obsessive compulsive psychoanalysis
मनोग्रस्तता-बाध्यता मन:स्नायुविकृति
प्रारम्भिक मनोवैज्ञानिक मनोग्रस्तता (Obsession) व बाध्यता (compulsion) को दो विभिन्न मानसिक रोग मानते थे। लेकिन बाद के अध्ययनों से ज्ञात हुआ कि दोनो एक ही मनोस्नायुविकृति के दो रूप होते हैं। जैने (Janet, 1859-1947) ने इस मनोस्नायुविकृति को 'साइक्मथेनिया' के अन्तर्गत रखा, लेकिन 'अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन' (American Psychiatric Association) के नवीन वर्गीकरण के अनुसार इस मनोविकृति का स्वतन्त्र रूप से वर्णन किया है। जैसा कि इसके नाम से स्पष्ट है कि इसमें मनोग्रस्तता तथा बाध्यता के दो प्रमुख लक्षण पाये जाते हैं। रोगी में दोनो लक्षण एक साथ पाए जाते हैं, लेकिन कभी इसके एक रूप की प्रधानता होती हैं,तो कभी दूसरे रूप की; और कभी-कभी समान रूप से दोनों रूपों की प्रधानता पाई जाती हैं। अब हम मनोग्रस्तता व बाध्यता के स्वरूप को अलग-अलग करके वर्णन करेंगे, जिससे कि इस मनोस्नायुविकृति को ठीक प्रकार समझा जा सकें।
मनोग्रस्तता का स्वरूप
(Nature of Obsession)
मनोग्रस्तता की स्थिति में रोगी अपनी मानसिक शान्ति को बनाए रखने के लिए ऐसे विचारों को अपनी चेतना में उपस्थित व प्रमुखता को स्वीकार कर लेता है जो कि व्यर्थ, अतार्किक व विघ्नकर होते हैं। दूसरे शब्दों में, व्यक्ति की चेतना अतार्किंक एवं व्यर्थ के विचारों से पीडित रहती है। वह इन विचारों का असंगत तथा अतार्किक जानते हुए भी अपने मस्तिष्क से इन्हें हटा नहीं पाता। वह चाहता हैं कि ये विचार मस्तिष्क से परे हो जायें लेकिन ये विचार चेतन से अलग नहीं हो पाते। फिशर(Fisher) के अनुसार-''मनोग्रस्तता एक ऐसे विशिष्ट स्वरूप की मानसिक या आन्तरिक क्रिया है जिसे व्यक्ति अतार्किक समझाता हैं। लेकिन उस पर उसका कुछ नियंत्रण नहीं होता है।'' पेज(Page) के अनुसार-'' मनोग्रस्तता वह विचार या आवेग हैं जो रोगी की इच्छा के प्रतिकूल अपने आप ही उसके मन में बार-बार आता हैं। अगर हम इन परिभाषाओं का विश्लेषण करें तो हमें निम्नलिखित मुख्य बातें इस सम्बन्ध में ज्ञात होती हैं:-
(1) मनोग्रस्तता एक मानसिक रोग हैं।
(2) रोगी के मन में भिन्न-भिन्न प्रकार के व्यर्थ के अतार्किंक विचार या आवेग
बार-बार आते रहते हैं।
(3) इनका रोगी की इच्छा से कोई सम्बन्ध नहीं रहता हैं।
(4) रोगी इन पर किसी भी प्रकार का नियन्त्रण करने में असमर्थ होते है।
(5) संक्षेप में मनोग्रस्तता से सम्बन्धित रोगी चेतन पर नियंत्रण न करने के कारण
व्यर्थ एवं अतार्किंक क्रियाओं को करने के लिए बाध्य हो जाता हैं।
बाध्यता का स्वरूप
(Nature of Compulsion)
बाध्यता के रोगी के अन्दर यह प्रबल, प्रेरणा बनी रहती है कि वह किसी संस्कारजन्य कार्य को बार-बार अनुभव करें। यही कारण है कि इसमें रोगी कुछ कार्यों को बार-बार करता रहता हैं; जैसे- रूपये गिनना, कन्धे उचकाना, जीभ निकालना, हाथ धोना, चिन्हों को पढना आदि । इस प्रकार की क्रियाओं को व्यक्ति सामान्य जीवन में भी करता हैं लेकिन जब इन क्रियाओं का अतिरंजित विकास हो जावें तो व्यक्ति इस मानसिक विकृति का शिकार हो जाता है। फिशर(Fisher) के अनुसार '' बाध्यता एक ऐसे विशिष्ट स्वरूप की बार-बार होने वाली बाध्य क्रिया है जिसे व्यक्ति उस परिस्थिति में जिससे वह क्रिया होती हैं, अतांकिक व असंगत समझाता हैं लेकिन उस पर उसका कुछ भी नियंत्रण नहीं होताा'' इस परिभाषा का विश्लेषण करने पर निम्नलिखित मुख्य बातें मिलती हैं:-
(1) बाध्यता एक मानसिक रोग हैं।
(2) इसमें रोगी एक ही क्रिया को बार-बार दोहराता हैं।
(3) यह क्रिया अतार्किक व असंगत होती हैं।
(4) रोगी का इन क्रियाओं पर कोई नियंत्रण नहीं होता ।
मनोग्रस्तता-बाध्यता मन:स्नायुविकृति का स्वरूप
(Nature of Obsession Compulsion Psychoneurosis)
मनोग्रस्तता व बाध्यता- दोनों की परिभाषाओं को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि सामान्यत: दोनों में एक ही प्रकार की मनोदशा रहती है। रोगी यह जानता है कि उसके यह विचार तथा कार्य अतार्किक व असंगत है लेकिन फिर भी इन्हें नियन्त्रित या छोड सकने में असमर्थ रहता हैं। मनोग्रस्तता में क्रियाऍं बोधात्मक स्वरूप की होती है जिनका प्रकाशन केवल ज्ञान के स्तर पर होता हैं। लेकिन बाध्यता में क्रियात्मक क्रियाऍं होती हैं। जिनका प्रकाशन एक विशिष्ट प्रकार की चेष्टाओं में होता हैं। यही कारण है कि इस विकृति को हम मनोग्रस्तता बाध्यता मनोस्नायुविकृति के नाम से पुकारते हैं। इस रोग में कभी-कभी केवल बोधात्मक क्रियाओं की ही प्रधनता रहती है जिससे प्रेरित होकर रोगी एक ही क्रिया को बार-बार के लिए बाध्य हो जाता है; जैसे- एक बार हाथ साफकर लेने पर भी बार-बार हाथ को साफ करना, बन्द ताले को बार-बार देखना, एक विशेष संख्या व नाम को बार-बार दोहराना तथा पास में बैठे व्यक्ति को नोंचना आदि लक्षण पाये जाते हैं।
इस रोग के लक्षण या कारण समझने से पूर्व हमें दैनिक जीवन की सामान्य बाध्यता व मनोग्रस्तता जैसी क्रियाओं व इस रोग की क्रियाओं के अन्तर को समझता आवश्यक हैं। सामान्य जीवन की बाध्यता व मनोग्रस्तता में व्यक्ति को इस बात का ज्ञान नहीं होता कि ये क्रियाएँ निरर्थक, असंगत व हास्यास्पद हैं। लेकिन मानसिक रोग में बाध्यता एवं मनोग्रस्तता वास्तव में निरर्थक, असंगत व हास्यास्पद ज्ञात होती हैं। रोगी को उनका ज्ञान रहता है लेकिन उन पर वह नियन्त्रण करने में असमर्थ होता हैं। रोगी को इन क्रियाओं से छुटकारा नहीं मिलता लेकिन सामान्य जीवन में एक बार सोच लेने व क्रिया को करने के बाद व्यक्ति में सन्देह की भावना समाप्त हो जाती हैं; उदाहरणस्वरूप- एक स्वस्थ व्यक्ति सोने से पूर्व कमरे का दरवाजा ठीक से बन्द कर बिस्तर पर लेट जाता हैं। अचानक उसके मन में संदेह उत्पन्न होता है कि वास्तव में उसने दरवाजा बन्द कर दिया हैं या नहीं । इस सन्देह को दूर करने के लिए वह दरवाजे के पास जाता है तथा यह देखकर कि दरवाजा बन्द हैं, वह निश्चित होकर सो जाता हैं। लेकिन जो व्यक्ति इस मानसिक रोग से पीडित होता है वह दरवाजे का बार-बार निरीक्षण करता रहता हैं तथा उसके सन्देह की पुष्टि नही होती जिसके परिणामस्वरूप वह दरवाजे का बार-बार निरीक्षण करता हैं। व्यक्तिगत व सामाजिक दृष्टिकोण से भी एक सामान्य व्यक्ति की इन क्रियाओं एवं एक रोगी की क्रियाओं में अन्तर होता है; जैसे- मानसिक रोगों की बाध्यता हानिकारक होती हैं; उदाहरण- स्वरूप- एक रोगी को आग लगाने की बाध्यता है तो इस क्रिया से समाज को भी हानि होती है तथा रोगी को दण्ड मिलने के बाद भी वह अपनी इस हरकत से दूर नही होता, जबकि एक सामान्य व्यक्ति बाध्यता जैसी क्रियाओं के शिकार के बाद एक बार दण्डित होने पर ही उस क्रिया से दूर हो जाता है।
प्रो0केमरॉन(Cameron) ने बताया कि इस प्रकार की मनोस्नायुविकृति में अचेतन अन्तर्द्वन्द्व (unconscious conflicts) खुले रूप से व्यर्थ कार्यों को बार-बार दोहराने(शब्दों या विचारों को), कर्मकाण्डों, रूढिपालन व अनावश्यक रूप से शिष्टाचार के रूप में प्रदर्शित होते हैं। इस रोग के प्रधान अचेतन अन्तर्द्वन्द्व का सम्बन्ध प्रेम व घृणा, शुभ व अशुभ, व्यवस्था व अव्यवस्था, स्वच्छता व अस्वच्छता से सम्बन्धित होते हैंं।
OCD का उपचार( Treatment of OCD)
OCD के उपचार के लिए कई तरह के चिकित्सीय प्रविधियों(therapeutic techniques ) का प्रावधान किया गया हैं जिसमें निम्नांकित तीन प्रमुख हैं:-
(1) मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा (psychoanalytic therapy)
(2) व्यवहार चिकित्सा (behaviour therapy)
(3) औषध सिद्धांत (drug therapy)
(1) मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा (psychoanalytic therapy)- इस तरह की चिकित्सा में रोगी के अचेतन मन में दमित मानसिक संघर्ष की पहचान करने की कोशिश की जाती हैं। इस चिकित्सीय प्रविधि में रोगी के सुरक्षात्मक प्रतिक्रियाओं(defensive reaction) का विस्तृत विश्लेषण किया जाता है और उसके मानसिक संघर्ष की उत्पत्ति के कारणों में उसकी सूझ विकसित की जाती हैं। रोगी को रोग के कारण की उत्पत्ति में सूझ विकासित हो जाती है, रोग के लक्षण लगभग समाप्त होते दिखते हैं। लॉघलिन(Laughlin, 1976) के अनुसार OCD के उपचार में मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा अधिक प्रभावकारी सिद्ध नहीं हुआ हैं क्योंकि इस विधि में रोगी के सुरक्षात्मक प्रतिक्रियाओं के विश्लेषण में वर्षों का समय लग जाता है और उसके बाद भी उसका कोई ठोस नतीजा नहीं निकलता हैं। OCD का मनोविश्लेषणात्मक चिकित्सा द्वारा उपचार करने से सम्बद्ध चूँकि कोई नियन्त्रित अध्ययन नहीं हुआ है, अत: इस चिकित्सा सुविधा की प्रभावशीलता(effectiveness) के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता हैं।
(2) व्यवहार चिकित्सा (behaviour therapy)- OCD में व्यवहार चिकित्सा की एक प्रमुख भुमिका हैं। व्यवहार चिकित्सा को तीन प्रविधियों में अर्थात् मॉडलिंग (Modeling), फ्लडिंग (Flooding), अनुक्रिया निवारण (Response Preven) को संयोजित करके OCD में सफलता पूर्वक उपचार किया जाता हैं। OCD में व्यवहार चिकित्सा के अन्तर्गत तीन प्रविधियों को संयोजित करके क्रमबद्ध तथा सुसंबद्ध एवं नियन्त्रित अध्ययन किये जाते हैं। मॉस्क एवं रैचमेन,साल्जमेन एवं थैलस ने इन तीन प्रविधियों का अध्ययन उपयोग बार-बार हाथ धोने के बाधित व्यवहार को दूर करने में अधिक सफलतापूर्वक किया गया । सामान्यत: बाधित व्यवहार मनोग्रस्ति चिंतन होता हैं कि उसका प्रभाव शरीर में कुछ जीवांणु या विशाणु से संदूषित हो जाता हैं। इस लक्षण के निवारण में तीनों विधियों का संयुक्त उपचार इस प्रकार किया जाता हैं।
(1) रोगी यह देखता हैं कि चिकित्सक अपने आपको किस प्रकार गंदगी से संदुषित
कर लिये हैं। यह फ्लडिंग का एक उदाहरण हैं।
(2) उसी अवस्था में हाथ धोये कुछ घंटों तक अपने आपको रखे रहता हैं। यह
अनुक्रिया निवारण (Response Preven) का उदाहरण हैं।
(3) इस तरह से दर्जनों सत्र (dogen session) में रोगी को अपने पूरे शरीर के
उपर गंदगी को फैलाकर बिना साफ-सुथरा किये घंटों तक बैठने के लिए कहा
जाता हैं। इस परिणाम यह होता हैं कि मनोग्रस्ति चिंतन धीरे-धीरे समाप्त हो
जाता हैं, तथा बार-बार हाथ धोने का बाधित व्यवहार भी कम हो जाता हैं।
उपर्युक्त 6 अध्ययनों में यह पाया गया कि करीब OCD के दो तिहाई रोगियों में इन 3 प्रविधियों के उपयोग से रोग के लक्षण समाप्त होते पाये गये हैं। अत: स्पष्ट हुआ कि व्यवहार चिकित्सा एक काॅफी उपयोगी चिकित्सा विधि साबित हुई हैं।
(3) औषध सिद्धांत (drug therapy)-OCD के उपचार में कुछ औषधों के गुणकारी प्रभाव पडते देखे गए हैं। क्लोमिप्रेमाइन(Clomipramine) के ऐसी औषधि हैं जिसके सेवन से OCD के लक्षण समाप्त होते दिखते हैं। क्लोमिप्रेमाइन एक विषाद विरोधी दवा हैं,जो सेरोटोनिन के पुर्नवापसी(Reuptake) को रोकता हैं। ऐसे अध्ययनों मे यह देखा गया हैं कि क्लोमिप्रेमाइन के कुछ दिनों तक सेवन करने से मनोग्रस्तता समाप्त हो जाती हैं। तथा बाध्यता भी आसानी से कम हो जाती हैं। क्लोमिप्रेमाइन द्वारा उपचार किये जाने पर OCD के लगभग 50 से 60 प्रतिशत रोगियों में मनोग्रस्ति बाध्यता के लक्षण दूर हो जाते हैं।
परंतु क्लोमिप्रेमाइन OCD के उपचार के लिए पूर्ण सार्थक दवा नहीं हैं। कुछ अध्ययनों मे यह पाया गया हैं कि बहुत से रोगी इस औषध का सेवन करने से ठीक नही हो पाते हैं। कुछ रोगी इस औषध को पार्श्व प्रभाव(side effect) के डर से सेवन नही करते हैं। निष्कर्षत: यह कहा जा सकता है कि OCD के उपचार में कई प्रविधियॉं हैं जिसमे व्यवहार चिकित्सा सबसे अधिक प्रभावी हैं।

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