सीखने के सिद्धान्त (Theories of Learning)


 सीखने के सिद्धान्त
(Theories of Learning)

1. थार्नडाइक का सिद्धान्त (Thorndike's Theory)


थार्नडाइक के सिद्धान्त को कई नामों से जाना जाता है; जैसे-थार्नडाइक का सम्बन्धवाद (Thorndike's Connectionism). थानं डाइक का सम्बन्ध सिद्धान्त (Thorndike's Bond Theory), उत्तेजना प्रतिक्रिया सिद्धान्त (Stimulus- Response Theory) तथा प्रयास और भूल का सिद्धान्त (Trial and Error Theory of Learning)। बानाइक ने अपने सिद्धान्त को सर्वप्रथम 1898 में और फिर 1913 में प्रकाशित किया।

'थार्नडाइक के सिद्धान्त के अनुसार जब जीव को नई परिस्थिति में रखा जाता है तो वह बिना समझे तरह-तरह की अनुत्रियाएँ करता है। उसकी यह अनु- किमाएँ दोषपूर्ण होती है। जब उस जीव को बार-बार उन्हीं परिस्थितियों में रखा जाता है तब उसकी निलंक्ष्य और दोषपूर्ण (Random) क्रियाएँ कम होती जाती हैं। कई प्रयासों के बाद एक वह अवस्था आती है जब जीव को उस परिस्थिति में रखा जाता है तब वह जीव केवल उचित अनुक्रिया ही करता है। अतः जीव प्रयास और भूल के द्वारा सीखता है। दूसरे शब्दों में जब जीव के सामने एक विशेष परिस्थिति या उत्तेजना होती है तब वह एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया करता है। कई प्रयासों के बाद दोषपूर्ण प्रतिक्रियाएँ कम या समाप्त हो जाती हैं और उत्तेजना (Stimulus) तथा प्रतिक्रिया (Response) के बीच सम्बन्ध स्थापित हो जाता है, जिसे SR Bond या उतेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध कहते हैं, यही सम्बन्धवाद है। भविष्य में इसी सम्बन्ध के फलस्वरूप जीव उत्तेजना के प्रति उसी प्रकार की प्रतिक्रिया करता है। थार्नडाइक के अनुसार, "सीखना सम्बन्ध स्थापित करना है सम्बन्ध स्थापन में मनुष्य का मस्तिष्क कार्य करता है।"" यह सम्बन्ध अनेक प्रकार का हो सकता है। तथा सीखने की प्रक्रिया में शारीरिक और मानसिक प्रियाओं का भिन्न मात्रा में योगदान हो सकता है। यह सम्बन्ध विशिष्ट उत्त जनाओं और प्रतिक्रियाओं के कारण स्नायुमण्डल (Nervous System) में स्थापित होता है

थार्नडाइक के सिद्धान्त की विशेषताएँ - 

थार्नडाइक के सिद्धान्त की निम्न- लिखित सात प्रमुख विशेषताएँ हैं- (1) इसके सिद्धान्त में सीखने का आधार उत्तेजना प्रतिक्रिया का सम्बन्ध है (2) सीखने की प्रक्रिया गत्यात्मक ज्ञानात्मक, भावात्मक और प्रत्यक्ष अंगों पर आधारित है। (3) सीखने की प्रक्रिया में जीव उत्तजना प्रक्रिया-प्रतिक्रिया में जितना ही अधिक सम्बन्ध स्थापित करेगा, सीखना उतना ही अधिक और शीघ्र होगा। (4) थार्नडाइक ने अपने सीखने के सिद्धान्त के आधार पर तीन नियम प्रतिपादित किये है-अभ्यास का नियम तत्परता का नियम और प्रभाव का नियम (5) सीखने की प्रक्रिया में कोई न कोई प्रेरणा होती है। प्रेरणा आवश्यकता (Need) समस्या (The Problem), लक्ष्य (Goal or pur- pose) आदि के रूप में हो सकती है। (6) सीखने की प्रक्रिया में सर्वश्थम सन्तुलन

1. "Learning is connecting. The mind is man's connection system.' E. L. Thorndike Human Learning.

भंग हो जाता है, जीव तनाव का अनुभव करता है तथा समायोजन चाहता है।

 (7) प्रयासों के बढ़ने के साथ-साथ अनावश्यक क्रियाएँ कम होती जाती हैं । 

थार्नडाइक का प्रयोग-थार्नडाइक ने अपने सिद्धान्त का प्रतिपादन अपने अनेक प्रयोगात्मक अध्ययनों के आधार पर किया है। उसने अपने यह प्रयोग पशु मनोविज्ञान के क्षेत्र में किये है। उसने अपने यह प्रयोग बिल्लियों और मछलियों आदि पर किये हैं अपने एक प्रयोग के लिए उसने एक ऐसी मन्जूषा तैयार की जो सीकचों की बनी हुई थी और इस मन्जूषा या पिंजड़े का दरवाजा एक लीवर विशेष को दबाने से खुलता था। थार्नडाइक ने अपने एक प्रयोग में एक भूखी बिल्ली को इस मन्जूषा में बन्द किया। पिंजड़े के बाहर बिल्ली की पसन्द का भोजन रखा था जो बिल्ली को सोकचों से दिखाई देता था और यह भोजन बिल्ली के लिए उत्तेजना था। प्रत्येक प्रयास में बिल्ली के सम्पूर्ण व्यवहार का रेकार्ड तैयार किया गया । उत्तेजना (भोजन) के कारण बिल्ली में प्रतिक्रिया आरम्भ हुई। बिल्ली ने पिंजड़े में उछल-कूद मचानी शुरू की उसकी उछल-कूद का एकमात्र उद्देश्य बाहर निकल कर भोजन प्राप्त करना था। पहले प्रयास में बिल्ली की व्यर्थ क्रियाओं की अवधि में ही संयोग से उसका पंजा लीवर पर पड़ने से दरवाजा खुला दरवाजा खुलने पर बिल्ली बाहर आई और अपना प्रिय भोजन प्राप्त किया। पहले प्रयास की ही भांति बिल्ली को अन्य प्रत्येक प्रयास में भूखा रखा गया और पहले प्रयास की ही भाँति अन्य प्रयासों को दुहराया गया। प्रयोग में यह देखा गया कि प्रयास बढ़ने के साथ- साथ उसकी व्यर्थ क्रियाएँ कम होती गई और समय भी कम होता गया। कई प्रयासों के बाद यह देखा गया कि जब भूखी बिल्ली को पिंजड़े में बन्द किया जाता तब वह लीवर को दबाती और दरवाजा खुलते ही बाहर आकर अपना प्रिय भोजन प्राप्त करती है अतः बिल्ली ने उत्तेजना प्रतिक्रिया सम्बन्ध के आधार पर सीखा । 

सीखने के नियम (Laws of Learning )


1. तैयारी का नियम (Law of Readiness ) –
थार्नडाइक के अनुसार जब सीखने की क्रिया को सम्पादित करने के लिए कोई जीव प्रस्तुत होता है तो क्रिया के सम्पादन में सन्तोष मिलता है जब व्यक्ति कार्य करने के लिए तत्पर नहीं होता है तो कार्य मे असन्तोष मिलता है। तत्परता का अर्थ कार्य करने के लिए तैयार होने से है ।"" तैयारी की अनुपस्थिति में अभ्यास का प्रभाव नहीं पड़ता है। प्रभाव का नियम भी तैयारी की अनुपस्थिति में प्रभावशाली नहीं है । अतः यह तैयारी का नियम अभ्यास और प्रभाव के नियमों का पूरक है।

2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise ) — इस नियम में दो उपनियम

1. "When any conduction unit is ready to conduct, for it to do 3 satisfying. When any conduction unit is not in readines to conduct, for it conduct is annoying. Readiness thus mear a preparation for action".-E. L. Thorndike, 1932.

है- (i) उपयोग का नियम (Law of Use), (ii) अनुपयोग का नियम (Law of Disuse) । थार्नडाइक (1932) के अनुसार, "जब किसी प्रत्युत्तर की पुनरावृत्ति करके अभ्यास किया जाता है तब उत्तेजना प्रत्युत्तर बन्धन शक्तिशाली हो जाता है। परन्तु प्रत्युत्तर के अनभ्यास के कारण यह बन्धन कमजोर हो जाता है।"" उपयोग के नियम के अनुसार यदि कोई अनुक्रिया किसी परिस्थिति में बार-बार घटित होती है तो अनुक्रिया और परिस्थिति में सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। अनुपयोग के नियम के अनुसार जब जीव किसी परिस्थिति-विशेष के प्रति एक ही प्रकार की अनुक्रिया बार- बार नहीं करता है तो उत्तेजना और अनुक्रिया का सम्बन्ध दुर्बल हो जाता है। थार्नडाइक का यह नियम नाच, गाने, टाइप करने आदि कार्यों से सम्बन्धित परि- स्थितियों में सत्य है । यह नियम पशुओं और मनुष्यों दोनों के सीखने में उपयोगी है। इस नियम की आलोचना यह है कि यह नियम सीखने को प्रभावित करने वाले कारकों पर प्रकाश नहीं डालता है यह केवल उत्तेजना- अनुक्रिया के सम्बन्ध और इनकी पुनरावृत्ति पर ही प्रकाश डालता है अतः यह नियम यान्त्रिक है ।

3. प्रभाव का नियम ( Law of Effect ) -- "यदि एक परिस्थिति में एक कार्य सन्तोष प्रदान करता है तो वह कार्य उस परिस्थिति से सम्बन्धित हो जाता है। इसी प्रकार यदि एक परिस्थिति में एक कार्य असन्तोष प्रदान करता है तो वह कार्य उस परिस्थिति से असम्बद्ध हो जाता है ।"" सरल भाषा में यह नियम इस प्रकार है-जीव के लिए जो क्रिया सन्तोषजनक या सुखद होती है उसे वह जीव बार-बार करना चाहता है परन्तु जो अनुक्रिया उसके लिए सन्तोषपूर्ण नहीं होती है। अथवा कष्टपूर्ण होती है, जीव उसे बार-बार नहीं करना चाहता है अर्थात् सीखना नहीं चाहता है थार्नडाइक ने 1930 में इस नियम में सुधार किया और कहा कि पुरस्कार जितना सीखने में सहायक होता है, दण्ड सीखने में उतना बाधक नहीं होता है इस नियम की आलोचना निम्न प्रकार से की गई है- (1) जीव के कुछ कार्य ऐसे होते हैं जो उसे सन्तोष प्रदान नहीं करते हैं फिर भी जीव अपने उद्देश्यों की पूर्ति हेतु ऐसे कार्यों को करता है। (2) जीव को अनुक्रिया करने के बाद सन्तोष अथवा असन्तोष का अनुभव होता है। थार्नडाइक ने यह स्पष्ट नहीं किया है। कि बटन दबाने की अनुक्रिया इस नियम से किस प्रकार से सम्बन्धित है । (3) थार्नडाइक ने 1930 में इस नियम में जो संशोधन किये हैं, उनमें दण्ड का उपयुक्त मूल्यांकन नहीं किया है । (4) उपरोक्त दोषों के होते हुए भी यह इस नियम के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि इस नियम की सहायता से जीव के सीखने की प्रकृति का विश्लेषण किया जा सकता है यह नियम अभ्यास के नियम का पूरक नियम भी है ।

1. "Repeated exercising of a response strengthened a connection with the stimulus and the disuse of a response weakened it." -F. L. Thorndike. 1932.

2. “Any act which In a given situation produces satisfaction be- comes associated with that situation. Similarly any act which in a given situation produces dissatisfaction becomes dissassoci- ated with that situation."-E. L. Thorndike, 1932.


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें