राजयोग- प्राचीन भारतीय ध्यान पद्धित
सारांश - राजयोगी स्वामी विवेकानंद द्वारा वर्णित किताब राजयोग में आत्मा से परमात्मा को कैसे जोड़ा जाए इसका विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। संसार के अन्य विज्ञानों की भांति राजयोग भी एक विज्ञान है। यह विज्ञान मन का विशेषण तथा अतीइन्द्रीय जगत के तथ्यों का संकलन करता है। और आध्यात्मिक जगत का निर्माण करता है, राजयोग अंतर जगत की ओर एक यात्रा है, आज के युग में मन में अपराध बोध का कारण है, देह अभिमान और माया से हार। स्वयं परमात्मा ने आकर हमें हमारा और स्वयं का परिचय दिया। सृष्टि चक्र का ज्ञान समझाया। उन्होने ही राजयोग की शिक्षा प्रदान कर हमारी सभी उलझने समाप्त कर दी है क्योकि इस योग से मन की शक्ति बुद्धि की शक्ति बढ़ जाती है, और उनका शुद्धिकरण होने लगता है, योग बल से अपने आप ही संस्कार परिवर्तन होने लगते है, तथा दिव्य संस्कार हममें प्रवेष होने लगते है तथा विभिन्न प्राप्तियां हमें प्राप्त होने लगती है, जो हमारे जीवन के लिए अति लाभप्रद है।
मनुष्य का जीवन प्राचीन काल से ही स्वतंत्र रहा है, मानवता कभी भी परतंत्रता को स्वीकार नही करती। ये हम सभी का स्वयं का अनुभव भी है। लेकिन हमारी स्वयं की उलझने स्वयं के प्रति हमारा स्वयं का दृष्टिकोण हमे उन परतंत्रता की जंजीरो में जकड़ रहा जो कहीं न कही हमारी स्वयं की खुशी और स्वतंत्रता को गायब कर रही है, विकारों की बेड़िया हमारे जीवन को ऐसे बांधे हुए हैं, कि कोई भी आंतरिक व बाह्य औजार उसे खोल नही पा रहा है।
राजयोगी स्वामी विवेकानंद के प्रेरित करने वाले शब्द हमें आज भी लगातार प्रेरित करते रहते है। स्वामी विवेकानंद द्वारा लिखित पुस्तक राजयोग में उन्होने इस ध्यान विधि को विस्तारपूर्वक वर्णित किया है, जिसमें आत्मा का परमात्मा से कैसे योग द्वारा मन लगाया नाता है, उन सभी अवस्थाओं का वर्णन किया गया है। समस्त कर्मेन्द्रियों को कैसे नियंत्रण में रखा जाता है, तथा शांति व एकाग्रता पर किस तरह टिका जा सकता है। इस सभी बातो का विस्तारपूर्वक वर्णन मिलता है।
अमेरिका में श्रीमती सारा सी बुल के निवास स्थान पर जब श्री स्वामी विवेकानंद जी अपने कुछ शिष्यों सहित ठहरे हुए थे, उस समय उन्होने योग साधन पर कुछ छोटे भाषण दिए थे, जिन्हे श्रीमती बुल ने लिपिबद्ध कर लिया था, उसके बाद सन् 1913 में हमारे अमेरिका निवासी मित्रों ने इन भाषणों को अन्य भक्तों एवं श्रद्धालु व्यक्तियों के निमित्त एक पुस्तक के रूप में प्रकाषित किया। हमारे जीवन गठन एवं चरित्र निर्माण के लिए वे पुस्तके बड़ी सुन्दर एवं उपयोगी है।
संसार के अन्य विज्ञानों की भांति राजयोग भी एक विज्ञान है यह विज्ञान मन का विश्लेषण तथा अतीन्द्रीय जगत के तथ्यों का संकलन करता है, और इस प्रकार आध्यात्मिक जगत का निर्माण करता है। मन की एकाग्रता हीं समस्त ज्ञान का उद्गम है, योग का अर्थ जोड़ना है, अर्थात जीवात्मा को परमात्मा के साथ जोड़ना मिलाना। मन चेतना में और उसके नीचे के स्तर में कार्य करता है।
राजयोग अंतर जगत की ओर एक यात्रा है, यह स्वयं को जानने या यूं कहे पुनः पहचानने की यात्रा है, यह एक ऐसा योग है, जिसे हर कोई कर सकता है, जिसमें कोई धार्मिक प्रक्रिया या मंत्र आदि नही है। इसे कहीं भी और किसी भी समय किया जा सकता है, राजयोग को आंख खोलकर किया जाता है, इसलिए ये अभ्यास सरल और आसान है।
इस अभ्यास के लिए 5 स्टेप है।
1. पहला चरण - विश्रान्ति- विश्रान्ति अर्थात अपने तनाव और उलझनों को परे रखते हुए अपने
मन और शरीर को शांत और स्थिर करना।
2. दूसरा चरण- एकाग्रता- विश्रांत होने के बाद वर्तमान में अपना ध्यान केन्द्रित करना।
3. तीसरा चरण- मनन करना- स्वयं की आंतरिक दुनिया और अपने मूल्यों की गहराई में
जाना।
4. चौथा चरण - अनूभूति- जब मेरी समझ और मेरे अहसासों का मेल होता है तो और ही गहरी और सार्थक वास्तविकता की अनुभूति होती है।
5. पांचवा चरण- योगाभ्यास- एक ही संकल्प में एकाग्र रह के अपने मूल अस्तित्व को याद
करते हुए सुस्वस्थ स्थिति का पुनः जाग्रत करना।
कहते है भगवान ने मनुष्य को रचा अपने खुले दिल से। उसने मनुष्य की खुशी और अच्छी फीलिंग के लिए साथ में खूबसूरत मन भी दिया। मन में जैसे विचार, वैसी फीलिंग से शर्त भी रख दी।
वैसे तो कहते है कि माइंड एक पावर अर्थात विचार शक्ति है। हम किसी भी विचार का मन में निर्माण करते है, और उसके पावर के बायब्रेशन्स हमारे शरीर और प्रकृति में फैलते है, चाहे वे अच्छे विचार हो या बुरे। यदि हम अच्छे विचार और फीलिंग में जीना चाहते है तो पाजीटिव शुभ व श्रेष्ठ संकल्पों के साथ जिये और यदि निगेटिव फीलिंग और दुख के साथ जीना चाहते है तो निगेटिव विचार क्रियेट करें । कौन नही चाहेगा कि हमे जीवन में अच्छी महसूसता हो।
मन के प्रकम्पन ही हमें दूसरों के पास या उनसे दूर ले जाते है, हम वाईब्रेशन के सिद्धांत द्वारा पड़ोसियों की भी समस्याओं को दूर कर सकते है सबेरे उठ स्वमान धारण करे, मैं मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हॅूं , फिर उनको भृकुटी के बीच चमकती आत्मा देख संकल्प करे, ये तो मेरे गुड फ्रेंड है, शुभचिंतक है, हमारे बीच सब कुछ ठीक हो जायेगा। स्प्रीचुअल पावर आपको ऐसे संकल्प करने में मदद करेगी। परमात्मा से बहुत अच्छा कनेक्षन जोड़े और उन्हे भी मदद के लिए आग्रह करें।
मन में भय का कारण आपके पूर्व जन्म या इस जन्म के कुछ बुरे अनुभव हो सकते है, इसको दूर करने के लिए दिन में 108 बार इस स्वमान की प्रक्टिस करे, मैं आत्मा अजर अमर अविनासी हॅू , मैं आत्मा शिव शक्ति हॅू । शिव की शक्तियां मेरे पास है। सुबह उठते ही कम से कम सात बार संकल्प करे, मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिमान हॅू, निर्भय हॅू, घर से कहीं बाहर जाने से पहले संकल्प करे कि मेरे साथ सर्वशक्तिमान है, उनकी छत्रछाया में सुरक्षित हूँ, कुछ विशेष प्राप्ति हेतु मास्टर सर्वशक्तिमान के स्वमान का उपयोग करें। भगवानुभाच जो मास्टर सर्वशक्विान का अभ्यास करते है, वे अपनी संकल्प शक्ति द्वारा बहुत कुछ कर सकते है।
अपराध बोध की समाप्ति और राजयोग से प्राप्तियां
स्वयं परमात्मा ने आकर हमें हमारा और स्वयं का परिचय दिया है, सृष्टि चक का ज्ञान समझाया है, उन्होने ही राजयोग की शिक्षा प्रदान कर हमारी सभी उलझने समाप्त कर दी है, इस योग के द्वारा हम वह करने में सक्षम हो गए जो हम करना चाहते है, क्योकि योग से मन की शक्ति, बुद्धि की शक्ति बढ़ जाती है, और उनका शुद्धिकरण होने लगता है।
योग बल से अपने आप ही संस्कार परिवर्तन होने लगते है, दिव्य संस्कार हममें प्रवेश होने लगते है।
मन में अपराध बोध का कारण है, देह अभिमान और माया से हार। इस अपराध बोध को नष्ट करने के लिए हमें मन में दृढ़ संकल्प रखना चाहिए कि मुझे अपने लक्ष्य की ओर निरंतर आगे बढ़ना है, हार्ड वर्कर बने, आलस्य अलवेलेपन से दूर रहें, दूसरो की आत्मा देखने की प्राक्टिस करे, परमात्मा से योग लगाकर पवित्र बनने की शक्ति ले। पॅांच स्वरूपों के अभ्यास से वासनाओं को नष्ट करें । एकांत में रहकर अपने से बाते करे, अपने संकल्पों को और भी अधिक दृढ़ करे, वृत्ति को पावन बनाने का व्रत धारण करें।
कुछ स्वमान-
1. मैं देवकुल की आत्मा हॅू ।
2. मैं मास्टर सर्वशक्तिमान आत्मा हॅूं ।
3. मैं विजयी रत्न हॅू
4. मैं पूज्य आत्मा हॅू, सबेरे अवश्य उठे।
योग का प्रयोग कहां किया जा सकता कहा नही
राजयोग का प्रयोग आत्म शुद्धि शांति विध्न को हटाने के लिए आदि जन कल्याण के कार्यो में ही किया जा सकता है। किसी से बदला लेने स्वार्थ की भावना से किए गए कर्मो के लिए वासनात्मक प्रेम आदि को प्राप्त करने हेतु प्रयोग नही किया जा सकता, उन परिस्थितियों में योग के प्रयोग से उल्टे परिणाम ही देखने को मिलेगे, क्योकि राजयोग पवित्रता का मार्ग है, इसके दिव्य अनुभव उन्ही आत्माओं को प्राप्त हो सकते है, जिनकी मनोस्थिति अच्छी रही हो, जो शुरू से ही चरित्रवान रहे हो, या जिनके पुण्य कर्मो का खाता काफी अधिक हो आदि परन्तु अगर मन में दृढ़ संकल्प आ जाए कि अब मुझे पवित्र बनना है तो योग से सफलता प्राप्त अवश्य होगी।
आज युवा वर्ग में वासनात्मक प्रेम की समस्या बहुत देखने में आती है, इस विषय में वह अपने मॉं बाप की सुनने को भी तैयार नही होते, परन्तु वे याद रखे कि जिस कार्य को करने से मॉं बाप की नकरात्मक एनर्जी उनकी लिए निकलती है, वह कार्य सफल नही हो सकता और यह भी याद रखे कि उन्हे जल्दी ही भावनाओं में बह नही जाना चाहिए, थोड़ा धैर्ववत होकर जीवन के निर्णय लेना चाहिए।
माता पिता को चाहिए कि वे शुरू से ही अपने बच्चे को ऐसी पालना दे जिससे उनका मन इतना मजबूत ही जाये कि उनका ध्यान इधर उधर जाये ही नही। वे बच्चों को शुरू से ही प्रेम दे। उनके अच्छे मित्र बनकर रहे, उनका तिरस्कार न करे, उन्हे दुत्कारे नही, और उनसे आदेशात्मक रीति से बात न करे, जिससे बचपन में ही उनकी खुशी नष्ट न हो जाए, उनमें अलगाव बादी विचार उत्पन्न न हो, वे आपकी इज्जत करे, उल्टे जबाव न दे। हार्नर किलींग जैसे कार्य करने को खुद से रोके क्योकि इससे खेल और ही बिगड़ जाता है।
विधि पूर्वक राजयोग द्वारा विध्नों पर विजय-
विधि द्वारा किसी भी कार्य को करने से सिद्धि अवश्य प्राप्त होती है, राजयोग का अभ्यास भी अगर विधि पूर्वक किया जाये तो विध्नों का विनाश सरल तरीक से किया जा सकता है।
कुछ सहज उपाय- रोज का नियम पालन अवष्य करे, उनमें प्रत्येक दिन एक घंटा निकालकर एकाग्रता से राजयोग का अभ्यास करे, समय और स्थान भी निश्चित हो। शुरूआत में 7 बार स्वमान का अभ्यास करे, मैं आत्मा मास्टर सर्वशक्तिमान हॅू , विध्न विनाशक हॅू , मेरे अंग अंग से शक्तियों की किरणे फैल रही है।
राजयोग से प्राप्ति अष्टशक्तियां
राजयोग के अभ्यास से अर्थात मन का नाता परमपिता परमात्मा के साथ जोड़ने से अविनाशी सुख शांति की प्राप्ति तो होती ही है, साथ ही कई प्रकार की अध्यात्मिक शंक्यिां भी आ जाती है। इनमें से आठ मुख्य और बहुत ही महत्वपूर्ण है।
पहली शक्ति - सिकोड़ने और फैलाने की शक्ति- जैसे कछुआ अपने अंगो को जब चाहे सिकोड़ लेता है, जब चाहे उन्हे फैला लेता है, वैसे ही राजयोगी जब चाहे अपनी इच्छानुसार अपनी कर्मेन्द्रियों के द्वारा कर्म करता है, और जब चाहे विदेही एवं शांत अवस्था में रह सकता है।
दूसरी शक्ति- समेटने की शक्ति- इस संसार को मुसाफिर खाना तो सभी कहते है लेकिन व्यवहारिक जीवन में वे इतना तो विस्तार कर लेते है, कि अपने कार्य और बुद्धि को समेटना चाहते हुए भी समेट नही पाते जबकि योगी अपनी बुद्धि को इस विशाल दुनिया में न फैलाकर एक परमपिता परमात्मा की तथा आत्मिक संबंध की याद में ही अपनी बुद्धि लगाए रखता है वह कलयुगी संसार से अपनी बुद्धि और संकल्पों का विस्तरा व पेटी समेट कर सदा अपने घर परम धाम में चलने को तैयार रहता है।
तीसरी शक्ति है सहन शक्ति- जैसे वृक्ष पर पत्थर मारने पर भी मीठे फल देता है, और अपकार करने वाले पर भी उपकार करता, वैसे ही एक योगी भी सदा अपकार करने वालों के प्रति सदा शुभ भावना और कामना ही रखता है।
चौथी शक्ति है समाने की शक्ति- योग का अभ्यास मनुष्य की बुद्धि विशाल बना देता है और मनुष्य गंभीरता और मर्यादा का गुण धारण करता है, थोड़ी सी खुशियां मान पद पाकर वह अभिमानी नही बन जाता और न ही किसी प्रकार की कमी आने या हानि हेाने के अवसर पर दुखी होता है।
पांचवी शक्ति है परखने की शक्ति- जैसे एक जौहरी आभूषणों को कसौटी पर परखकर उसकी असल और नकल को जान लेता है ऐसे ही योगी भी किसी भी मनुष्य आत्मा के सम्पर्क में आने से उसको परख लेता है। और उससे सच्चाई या झूठ कभी नही छिप सकता।
छठी शक्ति है निर्णय शक्ति- यह शक्ति स्वतः ही प्राप्त हो जाती है वह उचित और अनुचित बात का शीघ्र ही निर्णय कर लेता है वह व्यर्थ संकल्प और परिचिंतन से मुक्त होकर सदा प्रभुचित्तन में रहता है।
सातवीं शक्ति, सामना करने की शक्ति- योग के अभ्यास से मनुष्य को सामना करने की शक्ति भी प्राप्त होती है, यदि उसके सामने निकट संबंधी की मृत्यु जैसी आपदा आ भी जाये अथवा संसारिक समस्याए तूफान का रूप भी धारण कर ले तो वह कभी विचलित नही होता और उसका आत्मा रूपी दीपक सदा ही जलता रहता है, और अन्य आत्माओं को ज्ञान प्रकाश देता रहता है।
आठवी शक्ति है सहयोग की शक्ति- योग के अभ्यास से सहयोग की शक्ति प्राप्त होती है, एक योगी अपने तन मन धन से तो ईश्वरीय सेवा करता ही है, साथ ही उसे अन्य आत्माओ का भी सहयोग स्वतः ही प्राप्त हो जाता है, जिस कारण वे कलयुगी पहाड़ को उठाने में अपनी पवित्र जीवन रूपी अंजुली देकर स्वर्ग की स्थापना के पहाड़ समान कार्य में सहयोगी बन जाते हैं।


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