ग्रामीण मजदूर महिलाओं में स्वास्थ्य एवं पोषण संबंधित समस्याओं का अध्ययन
सारांश . आधुनिक भारत में महिलाओं में शिक्षा का स्तर बढ़ रहा है लेकिन वर्तमान में महिलाओं कि स्थिति स्वास्थ्यए महिला . पुरूष जनसंख्या अनुपात, विवाह की उम्र आदि मामलों में बेहद चिंताजनक है। मध्य प्रदेश के इन्दौर जिले कि मानपुर क्षेत्र के जनजातिय समुदायों कि महिलाओं में स्वास्थ्य एवं पोशण कि स्थिति के संबंध में प्राथमिक आंकड़ो का संकलन कर व्यापक स्तरीय अध्ययन किया गया। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य एवं पोशण की समस्या के उपाय हेतु विभिन्न शासकीय योजनाएं इन क्षेत्रों में संचालित की हो रही है, किंतु परिदृष्य यह बताता है कि महिलाओं में स्वास्थ्य तथा पोशण की स्थिति बेहतर नहीं है। जिसके प्रमुख कारण जागरूकता की कमी अशिक्षा स्वास्थ्य सुविधाओं का आभाव शासकीय योजनाओं के प्रति अरूचि तथा निम्न आर्थिक स्थिति पाये गये। प्रेक्षण बताते है कि इनका आहार मुख्यतः अनाजों पर आधारित असंतुलित प्रकार का है, वे खाने मे दालों का प्रयोग कम करते है। गाँव की 88 प्रतिशत महिलायें पूर्णतः निरक्षर है और 65 प्रतिशत परिवार पुर्णतः मजदूरी पर निर्भर है। जबकि 1 महिला की एनीमिया के कारण मृत्यु भी हो चूकी है। स्वास्थ्य स्तर में कमी का एक मुख्य कारण गाँव में स्वच्छता का अभाव है। अनेक महिलाओं को भोजन पकाने की सही विधियों का भी पता नहीं हैए जिस कारण उन्हें भोजन से पर्याप्त मात्रा में पौष्टिक तत्व नहीं प्राप्त हो पाते।
महिलाएं ऐसी अनेक स्वास्थ्य एवं पोशण संबंधित समस्याओं का सामना कर रही है जिसका एक प्रमुख कारण उनकी सामाजिक दशा भी है। महिला स्वास्थ्य एवं पोशण हेतु चलाई जा रही शासकीय योजनाओं में दर्ज लाभान्वितों कि संख्या अधिक है किंतु वास्तविकता वर्तमान से कोसों दूर है।
मुख्य बिन्दु. ग्रामीण, महिलाए मजदूर, पोशण, स्वास्थ्य।
“You can tell the condition of a nation by looking at the status of its women.’
Jawaharlal Nehru
अनेक विकासशील देशों के लिये स्वास्थ्य एवं पोशण के क्षैत्र में कुपोशण एक गंभीर चुनोती हैं। कुपोशण के कारणो में सामाजिक एवं आर्थिक पहलुओ के साथ - साथ शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवाओ का अभाव, अप्रासंगिक सांस्कृतिक परम्पराऐं एवं आचरण इत्यादि प्रमुख हैं। उपरोक्त कारणो के अतिरिक्त पोशण आहार की अनुपल्ब्धता का एक महत्वपूर्ण कारण गरीबी भी हैं। कुपोशण से जुडे विभिन्न मुद्दो के निराकरण के लिए इससे जुडे जटिल सामाजिक पहलुओ को मुल रूप से समझने की आवश्यकता हैं।
मध्य प्रदेश देश के निर्धन राज्यो में एक माना जाता हैं, जंहा 21.8 प्रतिशत (एन. एस. एस. 2007) के राष्ट्रीय औसत से की तुलना में प्रदेश की 32 प्रतिशत जनसंख्या गरीबी रेखा के नीचे निवास करती हैं। राज्य में 21.4 प्रतिशत जनजातीय और 17.9 प्रतिशत अनुसूचित जाति की जनसुख्यां हैं(एन.एफ.एच.एस.3)। विकास के आंकडे दर्शाते हैं कि दूसरे क्षेत्रो की तुलना में यहां विकास की दर भी कम हैं। ऐसे में दयनीय समुह जैसे महिलाओं एवं बच्चो का निम्न स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर इस स्थिती को और भी गंभीर बनाता हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स 2016 में 118 देशों में भारत का 97 वां स्थान है यह बांग्लादेश] नेपाल व श्रीलंका से भी निचले स्थान पर है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार भारत में हर वर्ष 25 लाख बच्चे कुपोषण के कारण अपनी जान गंवा देते है। भारत में विश्व के 25 फिसदी लोग भुख से ग्रस्त है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में शिशु मृत्युदर 40/1000 है जबकि पड़ोसी मुल्क मालदीव मे 9 श्रीलंका में 10 एवं चीन में 11 है।
भारतीय समाज में सदियों से ऐसे सांस्कृतिक मूल्य विद्यमान रहे हे जो महिलाओ को पुरूषो की अपेक्षा कमजोर मानते तथा बनाते हैं। एक समय था जब बालिकाओं के साथ जन्म से ही भेदभाव प्रारम्भ हो जाता था परन्तु वर्तमान परिदृष्य मे जन्म से पहले हि बालिकाओं के साथ भेदभाव प्रारम्भ हो जाता हैं। ऐसे मुल्यो के परिणाम स्वरूप ही महिलाओं मे उच्च मृत्युदर, महिलाओं में निम्न जीवन प्रत्याशा, अशिक्षा, रोग प्रतिरोधक क्षमता का अभाव, बेरोजगारी और घटता लिंगानुपात जैसी समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं। भारत में आंकडो से स्पष्ट होता हे की महिला पुरूष लिंगानुपात 940⁄1000 हैं तथा म.प्र. में 930⁄1000 हैं। वहीं भारत में बालक बालिका लिंगानुपात 927 था वो घटकर 914 हो गया हैं, यह एक गहन चितंन का विषय हैं।
भारत मे हर तीन गर्भवती महिलाओं मे से एक कुपोषण की शिकार होने के कारण खुन की कमी अर्थात रक्तालपता की बीमारी से ग्रस्त हो जाती हैं। हमारे समाज मे स्त्रियां अपने स्वयं के खानपान पर ध्यान नही देती हैं। जबकि गर्भवती महिलाओं को ज्यादा पोष्टिक भोजन की आवश्यकता होती हैं। उचित पोषण के अभाव मे गर्भवती माताएं स्वयं तो रोगग्रस्त होती है, साथ ही होने वाले बच्चे को भी कमजोर बना देती हैं। गर्भवती ग्रामीण महिलाओं को संतुलित आहार से संबधित ज्ञान न होने के कारण शिशुओं को अनेक बीमारियों से बचाने के लिये तत्काल डॉक्टर से उपचार की आवश्यकता होती है जबकि ग्रामीण महिलायें शिक्षा तथा जागरूकता के आभाव के कारण खतरनाक घरेलु नुस्खे, झाड-फुंक आदि में उलझ जाती है, यही कारण है कि ग्रामीण शिशु मृत्युदर अधिक है। ग्रामीण समुदाय का एक ऐसा भाग भी है जो भोजन जैसी मूलभूत आवश्यकता की भी पूर्ति नही कर पाता। अधिकांश परिवारो में अक्सर महिलाएं पूरे परिवार को खिलाकर स्वयं बचा हुआ खाती ये भी कुछ ऐसे कारण हे जो मातृ मृत्यु दर बढ़ावां देते है। मध्य प्रदेश में मातृ मृत्यु दर 230 हें जो राष्ट्रीय आंकड़े (178) से अधिक हैं। ऐसे परिवारों में महिलाओं के पोषण पर कम ध्यान दिया जाता है। जो समस्या को और अधिक विकट तथा विराट बना देता है।
भारत के ग्रामीण इलाको में भोजन की गुणवत्ता बनाये रखने के लिये भोजन पकाने के तरीके तथा भोजन की स्वच्छता आदि में सुधार, अधिक पोषक तत्व से युक्त भोज्य पदार्थो का चुनाव, खान-पान के तरीके तथा भोजन की स्वच्छता आदि में सुधार हेतु महिलाओं को जागरूक होना आवश्यक है तभी स्वस्थ्य ग्रामीण समुदाय का निर्माण हो सकता है। नशीले पदार्थो का सेवन ग्रामीण क्षेत्रां की प्रमुख समस्या है। तम्बाकु बीडी, सिगरेट, शराब आदि खतरनाक नषीले पदार्थो के सेवन पर ग्रामीण अपनी आय का बडा हिस्सा खर्च करतें है, जिससे न केवल उनकी आर्थिक स्थिति खराब होती है बल्कि उनके स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़ता है। नशीले पदार्थो के सेवन से कैंसर तथा अन्य जानलेवा बिमारियों का खतरा होता है। इन बिमारियों के इलाज में एक ओर जहां उन्हे आर्थिक समस्याओं का सामना करना पडता है वहीं दुसरी ओर उनके बच्चों की शिक्षा और उनके स्वास्थ्य की देखभाल भली-भांती नही हो पाती है। ऐसी स्थिति में साक्षर तथा जागरूक महिलाओं की आवश्यकता होती है जो नये लोगो को नषे की लत से बचाने तथा गांव को तम्बाकु शराब आदि से मुक्त करने मे महत्वपूर्ण भुमिका निभा सके।
परिवार के स्तर पर, समाज तक प्रत्येक स्थान पर महिला अपने महत्वपुर्ण योगदान अर्पित करती है। आजादी के आन्दोलन में भी महिलाओं ने पुरूषों के साथ-साथ अंग्रजों के विरोध में प्रदर्षन किया, परंतु यह विडम्बना ही है कि त्याग के लिए महिलाओं को महिमामंडित किया जाता है परन्तु जब सहभागिता की बात आती है तो उन्हें दरकिनार करने का प्रयास किया जाता है। माँ का आशिर्वाद लेना अच्छा माना जाता है परंतु घर के किसी भी निर्णय में उसके मत को जानने का प्रयास नही किया जाता है। मात्र ऊंचे पदो पर कुछ महिलाओं को बेठा देने से महिलाओं की भागीदारी सुनिष्चित नहीं की जा सकती है। यह आवश्यक है कि परिवार के स्तर से उसकी शुरूआत हो।
वर्तमान समय में स्वास्थ्य, पोषण, एवं प्रजनन संबधी समस्याएं विकासशील देशों के समक्ष एक बड़ी चुनौती बन गई है। भारत में विशेषकर ग्रामीण मजदूर महिलाओं को स्वास्थ्य एवं पोषण संबधित कई समस्याओं का सामना करना पड रहा है। उन महिलाओं की समस्याओं को दूर करने हेतु कारणों एवं उपायों का पता लगाने के उद्देश्य से उक्त शीर्षक का चुनाव किया गया।
कुपोषण के कारण
उद्देश्य
01. ग्रामीण मजदूर महिलाओं के सामाजिक - आर्थिक स्तर का अध्ययन करना।
02. मजदूर महिलाओ के स्वास्थ्य एवं पोषण स्तर का अध्ययन करना।
03. मजदूर महिलाओं में स्वास्थ्य एवं पोषण हेतु क्रियान्वयनकारी योजनाओं के प्रति
जागरूकता के स्तर का अध्ययन करना।
महिलाओं की सामाजिक - आर्थिक पृष्ठभूमि- ग्रामीण मजदूर महिलाओ की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि के अन्तर्गत उनकी आयु, शिक्षा, पारिवारिक पृष्ठभूमि, वैवाहिक स्थिति, व्यावसाय, एवं आय का अध्ययन किया गया हैं। चयनित महिलाओं मे से 90 प्रतिशतमजदूर महिलाऐं अशिक्षित हैं। 69 प्रतिशत महिलाएं एकांकी परिवार में निवास कर रहीं हैं। आंकड़ो के आधार पर 40 प्रतिशत मजदूर महिलाओं की आयु 20 से 30 वर्ष के मध्य पाई गयी जबकि 30 से 40 वर्ष और 40 से 50 वर्ष की महिलाओ का प्रतिशत क्रमश: 32 और 28 हैं। 89 प्रतिशत मजदूर महिलाएं विवाहित, 7 प्रतिशत विधवा एवं 4 प्रतिशत मजदूर महिलाएं अविवाहित हैं।
90 प्रतिशत मजदूर महिलाएं कृषि मजदूरी पर निर्भर है। आवास के अध्ययन में मात्र 16 प्रतिशत परिवारो के पास पक्का मकान पाया गया जबकि 24 प्रतिशत परिवारो के पास कच्चे-पक्के व 60 प्रतिशत परिवार कच्चे मकान में रहते हैं। अधिकांश परिवार गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करते हैं। निम्न आर्थिक स्तर प्रत्यक्ष रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित करता हैं।
स्वच्छता- ग्रमीण मजदूर महिलाओ के स्वास्थ्य स्तर का प्रभावित करने वाले कारको में व्यक्तिगत एवं शारीरिक स्वच्छता, भोजन की गुणवत्ता, अस्वच्छ जल, धुम्रपान आदि प्रमुख समस्याऐं है यह कारक इन महिलाओं के स्वास्थ्य स्तर को व्यापक रूप से प्रभावित करते हैं। अध्ययन के दौरान प्रायः यह अवलोकन किया गया कि भोजन बनाने की प्रक्रिया में जली लकड़ियों का धुंआ, हवा एवं प्रकाष की उचित व्यवस्था के अभाव के कारण महिलाओं तथा बच्चों का शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य अत्यधिक प्रभावित हुआ है। पशुओं के पास निवास स्थान, उनके मल मूत्र एवं गन्दे पानी के निकास की उचित व्यवस्था न होने के कारण आस पास का वातावरण प्रदूषित रहता है।
निष्कर्ष एवं सुझावः- उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट है कि ग्रामिण मजदुर महिलाओ की स्वास्थ्य एवं पोषण स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वस्थ्य सुविधाओं की सुचारू रूप से उपलब्ध न होने के कारण यहॉं की अधिकतर महिलाऐं पारम्परिक उपचार पद्धतियों का सहारा लेती हैं, जिससे रोग की जटिलताऐं और बढ़ती जाती हैं तथा यही पाया गया कि ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल अभी भी चिन्ताजनक स्थिति में है। ग्रामीण मजदुर महिलाओं को पोषण के विषय मे भी ज्ञान नही हैं। वे भोजन बनाने के उचित तरीको से अनभीज्ञ है। निम्न आर्थिक स्थिती के कारण परिवार मे उचित उर्जा और पोषण युक्त भोजन पर्याप्त मात्रा में प्राप्त नही हो पाता हैं। जिसके कारण ग्रामिण मजदुर महिलाओ का स्वास्थ्य स्तर बिगड़ रहा हैं। अशिक्षा एवं जागरूकता के अभाव कारण इन्हे शासकीय योजनाओं के विषय में पर्याप्त जानकारी नही होती, जिससे वे उन योजनाओं का लाभ नही उठा पाती है। इसके लिए स्वास्थ्य योजना सम्बन्धी जानकारी का प्रचार प्रसार, महिलाओं को जागृत कर स्वास्थ्य व रोगोपचार संबंधी शिविर लगाए जाऐं जिसमें दवाईयां नि:शुल्क वितरित की जाऐं। चिकित्सालय में स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा महिलाओं के लिए अलग से स्वास्थ्य संबंधी गोष्ठी किसी पढ़ी लिखी महिला या लड़की के माध्यम से उन सवालों के जवाब स्वास्थ्य कार्यकर्ता या चिकित्सक से लिए जा सके जिन्हें महिला शर्म या हिचक के कारण सीधा नहीं पूछ पाती। प्रत्येक स्वास्थ्य केन्द्र में महिला डॉक्टर का चयन किया जाए। ग्रामीण स्वच्छता का विषेष प्रबन्ध किया जाना चाहिए। पोषण संबधित समस्त योजनाओं का सुव्यवस्थित क्रियान्वयन करवाना चाहिए। समाज में फैले अंधविश्वास एवं कुरीतियों पर सख्ती से पाबंदी लगाना चाहिए। विशेष अवस्थाओं में महिलाओं के भोजन पर विशेष ध्यान देना चाहिए जैसे- गर्भावस्था, धात्रीवस्था, किशोरावस्था। महिलाओं में पोषण एवं स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता लाना चाहिए तभी इस समस्या का निराकरण सभंव हैं।

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