मूल प्रत्‍यात्‍मक प्रकृति का होता हैं और अचेतन में निहित विभिन्‍न प्रकार की इच्‍छाओं, प्रेरणाओं और वासनाओं की तुरन्‍त सन्‍तुष्टि चाहता हैं। यह सुखवादी सिद्धान्‍त से पूर्णत: प्रभावित होता है। इड मनो‍वैज्ञानिक हैं- जैविक नहीं। इड आन्‍तरिक समष्टि द्वारा प्रस्‍तुत होता हैं। यह वास्‍तविकता से सम्‍बंधित नही हैं। हल और लिण्‍डजे(Hall and Lindsey) के अनुसार '' The Id is an accessible and unorganised bond of personality''.

इस व्‍यक्ति की सभी प्राथमिक क्रियाओं को(अचेतन मन की) सुखवादी सिद्धांत का पालन करते हुए सन्‍तुष्‍ट नही हो पाती है तो इड प्रतिभा प्रस्‍तुत करके वास्‍तविक सन्‍तुष्टि प्राप्‍त करता हैं। 

अहं(Ego) - ईगो-इड का ही विकासित रूप हैं। यह व्‍य‍क्तित्‍व का तार्किक, व्‍यवस्थित, विवेकपूर्ण भाग हैं। परन्‍तु इसे इड से ही शक्ति प्राप्‍त होती हैं। यह वातावरण के साथ समझाैता कर इड की इच्‍छाओं को पूरा करने में मदद करवाता हैं। अहं में बाह्य वातावरण का ज्ञान एकत्रित होता हैं और अहं व्‍यक्ति की बाहर जगत के खतरों से रक्षा करता हैं। अत: यह वा‍स्‍तविकता के सिद्धांत का पालन करता हैं। यह इड के आवेगों को वा‍स्‍तविकता के अनुरूप अभिव्‍यक्‍त करता है। इड और सुपर इगो की विरोधी इच्‍छाओं में समायोजन का कार्य भी ईगो करता हैं। 

सुपर ईगो (Super ego) - सुपर ईगो व्‍यक्तित्‍व का अन्‍त में विकसित होने वाला नैतिक पक्ष हैं। यह बाल्‍यावस्‍था में ईगों से ही विकसित होता हैा इसके विकास में तादात्‍मकिरण(identification) और अन्‍त प्रेक्षण(Introjection) मानसिक मनोरचनायें सहायक होती हैं। सुपर ईगो, ईगो के साथ वैसा ही व्‍य‍वहार करता है जैसा माता-पिता बच्‍चों के साथ करते हैं। यह इड के आवेग को रोकता है और सुपर ईगो को नैतिक लक्ष्‍यों की ओर ले जाता हैं। यह मानसिक संरचना के सामाजिक स्‍वरूप को प्रस्‍तुत करता है। बच्‍चें के प्रारंभिक जीवन में पारिवारिक मूल्‍य और व्‍यस्‍क फिंगर पर्याप्‍त होते हैा सुपर ईगो के दो उप भाग होते हैं:- 

1. चेतना जो सजा देती है और

2. अहं आदर्श जो व्‍यवहार को पुरस्‍कृत करता हैा चेतना व्‍यक्ति को अप-राध भावना की ओर ले जाता हैं जबकि ईगो आदर्श व्‍यक्ति को अभिमान की भावना की ओर ले जाता हैं। सुपर ईगो उस ईगो को पसन्‍द नहीं करता हैं। जो सुखात्‍मक सिद्धांत से जुडा होता हैं। सुपर ईगो का क्रिया-क्रियान्‍वयन अधिकतर अचेतन होता हैं। जबकि क्रिया-क्रियान्‍वयन का एक बडा भाग प्राथमिक क्रिया के सिद्धांत को अपनाता हैं। 

3. व्‍यक्तित्‍व विकास

( Development of Personality)

फ्रायउ के अनुसार, तनाव के चार मुख्‍य स्‍त्रोतों की अनुक्रिया के फलस्‍वरूप व्‍यक्तित्‍व का विकास होता हैं। ये तनाव हैं:- मनोवैज्ञानिक वृद्धि प्रक्रियायें, भगनाशायें द्वन्‍द्व तथा ध‍मकियॉं(threats)।  फ्रायड ने व्‍यक्तित्‍व विकास की पाँच अवस्‍थओं में समझाया हैं। 

(A) मुखीया अवस्‍था (Oral stage) - यह जन्‍म से 18 महिने तक की अवस्‍था हैं। इस अवस्‍था में दो उप अवस्‍थायें हैं-

(i) मुख चूसन (Oral sucking)- यह जन्‍म से 8 महीने तक की अवस्‍था हैं। इस अवस्‍था में बच्‍चा अपनी कामशक्ति की संतुष्टि मूँह, ओंठ,जीभ के माध्‍यम से तथा गले द्वारा चूसकर एवं निगलकर करता हैं। इस अवस्‍था में बच्‍चे का व्‍यक्तित्‍व पूर्णत: इड से प्रभावित होता हैं और सुखवाद सिद्धांत से भी प्रभावित होता है। यह देखा गया है कि इस अवस्‍था के बच्‍चें को स्‍तनपान में आनन्‍द की अनुभुति होती हैं। 7-8 महीने की अवस्‍था में मॉं द्वज्ञरा स्‍तनपान नहीं कराया जाता हैं। बच्‍चे का इस प्रकार अचानक स्‍तनपान बन्‍द करना उसके व्‍यक्तित्‍व विकास में गडबडी उत्‍पन्‍न कर सकता हैं क्‍योंकि किसी अन्‍य तरीके से दूध पिलाने पर उसकी कामेच्‍छाओं की संतुष्टि नहीं होती हैं। फ्रायड ने इसे संवेगात्‍मक आधार कहा है। उसने यह भी बताया है कि इस प्रकार के अनुभवों से आगे चलकर बच्‍चें में मानसिक रोग उत्‍पन्‍न हो सकते हैं। इस अवस्‍था के अन्‍त तक ईगो का विकास प्रारम्‍भ हो जाता हैं। 

(ii) मुख द्वारा काटना (Oral biting)- यह अवस्‍था 6 से 17 मास तक की हैं। इस अवस्‍था में सुख चूसन(oral sucking) वाली विशेषतायें भी विद्यमान रहती हैं तथा व्‍यक्तित्‍व की अन्‍य विशेषतायें भी उत्‍पन्‍न हो जाती हैं। बच्‍चा इस अवस्‍था में आनन्‍द का अनुभव काटने व चूसने जैसी क्रिया करके प्राप्‍त करता हैं। इस अवस्‍था में बच्‍चों को नयी-नयी आदतों को सिखाया जाता हैं। फ्रायड के अनुसार यह 'second major traumatic experience' हैं। इस अवस्‍था में ईगो,इड से अलग होने लगती हैं। 

(B) गुदीय अवस्‍था (Anal stage)- यह 18 महीने से 4 साल तक की अवस्‍था हैं। इस अवस्‍था में भी दो उप-अवस्‍थायें होती हैं। 

(i) एनल एक्‍सपलसिव(Anal expulsive)- यह अवस्‍था 18 महीने से 3 वर्ष तक की है। फ्रायड का विचार है कि बालक मल-मूत्र का त्‍यागकर यौन सन्‍तुष्टि करता हैं। इसी प्रकार नाराजगी व्‍यक्‍त करने के लिए वह लगभग इन्‍ही क्रियाओं को अपनाता हैं।इस अवस्‍था में ईगो का काफी विकास हो चुकता है। बच्‍चा अपने लिंग को पहचानने लगता हैं। दूसरे शब्‍दों में, लडका सोचता है कि वह बडा होकर पिता बनेगा, लडकी सोचती है कि वह मॉं बनेगी। 

(ii) गुदीय धारणा अवस्‍था (Anal retentive stage) - यह अवस्‍था 1 से 4 साल तक की हैं।इस अवस्‍था में बच्‍चे को मलमूत्र रोकने में आनन्‍द आता हैं। लेकिन जब वह मलमूत्र को रोक पाने में असमर्थ हो जाता है तो वह स्‍वयं तथा सामाजिक रूप से बेइज्‍जत होता हैं। 

ब्राउन(Brown) ने इस अवस्‍था के बारे में कहा है कि कि 'पेन्टिग, मूर्ति-निर्माण, सांख्यिकी का अध्‍ययन इस अवस्‍था में उन्‍नयनात्‍मक (sublimation) व्‍यवहार हैं।

(C) लिंग प्रधान अवस्‍था(Phallic stage)- यह अवस्‍था 5 से 7 वर्ष तक की हैं। इसमें बच्‍चे को लिंग का अन्‍तर पहचान में आ जाता हैं। इस अवस्‍था में बच्‍चे में नैतिक अहम् का विकास पूर्णत: हो जाता हैं। बच्‍चे अपने से विपरीत लिंग के माता-पिता का प्‍यार करने लगते हैं। इस कारण यह अवस्‍था ऑडिपल अवस्‍था(oedipal stage) के समान भी जानी जाती हैं। य‍द्यपि उसका प्‍यार माता-पिता दोनों के लिए ही रहता है लेकिन लिंग प्रधान अवस्‍था के दौरान बच्‍चे में विपरीत लिंग के माता या पिता के प्रति प्रेम बढने लगता हैं, यह ऑडिपल स्थिति हैं। व्‍यवहार के दृष्टिकोण से बच्‍चा सामाजिक एवं संज्ञानात्‍मक हो जाता हैं। 

फ्रायउ ने यह महसूस किया कि ऑडिपल काम्‍पलैक्‍स के कारण लडका अपनी मॉं को प्‍यार करता है लेकिन पिता से ईर्ष्‍या करता हैं, क्‍योंकि वह पिता को भी मॉं से प्‍यार करते देखता हैं। बच्‍चे हस्‍तामैथुन(masturbation) करना भी इसी अवस्‍था में सीखते हैं। कुछ अवस्‍थाओं में बच्‍चे के लिए मूत्रत्‍याग की क्रिया भी सुखदायी होती हैं। वह इस बात को जानने के लिए उत्‍सुक रहते हैं कि उनके लिंग (sex organ) किस प्रकार क्रिया करते हैं। वह अपने गुप्‍तांगों को सहलाकर,छुकर अथवा प्रदर्शन करके सुख प्राप्‍त कर सकते हैं। लगभग पॉंच साल के बच्‍चे को यह तो मालूम होता हैं, कि बच्‍चा मॉं के पेट में से निकलता है किन्‍तु उसे यह नहीं मालूम होता  कि बच्‍चा मॉं के पेट मे कैसे आता हैं। 

(D) अप्रत्‍यक्ष अवस्‍था (Latency stage )- यह अवस्‍था 5 से 12 वर्ष तक की है । इस अवस्‍था में बच्‍चे की काम क्रियायें प्राय: शान्‍त रहती हैं जिसका मुख्‍य कारण सामाजिक भय हैं। उसकी रूचि बाह्य वस्‍तुओं में बढने लगती है। साथियों के साथ खेलने तथा झगडा करने में उसे मजा आता हैं। उसे माता-पिता द्वारा प्रदर्शित प्रेम अच्‍छा नही लगता हैं। परन्‍तु लिंग प्रधान अवस्‍था में सीखा हुआ बदलने लगता हैं। मॉं के प्रति सम्‍मान में बदल जाता हैं। 

(E) जननेन्द्रिय अवस्‍था (Genital stage)- यह अवस्‍था 12 से 20 वर्ष तक की हैं। इसमें लडके-लडकियॉ अपने गुप्‍तागों को जननेन्द्रियों के रूप में देखने लगते हैं। लैगिकता इस अवस्‍था में फिर से जागरूक हो जाती है। इस अवस्‍था में लडके-लडकियॉं कहानी पढने, मनगढन्‍त कहानियों को सुनने, दिवास्‍वप्‍न, हस्‍तमैथुन और समलैगिकता(homosexuality) जैसे कृत्‍य करने लग जाते हैं। गन्‍दे खेल खेलने, चुम्‍बन लेने आदि जैसे व्‍यवहार भी देखे जा सकते हैं। ल‍डकियों में हल्‍ला-गुल्‍ला, शोर-शराबा करने की प्रवृत्‍ति बदल जाती है। वह लज्‍जशील तथा शर्मीली हो जाती है। इस अवस्‍था के अन्‍त तक समलैगिकता की प्रवृत्ति समाप्‍त हो जाती हैं। 

फ्रायउ के सिद्धांत को स्‍मार्ट एवं स्‍पार्ट (Smart and Smart) द्वारा संक्षेप में लिखा गया हैं। वह कहते हैं:-

Freud proposed  Psycho-sexual stages of development, each of which used a certain zone of the body for gratification of the Id (The unconscious sources of motives, strings, demands of the Id, the outside world, and the superego, represents what may be called reason and common sense, in contrast to  the Id, which curtains passions. The super-ego or ego ideal corresponds roughly to conscience. Freud’s psycho-sexual stages are oral when the mouth is the main zone of satisfaction, about the first year, and when pleasure comes from anal and urethral sensation, the second and third years phallic, the third and fourth year, a time of pleasure from genital but now,at 4 and 5 years, the child regards the parents of the opposite sex as a love object and same sex parent as a rival; latency from 6 to around 11. When sexual cravings are repressed made unconscious and the child identifies with the parents and peers of own sex; puberal when matual genital sexuality begins.

4. लिबिडों सिद्धांत (Libido Theory) 

फ्रायउ के अनुसार दो मुख्‍य प्रकार की मूलप्रवृत्तियॉं होती हैं। जीवन मूलप्रवृत्ति(life instincts), तथा मृत्‍यु मूलप्रवृत्ति (death instincts)। जीवन मूलप्रवृत्ति के उपयोग में जो उर्जा खर्च होती हैं उसे फ्रायउ ने लिबिडों का नाम दिया हैं। लिबिडो एक चालक उर्जा हैं। एक व्‍यक्ति में लिबिडों को एक गुप्‍त उर्जा कोष के रूप में माना जाता हैं। लिबिडों ' Physical law of conservation of energy’ के द्वारा व्‍यवस्‍थित होती है। फ्रायड द्वारा बतायी गयी परिपक्‍वता की अवस्‍थाओं के द्वारा घटति होती है। प्रत्‍येक विशिष्‍ट इरोटो‍जेनिक जोन(मूॅह, गुदा, पेनिस) पर केन्द्रित होती है और प्रत्‍येक के आनन्‍द का एक विशेष उद्देश्‍य होता है। (चूसना काटना, धारण, प्रवेश)। इस प्रकार लिबिडों के विकास की अवस्‍थायें जैविक रूप से ज्ञात हैं। यह ज्ञात हुआ है कि इनका विकास बालक के व्‍यवहार पर कुछ पर्याप्‍त फिगर्स की क्रिया द्वारा प्रभावित होता हैं। जब यह इन फिंगर्स से गुजरता है तब मल-मूत्र निष्‍कासन के आरम्भिक प्रशिक्षण पर माता-पिता की अभिवृत्ति के प्रभाव द्वारा प्रभावित होता है। यदि यह प्रभाव उस पर अच्‍छा नही पडता है तो वह उस विशिष्‍ट जोन से कुण्टित हो सकता हैं। 

5. मूल प्रवृत्ति सिद्धांत (Instinct Theory) 

फ्रायउ के अनुसार दो आधारभूत मूलप्रवृत्तियॉं होती हैं। 

(1)  Life instinct or Eros

(2) Death instinct Thanatos

जिसे कुछ बाद के मनोवैज्ञानिकों ने ' Mortido' या 'Destrudo' का भी नाम दिया हैं। जीवन मूलवृत्ति में लिबिडों के पुराने विचार सम्‍म‍िलित होते हैं और स्‍वसंरक्षित चालक के अंश सम्मिलित होते हैं। यह मूलप्रवृत्ति व्‍यक्ति की अन्‍त: क्रिया को बनाये रखने का कार्य करती हैं। 

मूलप्रवृत्ति के विषय में फ्रायड का विचार है कि यह लिबिडों से और जन्‍मजात नष्‍टता की वास्‍तविकता और आक्रामकता को स्‍वयं के विरूद्ध प्राथमिक रूप से प्रस्‍तुत करती हैं। यह व्‍यक्ति के नाश के लिए कार्य करती हैं। जन्‍म मूलप्रवत्ति रचनात्‍मक होता हैं। मृत्‍यु मूल प्रवृत्ति एक बल हैं जो मृत्‍यु के संबंध में कार्य करता है और स्‍वत: ही तनाव या संघर्ष से पूर्णत: स्‍वतंत्रता की वास्‍तविकता बेसिक अवस्‍था में लौट आता हैं।

प्रत्‍येक कार्य का कारण होता है। हमारे व्‍यवहार का कारण यही मूल प्रवृत्तियॉ हैं। मूल प्रवत्ति की चार विशेषतायें होती हैं। (1) आधार(source) (2) उद्देश्‍य(aim) (3) पदार्थ(object) (4) गति‍शक्ति(impetus).

आधार वह शारीरिक आवश्‍यकता है जो व्‍यक्ति में असन्‍तुलन उत्‍पन्‍न करती हैं। उद्देश्‍य शारीरिक उत्‍तेजना को दूर करता हैं। भूख की मूल प्रवृत्ति का उद्देश्‍य शरीर में पोषक तत्‍वों की कमी को दूर करना है जिसकी पूर्ति भोजन(पदार्थ) से होगी। पदार्थ में वह सारा व्‍यवहार भी सम्मिलित होता है जो उस वस्‍तु की प्राप्ति के लिए किया जाता हैं। गतिशक्ति,मूलप्रवृत्ति की शक्ति है जिसका निर्धारण आवश्‍यकता की तीव्रता से होता हैं।

जीवन तथा मृत्‍यु मूल प्रवृत्तियॉं दोनों ही मूलप्रवृत्तियॉं शक्ति का स्‍त्रोत हैं। जिनसे रचनात्‍मक एवं ध्‍वंसात्‍मक कार्य होते हैं। यह दोनों मूलप्रवृत्तियॉं कभी-कभी अलग एवं कभी-कभी मिलकर कार्य करती हैं। और इन्‍ही से हमारा व्‍यवहार निर्धारित होता हैं इसे हम निम्‍न समीकरण द्वारा भी प्रस्‍तुत कर सकते हैं।

B=F (L X D)

Behaviour = The function of life and death instincts 


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