असामान्‍य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology)


असामान्‍य मनोविज्ञान (Abnormal Psychology)

    असामान्‍य मनोविज्ञान का स्‍वरूप  (Nature of Abnormal Psychology)

प्रस्‍तावना (Introduction)

असामान्‍य मनोविज्ञान क्‍या हैं:-

        असामान्‍य मनोविज्ञान के अन्‍तर्गत मानव के व्‍यवहार का अध्‍ययन किया जाता हैं। मनोविज्ञान एक ऐसी शाखा हैं, जिसमें व्‍यक्तियों असामान्‍य व्‍यवहारों एवं मानसिक प्रक्रियाओं का अध्‍ययन किया जाता है। असामान्‍य मनोविज्ञान कहलाता हैं। अत: मनोविज्ञान को व्‍यवहार का मनोविज्ञान भी कहा जाता हैं। 

असामान्‍य मनोविज्ञान मे व्‍यवहार के मुख्‍यत: 2 रूप होते हैं:-

   * सामान्‍य व्‍यवहार 

   * असामान्‍य व्‍यवहार

    सामान्‍य व्‍यवहार:- सामान्‍य व्‍यक्ति वह होता है जो सामान्‍य रूप से अपनी क्रियाओं को करता हैं। अपने दैनिक कार्यों पर विचारपूर्वक निर्णय लेता हैं, तथा सामाजिक नियम एवं मान्‍यताओं को एक सीमा तक पालन करता हैं। 

हार्नी  के अनुसार '' जिस व्‍यक्ति मे स्‍वीकारात्‍मक एवं रचनात्‍मक सभ्‍यता विद्यामान होती हैं । उसका व्‍यक्तित्‍व सामान्‍य व्‍यक्ति कहते हैं। 

सामान्‍य व्‍यक्ति की विशेषताऍं :- (Characteristics of a Normal Personality )

एक सामान्‍य व्‍यक्ति मे निम्‍न विशेषतायें पायी जाती हैं। 

1. सामाजिकता :- सामान्‍य व्‍यक्तियों मे 1 विशेषता यह होती हैं कि उनमे सामाजिक व्‍यवहार के दृटिकोण से कानून की मर्यादा के सम्‍मान का गुण विद्यमान होता हैं। व्‍यक्ति ऐसे कार्य नही करना चाहता , जिनका संबंध समाज विरोधी कार्यों से होता हैं, एवं सामाजिक उत्‍सवों भाग लेते हैं, एवं जाति संस्‍कृति धर्म आद‍ि के नियमों का उल्‍लंघन नही करते हैं। एक सामान्‍य व्‍यक्ति बदनामी से डरता हैं। वह समाज के अन्‍य व्‍यक्तियों से सहयोग की इच्‍छा रखता हैं, तथा मिल‍जुल कर समाज की उन्‍नति करना चाहता हैं। 

2. व्‍यक्तित्‍व विशेषताओं मे समानता :- व्‍यक्तित्‍व विकास के दृटिकोण से कोई भी व्‍यक्ति न तो समान ही होते हैं और न ही उनमें समान कहे जाने वाले संवेगात्‍मक चरित्रिक या बौद्धिक गुणों का समान वितरण होता हैं। सामान्‍य व्‍यक्तियों मे असाधारण उत्‍तेजनशीलता, एकांकीपन, देहशीलता आदि गुण होते हैं। अगर उसमें यह सब गुण होते हैं तो उस व्‍यक्ति मे दोष पाये जाते हैं जीवन भी विफलताओं एवं कष्‍टों से इनका जीवन असंतुलित नही होता बल्‍कि उनके उपचार भी भावनाओं से विचार होता हैं। 

3. विभिन्‍न आवश्‍यकताओं तथा क्रियाओं मे समानता :- सामान्‍य व्‍यक्तियों एक विशेषता यह होती है कि वह अपनी विभिन्‍न आवश्‍यकताओं के प्रति पूर्ण दृष्टिकोट से ध्‍यान देता हैं। जीवन की अनेक छोटी-छोटी आवश्‍यकताओं की पूर्ति के लिए वह नौकर व्‍यापार विभिन्‍न क्रियाओं को समय-समय पर पूर्ण बुद्धिशीलता के साथ सम्‍पन्‍न करता हैं। वह छोटी-छोटी कठिनाईयों पर घबराता नही बल्‍कि साहस का परिचय देता हैं। उसमे सामाजिक कल्‍याण की भावना होती हैं। 

4. परिस्थिति के अनुरूप समायोजन :- सामान्‍य व्‍यक्तियों मे यह एक प्रमुख विशेषता यह होती हैं कि वह अपने व्‍यवहार को समय एवं परिस्थिति के अनुरूप समायोजित(Adjust) करते हुए कार्य करते हैं। अगर दुखद परिस्थिति हैं तो वह दुख के भाव को प्रगट करता हैं, और सुखद परिस्थिति है तो वह हंसता हैं। यह परिस्थिति समायोजन के अनुरूप होती हैं। 

5. सही या गलत नियमों के ज्ञान:- एक सामान्‍य व्‍यक्ति को इस बात का पूर्ण ज्ञान होता हैं कि वह अपनी क्रियाओं में सामाजिक, सांस्‍कृतिक, नियमों, परम्‍पराओं, नैतिक आदर्शों आदि का सही रूप में पालन कर रहा हैं या नहीं। वह समझता हैं कि अमुक कार्य का अनुकुल रूप क्‍या हैं। अत: वह पर्याय सभी कार्यों को करता हैं तथा गलत कार्यों से बचने का प्रयास करता हैं। 

6. अवैधानिक कार्यों के प्रति पश्‍चाताप:- एक सामान्‍य व्‍यक्ति गलत कार्य करता ही न हो यह हो नही सकता ? यह जीवन मे अनेक गलतियॉं करता है ले‍किन यह अनुभव होने पर कि वह गलत काम हैं, वह पश्‍चाताप (Feeling of Remorse) भी करने लगता हैं।

असामान्‍य व्‍यवहार:- असामान्‍य से क्‍या तात्‍पर्य हैं ? असामान्‍य को अंग्रेजी भाषा में ऐबनॉर्मल(Abnormal) ऐबनॉर्मल शब्‍द की उत्‍पत्ति ऐनोमेलस (Anomelos) से हुई हैं। ऐनो का अर्थ है नही, तथा मेलस का अर्थ नियमित (Reguler)। अत: शब्‍द की उत्‍पत्ति के अनुसार असामान्‍य का अर्थ नियमित नही होना हैं अथवा अनियमित(not Regular or Irregular ) अत: हम कह सकते हैं कि असामान्‍य व्‍यक्ति में एक प्रमुख विशेषता यह होती हैं कि उसके व्‍यवहार अनियमितता पाई जाती हैं। अनियमित व्‍यवहार से तात्‍पर्य यह है कि व्‍यवहार में एकरूपता नही हैं तथा यह गुण एक असामान्‍य व्‍यक्ति में ही होता हैं। जिनका व्‍यवहार अन्‍य व्‍यक्ति की अपेक्षा भिन्‍न होता हैं। ये व्‍यक्ति अपने विचारों को न तो स्‍वयं समझते हैं और ना ही अन्‍य लोगों को समझा पाते हैं। ऐसे व्‍यक्तियों मे सामान्‍य व्‍यक्तियों की अपेक्षा सीमित बुद्धि, अस्‍थ‍िर संवेग, असंगठित व्‍यक्तित्‍व, दुषित चरित्र आदि गुण विद्यमान होते हैं। 

पेज(Page) का मत है कि ''असामान्‍य समूह मे उन व्‍यक्तियों को रखा जा सकता हैं जिसमे सीमित बुद्धि, संवेगात्‍मक अस्थिरता, विघटित व्‍यक्तित्‍व दोष निहित होते हैं। 

असामान्‍य व्‍यक्तित्‍व की विशेषतायें:- (Characteristics of an Abnormal Personality) 

एक असामान्‍य व्‍यक्ति मे निम्‍नलिखित विशेषतायें पायी जाती हैं:-   

   1. अधिकतर असामान्‍य व्‍यक्तियों बौद्धिक दुर्बलता या मानसिक रोगग्रस्‍तता निहित रहती हैं।

    2. ये व्‍यक्ति असंतुलित होते हैं।

   3. इनकी क्रियाओं मे असामाजिकता रहती हैं, क्‍योंकि इन्‍हे अच्‍छे बुरे का ज्ञान नही होता ।     

   4. संवेगात्‍मक अस्‍थ‍िरता रहती है।

    5. दूषित चरित्र व जीवन प्रमुखता समाज विरो‍धी(anti-social) होता हैं।

   6. ये व्‍यक्ति समाज मे बोझ बनकर रहते हैं तथा प्रत्‍यक्ष या अप्रत्‍यक्ष रूप से समाज को हानि

        पहुंचाते हैं। दूसरे शब्‍दों मे, असामान्‍य व्‍यक्ति मे सामाजिक कल्‍याण की भावना नही होती ।  

 

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