सामान्यीकृत चिंता विकृति
(Generalized Anxiety Disorder or GAD)
सामान्यीकृता पिता विकृति ( Generalized Anxiety Disorder or GAD) एक अन्य चिंता विकृति है जिसपर DSM-IV ( TR ) में विशेष ध्यान दिया गया है। GAD एक ऐसी विकृति है जिसमें रोगी चिरकालिक (chronic ) अवस्तिविक या अत्यधिक चिंता से ग्रस्त रहता है। इस तरह की चिंता को परंपरागत रूप से स्वतंत्र प्रवाही चिंता (free- Floating anxiety ) कहा जाता है। GAD से प्रसित व्यक्ति हमेशा तनाव, चिंता एवं बिपरित अशांति (diffused uneasiness ) की दुनियाँ में होता है। DSM IV (TR) के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को जिंदगी कम-से- -कम गत छह माह ऐसे बीते हो जिसमें अधिकतर अवधि में उसे अवास्तविक एव अत्यधिक चिंता बना हुआ रहा हो, तो निश्चित रूप से उसे GAD का रोगी कहा जा सकता है।
GAD की नैदानिक विशेषताएँ या लक्षण (symptoms) कई हैं। जैसे, सांवेगिक रूप से (emotionally ) ऐसे होगी बेचैन, तनावग्रस्त, सतर्क हैरान (Jittery ) दिखता है। वह आनेवाले खतरों जैसे हृदय आघात, मर जाने या नियंत्रण छात्र आदि जैसी बातों के बारे में सोच-सोचकर काफी परेशान रहता है। संज्ञानात्मक रूप से (cognitively) वह हमेशा कुछ बुरा होने की उम्मीद करते रहता है परंतु यह नहीं बता पाता है कि क्या बुरा होने वाला है। दैहिक (physically ) रूप में भी उसमें कई तरह के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। व्यक्ति में कई आपातकालीन दैहिक प्रतिक्रियाएँ (emergency physical reaction) भी होते पायी गयी हैं जिनमें पसीना आना, हृदय गति तीव्र होना, पेट की गड़बड़ी होना, सिर का उदा-उदा अनुभव होना, हाथ-पाँव काफी ठंड हो जाना आदि प्रधान हैं। ऐसे व्यक्ति जल्द थकान अनुभव करते हैं. एकाग्रचित ( concentrate ) होने में कठिनाई का अनुभव करते हैं, चिड़चिड़ा व्यवहार दिखलाते हैं तथा उनमें अनिद्रा को शिकायत भी होती है। व्यवहारात्मक ( behaviourally) रूप से, ऐसे व्यक्ति हमेशा अपने आप को दूसरों से छुपाते हैं या छुपाने के ख्याल से कहीं और चले जाते हैं। ऐसे व्यक्ति को किसी निर्णय पर पहुँचने में कठिनाई होती है और अगर कसे निर्णय ले भी लिए तो वे यह सोच-सोच कर परेशान रहते हैं कि अवश्य ही उसमें कोई-न-कोई त्रुटि हो गयी होगी।
GAD को विकृति अन्य विकृतियों की तुलना में कम होते पायी जाती है। रेपी ( Rapee, 1991) के अनुसार GAD सामान्य जनसंख्या के मात्र 4% लोगों में ही होते देखा गया है। वारलो (Barlow, 1996 ) के अनुसार GAD की शुरूआत सामान्यतः 15 साल की आयु में प्रारंभ हो जातता है परंतु कुछ व्यक्ति ऐसे भी पाये गये हैं जिन्हें इसकी समस्या पूरे जिंदगी के दौरान होता है। जीवन के तनावपूर्ण घटनाओं के अनुसार GAD महिलाओं में पुरुषों की अपेक्षा अधिक होता है तथा सामाजिक दुर्भाति (social phobia) तथा मनोग्रसित - वाध्यता विकृति ( obsessive-compulsive disorder) के साथ इस रोग के होने की सम्भावना तुलनात्मक रूप से अधिक होती है।
GAD का एक केस उदाहरण (A case example of GAD)
इस कैसे उदाहरण को डेविसन एवं नौल ( Davison & Neale, 1996) द्वारा उद्धृत किया गया है, "24 वर्ष का मैकेनिक को मनश्चिकित्सा के लिए उसे मेडिकल चिकित्सक द्वारा भेजा गया। उसे नींद नहीं आने की शिकायत थी तथा साथ-ही-साथ चक्कर भी आता था। वह आरंभिक साक्षात्कार के दौरान काफी दुखित दीखता था तथा वह बोलते-बोलते हॉफ जाता था तथा उसे काफी पसीना भी आता था। वह बार-बार पानी पीता था फिर भी उसकी प्यास नहीं बुझती थी। उसमें तीव्र चिंता के और भी लक्षण मौजूद थे। वह यह भी कहता था कि उसे हमेशा तनाव बना रहता था। उसे किसी भी चीज की चिंता, होने लगती थी तथा नाना प्रकार की चिंता होती थी। जब वह अन्य लोगों के साथ कार्य करता था. या अंतःक्रिया करता था तो वह सोचकर चिंतित हो जाता था कि कहीं कोई भयानक घटना जैसे हृदय आघात (heart attack) या मृत्यु न हो जाए। उसने अपने अंतर्वैयक्तिक संबंधों (interpersonal relationship) में तरह-तरह की कठिनाइयों के बारे में भी बतलाया और कहा कि उसका यह संबंध दोषपूर्ण होने के कारण हो उसे कई नौकरी से बाहर निकाल दिया गया था।
इस केस उदाहरण में GAD के अधिकतर लक्षण रोगी में पाये गये हैं।
GAD के हैतुकी ( Etiology of GAD)
GAD का अध्ययन नैदानिक मनोविज्ञानियों तथा मनश्चिकित्सकों द्वारा काफी किया गया है और उनके अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि GAD के कई कारण है जिनमें से निम्नांकित प्रमुख हैं-
(1) जैविक कारक (biological factors )
(2) मनोवैज्ञानिक कारक (psychoanalytic factors )
(3) अधिगम से सम्बद्ध कारक (learning factors )
(4) संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक कारक (cognitive-behavioural factors )
इन सबों का वर्णन इस प्रकार हैं-
1. जैविक कारक (biological factors)-
कुछ अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि GAD का कारण आमुर्वेशिकता ( hereditary) है। जैसे, स्लेटर एवं शिल्ड ( Stater & Shields. 1969 ) ने एकांडी जुड़वाँ बच्चों के सत्तरह युग्मों तथा भ्रातीय जुडुवाँ (fraternal twins) के 28 जुडुवाँ युग्मों का तुलनात्मक अध्ययन किया और पाया कि 49% एकांडी जुडुवाँ बच्चों में सामान्यीकृत चिता विकृति थी जबकि मात्र 4% प्रातीय जुडुवाँ बच्चों में चिंता स्नायुविकृति पायी गयी। टासन (Torgersen. 1983) ने अपने अध्ययन में GAD के लिए भी एकांडी जुडुवाँ बच्चों में इसी तर कादर (concordance rate) पाया। इन अध्ययनों के आलोक में यह कहा जा सकता है कि GAD का आधार आनुवंशिकता (hereditary) भी है।
2. मनोवैश्लेषिक कारक (Psychoanalytic factors)
मनोवैश्लेषिक सिद्धान्त द्वारा भी GAD की व्याख्या की गयी है। इस सिद्धान्त के अनुसार अहम् (ego) की इच्छा एवं उपात (id) की इच्छा में अचेतन संघर्ष (unconscious conflict) के कारण GAD की उत्पत्ति होती है। उपाह की ऐसी इच्छाएँ जो प्रायः अपनी अभिव्यक्ति चेतन में चाह है परंतु आ उनके इस अभिव्यक्ति पर इसलिए रोक लगा देता है क्योंकि उसे डर होता है कि ऐसा होने से उसे दंड मिल सकता है। चूंकि ऐसी चिंता का स्रोत अचेतन (unconscious) होता है, अतः रोगी बिना कारण जाने हुए हमेशा चिंतित एवं आशंकित होता है। चिंता का वास्तविक स्रोत अर्थात् गत दंडित उपाह की इच्छाएँ हमेशा मौजूद होती हैं और उससे दूर होने का कोई रास्ता नहीं होता है। फलतः व्यक्ति हमेशा तनावग्रसित तथा आशक्ति रहता है और उसका कारण भी नहीं समझ पाता है।
3. अधिगम से सम्बद्ध कारक (Factors related to learning )-
यहाँ GAD को वातावरण के बाह्य उद्दीपकों external stimuli ) से अनुबंधित ( conditioned ) माना जाता है। ओल्प (Wolpe, 1958 ) ने इस कारण का समका प्रदान किया है। जैसे, यदि कोई व्यक्ति जागृतावस्था में सामाजिक संपर्क (social contact ) के बारे में चिंतित हो सकता है। अगर वह व्यक्ति अन्य लोगों के साथ अपना अधिक समय व्यतीत करता है तो यह समझा जा सकता है कि इसकी चिंता इस परिस्थिति से न कि अन्य आंतरिक कारकों से अनुबंधित ( conditioned ) है। इससे साबित होता है कि GAD में व्यक्ति की चिंता बाह्य उद्दीपकों से अनुबंधित होता है और ऐसे उद्दीपकों का परास (range) काफी विस्तृत होता है।
4. संज्ञानात्मक-व्यवहारात्मक कारक ( Cognitive-behavioural factor )-
संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक मॉडल में GAD के प्रमुख कारण के रूप में नियंत्रण ( control) एवं निःसहायता (helplessness) पर ध्यान केन्द्रित किया गया है। बारलो ( Barlow, 1998 ) के अनुसार GAD के रोगी धमकीपूर्ण परिस्थितियों (threatening situations) को अपने नियंत्रण से परे मानता है जिससे उनमें अत्यधिक चिंता सतत ( continuous ) बना होता है। इस तरह के नियंत्रण को कमी के अतिरिक्त कुछ अन्य संज्ञानात्मक प्रक्रियाएँ भी ऐसे रोगियों के साथ संबंधित होती हैं। केन्डाल एवं इनग्राम ( Kendall & ingram, 1989 ) तथा बेक एवं उनके सहयोगियों (Beck et al. 1987 ) के अनुसार जब व्यक्ति किसी साधारण एवं नयाँ परिस्थिति को भी तनावपूर्ण एवं धमकी भरा प्रत्यक्षण करता है तो उससे अनावश्यक उसकी चिता बढ़ जाती है और इतना ही नहीं, वह सतत बढ़ी हुई मात्रा में बना रहता है। ऐसे रोगी भविष्य के सम्भावित महाविपदा (disaster) के बारे में सोच-सोच कर परेशान रहते हैं। मैकलियोड एवं उनके सहयोगियों (MacLeod et al. 1986) के अध्ययन के अनुसार GAD के रोगियों का ध्यान उन उद्दीपकों की ओर तेजी से जाता है जिनसे उनके अनुसार कुछ दैहिक हानि हो सकती है या जहाँ सामाजिक भाग्यहीनता ( social misfortune) जैसे आलोचना, तिरस्कार एवं व्याकुलता की सम्भावना अधिक होती है। बटलर एवं मैथ्यूज (Butler & Mathews, 1983) के अनुसार ऐसे रोगी अस्पष्ट उद्दीपकों ( vague stimuli) को अधिक धमकीपूर्ण समझते हैं तथा अपने साथ अशुभ घटनाओं के होने की आशंका अधिक समझते हैं।
स्पष्ट हुआ कि GAD के कई सम्भावित कारण हैं। इसके स्वरूप को समझने के लिए इन सबों पर ध्यान देना होगा।
GAD के उपचार (Treatment of GAD )
GAD के उपचार के लिए निम्नांकित दो तरह की प्रविधियाँ अधिक लोकप्रिय हैं- ४. जैविक या मेडिकल प्रविधि (biological or medical techniques) - थॉम्पसन (Thompson, 1996 ) तथा हट एवं सिंह ( Hunt & Singh, 1991 ) द्वारा किये गये अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ है कि चिंता-विरोधी औषध (anti- anxiety drug) के लेने से GAD के चिंता लक्षणों में काफी कमी आ जाती है। परंतु ऐसा देखा गया है कि औषध को बंद करते ही सभी लक्षण पुनः लौट जाते हैं और रोगी फिर से यह सोचने लगता है कि उसके चिंता के लक्षण का स्वरूप कुछ ऐसा है जिसपर नियंत्रण नहीं पाया जा सकता है। इन कारणों से सिर्फ चिंता-विरोधी औषधों का उपयोग करके GAD के रोगियों का स्थायी उपचार सम्भव नहीं है।
2.संज्ञानात्मक व्यवहारात्मक चिकित्सा ( Cognitive Behavioural Therapy or CBT ) -
CBT द्वारा GADA का उपचार सफलतापूर्वक किया गया है और इसके समर्थन में तीन प्रमुख अध्ययनों का उल्लेख किया सकता है। बटलर तथा उनके सहयोगियों ( Butier et al. 1991 ) ने 57 GAD के रोगियों को तीन समूहों में बोरकर प्रत्येक को अलग-अलग प्रविधियों से उपचार किया। वे तीन प्रविधि थे-CBT. सिर्फ व्यवहारात्मक चिकित्सा / behavioural therapy) तथा इंतजार सूची नियंत्रण ( wait-list control) 4 से 12 सत्र तक उपचार किया और 18 महीना तक अनुवर्तन (follow-up) किया गया और पाया गया कि CBT द्वारा किया गया उपचार सबसे अधिक प्रभावशाली सिद्ध हुआ। पाभर तथा उनके सहयोगियों (Paver etel, 1990) ने 101 GAD रोगियों के उपचार में CBT तथा चिंता-विरोधी औषध अर्थात् डियाजेपाम (diazepam) का तुलनात्मक अध्ययन किया। और छह महीना तक के अनुवर्तन (follow-up ) में यह देखा गया कि CBT डियाजेपाम से कहीं अधिक लाभकारी आ। बोरको भेक एवं कास्टेलो ( Borkovee & Costello. 1993 ) ने एक अन्य अध्ययन किया जिसमें GAD के आसार में CBT तथा शिथिलीकरण ( relaxation) को क्लायंट-केन्द्रित चिकित्सा ( client centered therapy ) में अधिक श्रेष्ठ पाया गया।
कभी-कभी GAD के रोगियों में प्रबल चिंता के साथ-ही-साथ चरम निःसहायता (extreme helplessness) का भाव भी होता है। ऐसी परिस्थिति में इस लक्षण को दूर करने के ख्याल से रोगी में उचित चिकित्सीय प्रविधि अपनाकर सामर्थ्यता ( competence) का भाव विकसित किया जाता है। इस तरह का कौशल विकसित करने के लिए शाब्दिक निर्देश (verbal instruction ), मॉडलिंग (modeling ) या क्रियाप्रसूत शेपिंग ( operant shaping) जैसी प्रविधियों का उपयोग किया गया है। गोल्डफ्रिड एवं डेक्सिन (Goldfried & Davison. 1976 ) ने इन तीनों के संयोजित उपयोग को एक अधिक बुद्धिमत्ता कदम बतलाया है।
निष्कर्षतः -
यह कहा जा सकता है कि GAD के उपचार के लिए चिंता-विरोधी औषधों का उपयोग एक अस्थायी समाधान के लिए किया जा सकता है तथा CBT का उपयोग एक स्थायी समाधान के लिए किया जा सकता है।

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