असामान्‍य मनोविज्ञान की शोध विधियॉं


 असामान्‍य मनोविज्ञान की शोध विधियॉं 

(Research Methods of Abnormal Psychology)

         

            हम सभी जानते है असामान्‍य मनोविज्ञान का विषयवस्‍तु (Subjective Matter) में असामान्‍य व्‍यवहार का अध्‍ययन करना हैं। मनोविज्ञान का असामान्‍य व्‍यवहार का वैज्ञानिक अध्‍ययन करने के लिए इस क्षेत्र में मनोवैज्ञानिकों द्वारा समय-समय पर अनेक विधियों  का उपयोग किया जाता हैं। जिसमें व्‍यक्ति के असामान्‍य व्‍यवहार का अध्‍ययन किया जाता हैं। जिसमें प्रमुख हैं:-

  1. प्रेक्षण विधि(Observation Method ) 

  2. प्रयोगात्‍मक विधि (Experimental Method) 

  3. नैदानिक केस अध्‍ययन विधि(Clinical Case Study Method) 

  4. सहसंबंधात्‍मक विधि(Correlational Method)

  5. अनुदैध्‍य विधि(longitudinal Method)

  6. अनुरूप प्रयोग (Analogue Experiment)

  7. एकांकी केस प्रयोग शोध विधि(Single Case Experiment Research Method)

  8. सर्वे विधि(Survey Method)

  9. क्रॉस-वर्गीय विधि(Cross-sectional Method)

1. प्रेक्षण विधि(Observation Method):-

प्रेक्षण विधि मनोविज्ञान की  सामान्‍य विधि हैं। प्रेक्षण का अर्थ हैं देखना, एक ऐसी क्रमबद्ध विधि जिसमें प्रेक्षक मानसिक रोग से ग्रस्ति व्‍यक्ति को देखकर निष्‍पक्ष भाव से विश्‍लेषण कर,व्‍यवहार का अवलोकन कर व्‍यक्ति के बार में निष्‍कर्ष निकालता हैं। प्राय: प्रेक्षित व्‍यवहार(Observed Behaviour) से विशेष अर्थ निकालने के लिए मनोवैज्ञानिक कुछ प्रकल्‍पना( Hypothesis) का निर्माण करते हैं। इन प्रकल्‍पनाओं को इसलिए महत्‍वपूर्ण माना जाता हैं ,क्‍योंकि उसी के आधार पर यह तय किया जाता हैं कि असामान्‍य व्‍यवहार का उपचार किस तरह किया जायें। 

जैसे:- मान लिया जाये कि एक महिला दिनभर में 80-100 बार अपने हाथों को बार-बार धोती हैं। मनोवैज्ञानिक इस व्‍यवहार का प्रेक्षण करते हैं और पाते हैं कि महिला में कुछ मस्तिष्‍कीय क्षति हैं। मनोवैज्ञानिक व्‍यक्ति के असामान्‍य व्‍यवहार का प्रेक्षण कर असामान्‍य व्‍यवहारों को जानने में अपनी रूचि रखते हैं। 

प्रेक्षण विधि के कुछ लाभ(Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. इस विधि में प्रेक्षक रोगियों के व्‍यवहारों का प्रत्‍यक्ष रूप से प्रेक्षण कर आंकडे संग्रहण करता हैं। अत: प्राप्‍त परिणाम काफी विश्‍वसनीय होते हैं।

  2. प्रे‍क्षण विधि में साधारण तथा गंभीर दोनो रूप से ग्रस्ति रोगियों के व्‍यवहारों का अध्‍ययन किया जाना संभव हैं। अत: इस विधि का कार्यक्षेत्र (Scope) बहुत बडा होता हैं। 

  3. प्रेक्षण विधि में प्रेक्षक रोगियों के व्‍यवहारों का अध्‍ययन कर सकता हैं। इसमें प्रेक्षण की विधि पूर्ण परिभाषित नही होती हैं। परिस्थिति की आवश्‍यकता के अनुकुल उसमें पर्याप्‍त परिवर्तन कर प्रेक्षक उसे अधिक उपयोगी और वैज्ञानिक तथा विश्‍वासनीय बना लेता हैं। 

इन लाभों के बावजूद प्रेक्षण विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) भी हैं जो प्रमुख हैं:-

  1. इस विधि में आत्‍मनिष्‍ठता(Subjectivity) अधिक होती हैं। प्राय: देखा जाता है, कि प्रे‍क्षक रोगियों के प्रति पहले से अपने मन मे योजना बनाकर रखते हैं। जिससे उसका प्रेक्षण वैज्ञानिक नही हो पाता हैं। 

  2. इस विधि से सही अर्थ में लाभ लेने के लिए यह आवश्‍यक है कि प्रेक्षक अच्‍छी तरह से प्रशिक्षित हो, प्रेक्षक अप्रशिक्षित होने की स्थिति में इस विधि का दुरूपयोग होने की संभवना अधिक बढ जाती हैं। 

  3. इस विधि द्वारा प्राप्‍त परिणाम के आधार पर कारण-प्रभाव संबंध(Cause-Effect Relationship) की स्‍थापना नही हो पाती हैं। प्रेक्षण के आधार पर यह नही कहा जा सकता है कि व्‍यक्ति का असामान्‍य व्‍यवहार किस कारण से हैं। अत: प्राप्‍त परिणाम असंतोषजनक प्राप्‍त होता हैं। 

   

2. प्रयोगात्‍मक विधि (Experimental Method) :-

  असामान्‍य मनोविज्ञान मे मनोविज्ञान की अन्‍य शाखाओं के समान प्रयोगात्‍मक विधि(Experimental Method) काफी उपयोग में लायी जाती हैं। इस प्रयोगात्‍मक विधि में प्रयोगकर्ता कुछ चरों(Variables) में जोड-तोड(Manipulation)करता हैं। चरों का मापन करता हैं। जिन चरों का प्रयोगकर्ता जोड-तोड(Manipulation)करता हैं। उसे स्‍वतंत्र चर कहा जाता हैं। जिन चरों  का मापन कर वह उसके बार में पूर्व कथन करता हैं। उसे आश्रित चर कहा जाता हैं । प्रयोग मे कुछ चर ऐसे भी होते है जिसका प्रभाव आश्रित चर पर पडता हैं। अत: मनोवैज्ञानिक व्‍यक्ति में असामान्‍य व्‍यवहारों की प्रभावशीलता की जॉच करने के लिए प्रयोगात्‍मक विधि का उपयोग प्राय: मनोचिकित्‍सक करते हैं। 

  प्रयोगात्‍मक विधि के लाभ(Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. इस विधि में निर्भरता तथा विश्‍वासनीयता अधिक हैं, क्‍योंकि आंतरिक वैद्यता(Internal Validity) अधिक होती हैं। आं‍तरिक वैद्यता अधिक होने के कारण प्रयोग नियंत्रित अवस्‍था मे संपन्‍न हो पाता हैं। 

  2. इस विधि द्वारा प्राप्‍त तथ्‍यों के आधार पर असामान्‍य व्‍यवहार का अवलोकन कर विभिन्‍न सिद्धान्‍तों एवं नियमों के प्रतिपादन मे सहायता मिलती हैं। 

  3. इस सिद्धान्‍त द्वारा अध्‍ययन किये जाने वाले चरों के बीच कारण- परिणाम संबंध(Cause-Effect Relationship) स्‍थापित करने में करने मे मद्द मिलती हैं। 

  4. इस सिद्धान्‍त का उपयोग असामान्‍य व्‍यवहारों के प्रस्‍तावित नियमों एवं सिद्धान्‍तों की जॉच करने मे भी की जाती हैं। 

इन लाभ के बावजूद प्रयोगात्‍मक विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. प्रयोगकर्ता प्राय: प्रयोगात्‍मक विधि मे छोटे प्रतिदर्श(Sample) का ही उपयोग करता हैं। प्रयोगकर्ता अध्‍ययन कर प्राप्‍त निष्‍कर्ष को जीव संख्‍या के लिए सामान्‍यीकृत(Generalize) करता हैं। इस तरह का सामान्‍यीकरण वैद्य नही हो पाता हैं। इसका मतलब यह हुआ कि प्रयोगात्‍मक विधि में आंतरिक वैद्यता होते हुए भी बाह्य वैद्यता(External Validity) नही होती हैं। 

  2. प्रयोगात्‍मक विधि द्वारा असामान्‍य मनोविज्ञान में बहुत सी समास्‍यों का अध्‍ययन संभव नही हैं, क्‍योंकि इसमें कुछ व्‍यवहार एवं नैतिक बंधन होते हैं। जैसे मान लिया जाये कि कोई मनोवैज्ञानिक यह अध्‍ययन करता है कि क्‍या माता-पिता की डाट-फटकार से बच्‍चों मे बाध्‍यात्‍मक हाथ धोने(Compulsive Hand-Washing) का गुण विकसित हो जाता हैं। इस बच्‍चों के दो समूह लिये जायेंगे-

1. एक प्रयोगात्‍मक समूह तथा 2. नियंत्रित समूह 

प्रयोगात्‍मक समूह के माता-पिता को जानबुझकर पालन-पोषण में दण्‍डात्‍मक व्‍यवहार अपनाने को कहा जायेगा, तथा नियंत्रित समूह के माता-पिता को अपनी इच्‍छा से पालन-पोषण करने दिया जायेगा। कुछ वर्षों तक ऐसा करने के पश्‍चात फिर दोनो समूहों में हाथ धोने का बाध्‍यात्‍मक व्‍यवहार का अध्‍ययन क्रमबद्ध किया जायेगा। इस प्रयोग में प्रकल्‍पना यह है कि दण्‍डात्‍मक रूप से पाले गये बच्‍चों मे बाध्‍यात्‍मक व्‍यवहार अधिक विकसित होगा। यह प्रयोग निश्चित रूप से उत्‍तम हैं। इस विधि में वैज्ञानिक निर्भरता(Scientific Dependence) अधिक हैं। 

3. नैदानिक केस अध्‍ययन विधि(Clinical Case Study Method):- 

  असामान्‍य मनो‍विज्ञान में वैज्ञानिक केस अध्‍ययन विधि एक महत्‍वपूर्ण विधि  हैं । इसमें मनोवैज्ञानिक व्‍यक्तियों के समूह मे नही बल्‍कि व्‍यक्ति विशेष का अध्‍ययन करके  किसी स्‍पष्‍ट एवं ठोस निष्‍कर्ष पर पहूॅचते हैं केस अध्‍ययन विधि में रोगी की मानसिकता का विश्‍लेषण किया जाता हैं। सारासन एवं सारासन 1996 के अनुसार '' केस अध्‍ययन में एक रोगी के व्‍यवहार का विस्‍तृत अध्‍ययन किया जाता हैं। स्‍पष्‍ट हुआ कि केस अध्‍ययन विधि में रोगियों के समूह का नही बल्‍कि किसी विशेष रोगी का ही गहन रूप से अवलोकन किया जाता हैं। इस विधि मे रोगी के व्‍यक्तित्‍व की संरचना गति की उसकी कमजोरियॉ,प्रबलता, विकासात्‍मक प्रवृति रोगी के बारे में भविष्‍य में किये जाने वाले निर्णय आदि सम्मिलित होते हैं। 

  केस अध्‍ययन विधि मे रोगी के भूत,वर्तमान तथा भविष्‍य तीनो पहलूओं का समावेश किया जाता हैं। जिसमें भूत पर सबसे अधिक बल डाला जाता हैं। केस अध्‍ययन विधि के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. इस विधि द्वारा व्‍यक्तित्‍व संबंधित समास्‍याओं का संपूर्ण लेखा-जोखा मिलता हैं।इसका परिणाम यह होता है कि इससे प्राप्‍त तथ्‍य मुल्‍यांकन की प्रक्रिया में अधिक भरोसेमंद साबित होते हैं। 

  2. केस अध्‍ययन विधि में मनो‍वैज्ञानिकों को वर्तमान समय में केस के निदान(Diagnosis) तथा भविष्‍य में संभावित नैदानिक हस्‍तक्षेपों को अलग करने में काफी मद्द मिलती हैं।

  इन लाभ के बावजूद नैदानिक केस विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं:-

  1. इस विधि का उपयोग अधिक रूप से गंभीर रोगियों के अध्‍ययन मे नही किया जा सकता हैं। 

  2. इस विधि का स्‍वरूप आत्‍मनिष्‍ठ(Subjective) होता हैं। अत: इसकी विश्‍वासनीयता तथा वैद्यता संदेह के घेरे मे होती हैं। इस विधि का स्‍वरूप अधिक जटिल होता हैं,क्‍योंकि सम्मिलित किये गये प्रश्‍नों को ठीक ढंग से तैयार करने के लिए नैदानिक सुझबुझ,कौशलता एवं समझ की अधिक मात्रा मे जरूरत पडती हैं। इसका सही उपयोग एक प्रशिक्षित एवं कुशल मनोवैज्ञानी ही कर सकता हैं। 

4. सहसंबंधात्‍मक विधि(Correlational Method):-

  यह असामान्‍य मनोविज्ञान की एक अन्‍य सहसंबंधात्‍मक विधि (Correlational Method) हैं। सारासन(SARASON) 1996 के अनुसार ''सहसंबंधात्‍मक अध्‍ययनों मे अनुसंधानकर्ताओं द्वारा नियंत्रित घटनाओं के बीच संबंधों का अनुसंधान किया जाता हैं। सहासंबंधात्‍मक एक तरह से अप्रयोगात्‍मक विधि (Non-Experimental Method) जिसमें दो चरों या कारकों के बीच में सहसंबंध जैसे मनोवैज्ञानिक दो चरों तथा सांवेगिक रोग के बीच संबंध का अध्‍ययन करना चाहता हैं। इस के लिए व्‍यक्तियों के ऐसे समूह का अध्‍ययन करना होता है जिनका स्‍वभाविक रूप से संबंध विच्‍छेद हो चुका हैं,तथा उसकी तुलना ऐसे व्‍यक्ति से की जा सकती है जिनकी शादी बरकरार हैं। इन दोनो समूहों के व्‍यक्तियों मे सांवेगिक स्‍थिरता के मापन पर प्राप्‍त प्राप्‍तांक के बीच सहसंबंध ज्ञात करके एक निश्चित निष्‍कर्ष पर पहॅूचा जा सकता हैं। 

  असामान्‍य मनोविज्ञान मे एक विशेष तरह के सहसंबधात्‍मक डिजाईन (Correlational Design) का उपयोग अधिक होता हैं। जिस डिजाईन मे जिन लोगों मे कुछ मानसिक रोग होता हैं कि पहचान करके उनकी तुलना एक नियंत्रित समूह से अर्थात जिन लोगों मे कोई बिमारी नही होती हैं, के साथ की जाती हैं। मनोविदलिता इस रोग को एक अच्‍छा उदाहरण हैं। 

  सहसंबंधात्‍मक विधि के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. इस विधि मे किसी वैज्ञानिक विधि के दो मुख्‍य उद्देश्‍यों अर्थात विवरण(Description) तथा पूर्वानुमान(Prediction) दोनो की पूर्ति उत्‍तम ढंग से होती हैं। 

  2. यह विधि असामान्‍य व्‍यवहार के अध्‍ययन के लिए अधिक लाभदायक हैं। 

  इन लाभ के बावजूद सहसंबंधात्‍मक विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. इस विधि में आंतरिक वैद्य(Internal Validity) तथा बाह्य वैद्यता(External Validity) दोनो की ही पर्याप्‍त कमी होती हैं। 

  2. इस विधि में कारण-परिणाम संबंध का अनुमान नही लगाया जा सकता हैं। जो इसको सबसे बडा अलाभ हैं। 

5. अनुदैध्‍य विधि(longitudinal Method):-

असामान्‍य मनोविज्ञान में अनुदैध्‍य विधि का उपयोग किया जाता हैं। इसमें अग्रलिखित विध‍ि सें व्‍यक्तियों के एक ही समूह का अध्‍ययन विभिन्‍न अवसरों पर एक पूर्व निश्चित अरसे तक किया जाता हैं, चुंकि इस समूह का अध्‍ययन कई बार किया जाता हैं, इसलिए विभिन्‍न चरों कारकों के बीच समय-क्रम संबंध(Time-order Relationship) स्‍थापित करना संभव हो पाता हैं। अत: यह एक अप्रयोगात्‍मक विधि हैं। इस विधि में सामान्‍यत: दो प्रकार के डिजाइन का उपयोग किया जाता हैं। 

  1. वंशागत उच्‍च जोखिम डिजाइन (Genetic High-Risk Design) 

  2. व्‍यवहार परक उच्‍च जोखिम डिजाइन(Behavioural High-Risk Design)


1. वंशागत उच्‍च जोखिम डिजाइन (Genetic High-Risk Design) 

मेडिनिक,जॉन,स्‍कूसिंग(Mednick,John,Scussing, 1982) ने असामान्‍य के क्षेत्र में इस डिजाइन का उपयोग अतिमहत्‍वपूर्ण ढंग से किया है । इन्‍होंने लोगों मे मनोविदालिता (Schizophrenia) के रोग से ग्रस्‍त माताओं के बच्‍चों के विकास का अध्‍ययन किया। इस रोग मे उन्‍होने अनुवंशिक आधार को पाया।अत: इनके बच्‍चों मे भी इस रोग के होने की तीव्र संभावना थी। ऐसे बच्‍चों का अध्‍ययन कई वर्षों तक किया गया।जिसके दो परिणाम चर्चित हुए। पहला मनोविदालिता के रोग से ग्रस्‍त माताओं के बच्‍चों मे यह रोग वास्‍तव में अधिक विकसित हुआ। वे उन माताओं के तुलना में अधिक क्षुब्‍त पाई गई थी। जो मनोविदालिता की रोगी तो थी ही परंतु उनके बच्‍चों मे अभी कोई रोग विकसित नही हुआ था। दूसरा, वैसे बच्‍चों की माताओं जिसमें मनोविदालिता का रूप विकसित हो गया था। जिन्‍हे उस समय मनासिक अस्‍पताल मे भर्ती करवा दिया गया था। 

2. व्‍यवहार परक उच्‍च जोखिम डिजाइन(Behavioural High-Risk Design)

इस डिजाइन का उपयोग असामान्‍य व्‍यवहार के अध्‍ययन मे काफी किया गया। इसमें किसी रोग उत्‍पन्‍न होने की अनुवंशिक संवेदनशीलता होती हैं। उनका चयन इसलिए किया जाता हैं कि उसमें कुछ ऐसी वैज्ञानिक विशेषतायें होती हैं, जो उस रोग की संवेदनशीलता उत्‍पन्‍न करती हैं। एक सबसे मसहूर अध्‍ययन चैपमेन एवं चैपमेन 1987 द्वारा किया गया । उन्‍होने एक परिक्षण पर आय प्राप्‍तांकों के आधार पर कुछ ऐसे व्‍यक्तियों की पहचान की जिसमें असाधारण चिन्‍तन प्रक्रियायें थी। फलत: उनमें मनोविक्षि‍प्‍त(Psychosis) होने की प्रमुख की प्रकल्‍पना की गई। दो साल तक उनका निरीक्षण करने के बाद यह पाया गया कि उच्‍च जोखिम समूह के करीब 60 लोगों मे निम्‍न जोखिम की अपेक्षा मनोविक्षिप्‍तता जैसे मानसिक अवस्‍था स्‍पष्‍ट रूप से दिखलायी देती हैं। अत: उच्‍च जोखिम समूह के तीनों व्‍यक्तियों में मनाविक्षिप्‍तता का रोग उत्‍पन्‍न हो गया, परंतु निम्‍न समूह के व्‍यक्तियों मे मनोविक्षिप्‍तता का रोग उत्‍पन्‍न नही हुआ था।

  अनुदैध्‍य विधि (Longitudinal Method)  के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. अनुदैध्‍य विधि के द्वारा किये गये अध्‍ययनों में  सहसंबं‍धात्‍मक विधि द्वारा किये गये अध्‍ययनों से शक्तिशील एवं भरोसेमन्‍द हैंं। 

  2. अनुदैध्‍य विधि द्वारा किये गये अध्‍ययनों में विकासात्‍मक कारकों के पडने वाले प्रभावों का उच्‍च अवलोकन संभव हैं। 

  इन लाभ के बावजूद अनुदैध्‍य विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. इस विधि द्वारा किये गये अध्‍ययन के परिणाम के आधार पर यह नही कहा जा सकता कि अमुक व्‍यवहार का कारण अमुक चर हैं। 

  2. इस विधि में अध्‍ययन कई महिनों तथा वर्षों तक चलता हैं। अत: व्‍यक्तियों मे समान उपलब्‍धता हमेशा नही बनी रह पाती हैं।जिससे इसकी वैद्यता पर शक होता हैं। 

6. अनुरूप प्रयोग (Analogue Experiment):-

अनुरूप या तुल्‍य रूप प्रयोग का शोध भी असामान्‍य मनोविज्ञान मे किया जाता हैं। इस विधि में एक प्रयोग के समान या तुल्‍य परिस्थिति कायम करके असामान्‍य व्‍यवहार का अध्‍ययन किया जाता हैं। जैसा हम जानते हैं प्रयोगात्‍मक विधि (Experimental Method) का एक महत्‍वपूर्ण दोष यह है कि इस विधि में सभी तरह के असामान्‍य व्‍यवहारों का अध्‍ययन संभव नही हैं। इस समतुल्‍य या अनुरूप प्रयोग में प्रयोगात्‍मक विधि का दोष अपने आप दूर हो जाता है कि शोध में शोध करता एक ऐसी परिस्‍थिति उत्‍पन्‍न करता है, जो वास्‍तविक जिन्‍दगी की परिस्थिति के समान होती हैं तथा जिसमें कोई असामान्‍य व्‍यवहार हो सकता हैं, तथा इसका उपचार सफलता पूर्वक किया जा सकता हैं। 

  अनुरूप प्रयोग के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. अनुरूप प्रयोग में कारणात्‍मक संबंध(Causal Relationship) की पहचान करने के लिए आवश्‍यक नियंत्रण संभव हो पाता हैं। इसकी अंतरिक वैद्यता(Internal Validity) अधिक होती हैं। 

  2. अनुरूप प्रयोग के एक अन्‍य लाभ यह हैं कि इसमें प्रयोगकर्ता चरों की जॉच कर सकता हैं, तथा उसमें जोड-तोड(Manipulation) वास्‍तविक विषादि व्‍यक्तियों के साथ नही किया जा सकता हैं। 

  इन लाभ के बावजूद अनुरूप प्रयोग के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं। 

  1. अनुरूप प्रयोग वास्‍तविक परिस्‍थिति के मात्र अनुरूप ही होता हैं। न कि वास्‍तविक परिस्थिति का प्रतिकृति(Reproduction) होता हैं। अत: लोगो को भरोसा अधिक नही हैं।

  2. अनुरूप में जबकि अंतरिक वैद्यता तो होती हैं परंतु बाह्य वैद्यता नही होती हैं।

7. एकांकी केस प्रयोग शोध विधि(Single Case Experiment Research Method):-

यह एक प्रयोगात्‍मक शोध हैं। असामान्‍य मनोविज्ञान मे एकांकी केस प्रयोग शोध विधि का भी अधिक उपयोग होता हैं। जिसमें एक ही व्‍यक्ति या केस का विशेष प्रयोगात्‍मक डिजाइन द्वारा अध्‍ययन करके किसी निष्‍कर्ष पर पहुचा जाता हैं। 

समस्‍यायें:- 

  1. कभी-कभी एक सामूहिक प्रयोग के लिए पर्यप्‍त प्रयोज्‍यो को इकट्ठा करना एक कठिन कार्य हैं। 

  2. प्रयोज्‍यों के समूह का औसत अनुक्रिया(Average Response) किसी व्‍यक्ति विशेष की अनुक्रिया का प्रतिनिधित्‍व नही भी कर सकता हैं। 

  एकांकी केस प्रयोग शोध विधि के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. इस विधि में कारण-परिणाम संबंध के लिये पर्यप्‍त सबूत मिल जाते हैं, यदि विवेचन देने के साथ-साथ व्‍यक्ति के व्‍यवहार में क्रमबद्ध परिवर्तन आता जाता हैं। 

  2.  इस विधि द्वारा किये गये अध्‍ययन में अंतरिक वैद्यता अधिक होती हैं।

  3. इस विधि से प्राप्‍त परिणाम में विश्‍वासनीयता अधिक होती हैं। 

  इन लाभ के बावजूद एकांकी केस प्रयोग शोध विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं। 

  1.  इस विधि में एक ही व्‍यक्ति के व्‍यवहार का अध्‍ययन करके किसी निष्‍कर्ष पर पहुच जाता हैं। अत: इसमें बाह्य वैद्यता नही होती हैं। 

  2.  इस विधि में व्‍यवहारिकता उत्‍तम नही हैं, क्‍योंकि इस विधि के अध्‍ययन में समय एवं श्रम अधिक लगता हैं। 

8. सर्वे विधि(Survey Method):-

असामान्‍य व्‍यवहार के अध्‍ययन में सर्वे विधि का उपयोग लक्ष्‍य जीव संख्‍या (Target Population) का निर्धारण करके उसमें एक प्रतिदर्श(Sample) का चयन कर लिया जाता हैं। तथा उनके विचारों को साक्षात्‍कार या प्रश्‍नावली के माध्‍यम से जाना जाता हैं। उसके आधार पर किसी निष्‍कर्ष पर पहुचा जाता हैं। 

  सर्वें विधि के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. इस विधि द्वारा किये गये अध्‍ययन से यह आसानी से पता चल जाता है कि जीवसंख्‍या मे अमुक रोग की व्‍यापकता(Prevalence) कितनी हैं।

  2. इस विधि द्वारा अध्‍ययन में अध्‍ययनकर्ता को यह पता चल जाता है कि अमूक रोग तथा अन्‍य चरों जैसे उम्र, यौन तथा अन्‍य रोगों की व्‍यापकता के बीच कितना एवं कैसा संबंध हैं। 

  इन लाभ के बावजूद सर्वें विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं।

  1. सर्वे विधि मे प्रतिदर्श के आधार पर जीव संख्‍या के बारे में सामान्‍यीकरण करने की कोशिश की जाती हैं, और ऐसी अवस्‍था में प्राप्‍त परिणाम अधिक विश्‍वासनीय नही रह पाते हैं। 

  2. सर्वे विधि में अक्‍सर देखा गया है कि उत्‍तरदाता समाजिक रूप से व्‍यवहार करने या उत्‍तर देने के लिए एक तरह का अपने उपर दबाव का अनुभव करता हैं। ऐसी परिस्थिति में सर्वे विधि के प्राप्‍त आंकडों पर विश्‍वास नही किया जा सकता हैं। 

9. क्रॉस-वर्गीय विधि(Cross-sectional Method):-

इस विधि में विभिन्‍न चयनित व्‍यक्तियों की तुलना एक समय मे एक साथ की जाती हैं। यह विधि अनुदैध्‍य विधि के ठीक विपरित होती हैं। असामान्‍य व्‍यवहार के अध्‍ययन में क्रॉस-वर्गीय विधि का उपयोग व्‍यक्तियों के एक समूह का अध्‍यययन विभिन्‍न समय अंतराल पर अधिक लंबे समय तक किया जाता हैं। जैसे यदि हम अध्‍ययन करते है कि किस तरह से सामान्‍य एवं असामान्‍य किशोर आत्‍म-वर्णन(Self-Descriptions) में एक दूसरे से भिन्‍न होते हैं। ऐसी परिस्थिति मे क्रॉस-वर्गीय विधि का प्रयोग उत्‍तम माना गया हैं। 

  क्रॉस-वर्गीय विधि के लाभ (Advantages) तथा अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख लाभ अग्रलिखित हैं।

  1. इस विधि में अध्‍ययनकर्ता का उद्देश्‍य दिये हुए समय में एक या एक से अधिक समूहों का तुलनात्‍मक अध्‍ययन करना होता हैं।अत: यह विधि सबसे उपयोगी मानी जाती हैं। 

  2. इस विधि में व्‍यवहारिकता का गुण होता हैं।

  इन लाभ के बावजूद क्रॉस-वर्गीय विधि के कुछ अलाभ(Disadvantages) हैं। इसके प्रमुख अलाभ अग्रलिखित हैं।

  1. इस विधि द्वारा किसी एक व्‍यक्ति के व्‍यवहार मे होने वाला परिवर्तन का अध्‍ययन संभव नही हैं। 

  2. इस विधि द्वारा अध्‍ययन में प्राप्‍त परिणामों की वैद्यता अक्‍सर प्रभावित होती हैं। अध्‍ययनकर्ता द्वारा जो भी व्‍यक्ति उपलब्‍ध हो पाते हैं उनका चयन कर अध्‍ययन प्रारंभ कर लिया जाता हैं। अत: यह वैज्ञानिकीय कदम नही हैं। 

निष्‍कर्ष :- 

  मनोविज्ञान असामान्‍य मनोविज्ञान की एक प्रमुख शाखा है जिसमें व्‍यक्तियों के व्‍यवहारों एवं मानसिक प्रक्रियाओं का वैज्ञानिक अध्‍ययन किया जाता हैं। असामान्‍य मनोविज्ञान में असामान्‍य व्‍यवहार की सैध्‍दांतिक व्याख्‍या (Theoretical Explanation) करने की कोशिश की जाती हैं। मनोविज्ञान के अन्‍य शाखाओं के समान महत्‍वपूर्ण तथ्‍यों की व्‍याख्‍या प्रमुख सिद्धांतों के रूप में की जाती हैं। अत: यह कहा जा सकता है कि असामान्‍य मानसिक प्रक्रियाओं के न‍िदान, वर्गीकरण, रोकथाम तथा संबंधित तथ्‍यों को अध्‍ययन मनोविज्ञान के अन्‍तर्गत किया जाता हैं, एवं आवश्‍यकतानुसार वैज्ञानिक व्‍याख्‍या के लिए सिद्धांतों का एवं शोध विधियों का निर्माण मनोविज्ञान के अन्‍तर्गत किया जाता हैं। 


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