अधिगम सिद्धान्त


अधिगम सिद्धान्त

            गुथरी के अधिगम सिद्धान्त की मूल अवधारणाएँ वही हैं, जिनका प्रयोग हल किया ।

1. "All that the most sofisticated man can do in any situation is to contract his muscles in some order and pattern. Sofistication consists in having developed new orders and patterns and having these dependent upon proper signals." Guthrie, E. R. : Conditioning, a theory of Learning in terms of stimulus, response and association. 1942, P. 24.

केवल अन्तर इतना ही है कि यहाँ उनकी संख्या कम है जैसे भवरोध (Inhibition), आदत शक्ति (Habit strength), प्रतिक्रिया शक्यता (Reaction potential) आदि का प्रयोग इस सिद्धान्त में नहीं मिलता। गुबरी में कुछ पद (Terms) को अपने ढंग से परिभाषित किया, जिनका जानना आवश्यक प्रतीत होता है। उद्दीपक भौतिक ऊर्जा (Physical energy) में किसी प्रकार का परिवर्तन है जो ग्राहकों (Receptors) को क्रियाशील बनाता है तथा केन्द्रीय तन्त्रिका तन्त्र में अभिवाही (Afferent) आवेगों (Impulses) को उत्पन्न करता है। तत्सम्बन्धी अनुक्रिया (Response) से असम्बद्ध या पहले से सम्बद्ध उद्दीपक को 'संकेत' (Cue) कहते हैं । 'अनुक्रिया' कुछ पेशियों की गति अथवा ग्रन्थियों के स्राव को कहते हैं। गुथरी ने क्रिया (Action) और गति में भी अन्दर किया है।

            ऑसगुग के अनुसार गुथरी के सिद्धान्त की मूल अवधारणा यह है कि जब भी कोई उद्दीपक किसी अनुक्रिया के सानिध्य में आता है तो वह उस अनुक्रिया से अधिक से अधिक सम्बद्ध हो जाता है । यहाँ यह प्रश्न उठता है कि क्या सीखना एक प्रयास में पूरा हो जाता है ? यदि हाँ तो अधिगम वक्र में क्रमिक वृद्धि क्यों दृष्टिगोचर होती हैं ? इसका उत्तर गुथरी ने यह कहकर दिया है कि कार्य और गति में अन्तर करना चाहिए। कार्य में कई गतियाँ निहित हैं।

            इस अवधारणा में बताया गया है कि साहचर्य किस प्रकार बनता है। दूसरी अवधारणा यह स्पष्ट करती है कि कभी किसी अनुक्रिया से पहले से सम्बद्ध कोई उद्दीपक किसी ऐसी दूसरी अनुक्रिया के सानिध्य में आता है जो पहली के विपरीत हो तो पहले बने हुए साहचयं पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं। 2

            गुथरी के आलोचकों ने आपत्ति उठायी कि उसने यह नहीं स्पष्ट किया कि साहचर्य को स्थापित करने अथवा नष्ट करने के लिए कितने प्रयास आवश्यक हैं इस सम्बन्ध में व्येक्स (Voeks) ने बताया कि एक समय में किसी विशेष अनुक्रिया के घटित होने की सम्भावना उन सभी उद्दीपकों के अनुपात पर

1. "Whenever a stimulus is contiguous with a response, it becomes maximally associated with that response." Osgood, C. E. Ibid, P, 364.

2. “Whenever a stimulus, previously associated with a given response accompanies another response, in- compatible with the first the previous association is completely eliminated." Ibid.

        निर्भर करती है जो उसे अनुक्रिया के लिए किसी अनुबन्धित (Conditioned) अथवा अनुबन्धित ( Unconditioned) संकेतों (Cues) का कार्य करते हैं। ' गुथरी का मुख्य उद्देश्य तार्किक विश्लेषण द्वारा यह प्रमाणित करना था कि केवल सानिध्य साहचर्य द्वारा हर प्रकार के सीखने की उपयुक्त व्याख्या की जा सकती है। जहाँ थार्नडाइक ने सन्तोष की प्राप्ति के आधार पर साहचयों के क्रमिक बलन पर बल दिया था, वहाँ गुथरी ने अपने प्रायोगिक प्रमाणों के आधार पर बिना किसी पुरस्कार, सन्तोष अथवा प्रोत्साहन के भी साहचयों के दृढ़ होने की बात सिद्ध की।

बी. एफ. स्किनट (1904)

            यद्यपि आयु • के दृष्टिकोण से स्किनर, हल और बोलमैन से छोटा था परन्तु व्यवहारवाद के नवीन विकास में सक्रिय समकालिक था। स्किनर ने 'सीखने' से सम्बन्धित वैज्ञानिक प्रयोगों के माध्यम से अनेक व्यवहारवादी सिद्धान्तों को स्थापना की, जिन्हें व्याख्यात्मक व्यवहारवाद की सज्ञा दी जाती है। स्किनर ने व्याख्यात्मक व्यवहारवाद में उन प्रेक्षणात्मक व्यवहारों को सम्मिलित किया, जिनका वैज्ञानिक अध्ययन सम्भव हो। उसने किसी भी आन्तरिक शक्ति जैसे- मध्यवर्ती चर ( Intervening variable) या दैहिक प्रक्रिया (Physiological process) को स्वीकार नहीं किया ।

प्राणी का व्यवहार

            सन् 1938 में प्रकाशित स्किनर की पुस्तक, 'प्राणी के व्यवहार' (The behaviour of organism ) में उद्दीपक एवं प्रतिक्रिया के व्यवहारवादी सिद्धान्तों को स्वीकार करते हुए, व्यवहार को दो रूपों में विभाजित करके अध्ययन किया गया। प्रथम रूप, प्रतिवादी व्यवहार (Respondent behav- iour) है जिसकी उत्पत्ति विशिष्ट प्रोक्षणात्मक उद्दीपक परिस्थिति से होती है। स्किनर के दूसरा रूप, क्रिया प्रसूत व्यवहार (Operant behaviour) है, जो बिना बाह्य उद्दीपनों में ही प्रकट होता है । दूसरे शब्दों में क्रिया प्रसूत

1. "The probability of a particular response occurring at a given time is an increasing monotonic function of the proportion of all stimuli present that are conditio- ned or unconditioned cues for the response In question." Ibid.
व्यवहार की उत्पत्ति इस प्रकार के उद्दीपकों से होती है, जिनका हमें ज्ञान नहीं होता ।

प्रतिवर्त क्रिया (Reflex action)

            स्किनर ने क्रिया प्रसूत व्यवहार की व्याख्या प्रतिवर्त क्रिया के रूप में प्रस्तुत की है। जैसा कि हम जानते हैं कि प्रतिवर्त क्रिया स्वतः होती है तथा इसमें किसी भी निश्चित सचेष्ट उद्दीपक का सहयोग नहीं होता । ठीक इसी प्रकार स्किनर भी क्रिया प्रसूत व्यवहार की व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसका एक मुख्य कारण सम्भवतः यह भी है कि स्किनर उद्दीपक प्रतिक्रिया (SR) पर आधारित व्यवहार प्रक्रिया को एक प्रकार का प्रतिवर्त मानता है । इस नवीन संकल्पना को स्किनर ने इसलिए और भी स्वीकार किया कि व्यवहार का प्रायोगिक अध्ययन स्पष्ट रूप से हो सके । S-R

स्किनर का व्यवहारवादी सूत्र

            व्यवहार को व्यक्त करने के लिए स्किनर ने निम्न सूत्र का सहारा लिया।

R=f (S)
    
            जिसमें R से तात्पर्य है प्रतिक्रिया (Response), S से उद्दीपक तथा से प्रकार्य (Function) अर्थात प्रतिक्रिया उद्दीपक का प्रकार्य है। ध्यान रहे, उद्दीपक में स्किनर ने प्रायोगिक चर (Experimental variable) को सम्मिलित किया है। दूसरे शब्दों में, प्रतिक्रिया तब उत्पन्न होती है, जबकि प्रयोगात्मक अध्ययन में किसी उद्दीपक एवं उससे सम्बन्धित पर्यावरण के नियन्त्रण करते हुए प्रयोगात्मक चर का उपयोग करते हैं।

            अपने प्रयोगात्मक अध्ययन के लिए उसने एक बाक्स का निर्माण किया जो चूहों के अधिगम के अध्ययन में बहुत सहायक सिद्ध हुआ। इसी उपकरण की सहायता से स्किनर ने अनुबन्धन व्यवहार का विशेष अध्ययन किया। स्किनर ने 'अनुबन्धन व्यवहार (Conditioning behaviour) के दो प्रकार बताये-

1. ... functional relations as R =f (s) are esta- blished by observing the covariation of a stimulus 'S' and a response 'R' and each the physical conti- nuity between terms which most scientists prefer." Boring E. G.; A History of Experimental Psychology. P. 650.

1. प्रतिवादी अनुबन्धन व्यवहार ( Respondent conditioning beha viour)-यह व्यवहार सचेष्ट उद्दीपकों से सम्बन्धित अनुबन्धनों के माध्यम से होता है।

2. क्रिया प्रसूत अनुबन्धन व्यवहार (Operant conditioning ) behaviour)—अज्ञान उद्दीपकों से जो अनुबन्धन होता है, उने स्किनर ने क्रिया प्रसूत अनुबन्धन व्यवहार कहा है

            क्रिया प्रभूत व्यवहार की एक मुख्य बात यह है कि क्रिया प्रसूत प्रतिक्रिया को उद्दीपक से बल मिलता हैं जिसे वह पाना चाहता है, जैसे चूहा जब भोजन की खोज में बार-बार प्रतिक्रियाएं करता है तो भोजन उस क्रिया का उद्दीपक तो तब बनता है जब उसे प्राप्त हो जाता है, पर इसके प्राप्त होने के पहले से ही यह उसकी प्रतिक्रियाओं को प्रेरित करता रहता है। भोजन के मिल जाने पर उसकी प्रतिक्रियाएँ पुनर्बलित हो जाती है। अतः क्रिया प्रसूत व्यवहार (Operant conditioning) में प्रतिक्रिया पहले होती है, उद्दीपक बाद में मिलता है। इसीलिए पहले यह कहा गया है कि क्रिया प्रसूत (Operant) व्यवहार में कोई ज्ञान उद्दीपक नहीं होता । दूसरी बात इस सम्बन्ध में यह है कि किया प्रसूत उवहार यन्त्रीय (Mechanical) अथवा नैमित्तिक होता है। विभिन्न प्रकार की अन्य प्रतिक्रियाओं के फलस्वरूप भूल- भुलैया बॉक्स में चूहे को भोजन प्राप्त हो जाता है अतः यह प्रक्रिया नैमित्तिक कही जा सकती है। इसीलिए स्किनर के अधिगम सिद्धान्त को किया प्रसूत (Operant) अनुबन्धन या नैमित्तिक (Instrumental) सीखने का सिद्धान्त कहते हैं। स्किनर के विचारों को आगमनात्मक व्यवहारवाद ( Inductive Behaviourism) भी कहते हैं

स्किनर का व्यवहारवाद में स्थान

            व्यवहारवादी मनोविज्ञान में स्किनर को एक महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है । उसने अनेक नवीन संकल्पनाओं पर जो विचार प्रकट किये, उनका बहुत ही मनोवैज्ञानिक मूल्य है । वुडवर्थ ने स्किनर के प्रतिवर्त सम्बन्धी नवीन व्यवहारवादी व्याख्या को अत्यन्त महत्वपूर्ण योगदान स्वीकार किया है। उसके विचारों से प्रभावित होकर मनोविज्ञान में क्रियावाद (Operationism) के नाम से एक नवीन व्याख्या सिद्धान्त का जन्म हुआ । व्यवहारवाद का योगदान

            व्यवहारवाद में जहाँ अन्तर्दर्शन का अभाव मिलता है वहाँ वस्तुनिष्ठ एवं प्रयोगात्मक अध्ययन पर विशेष बल भी दिखायी पड़ता है । व्यवहार के परम्परावादी अर्थ को व्यवहारवादियों ने स्वीकार नहीं किया । इस सम्बन्ध में उनका कहना था कि चेतना, आत्मा आदि ऐसे सूक्ष्म तत्व हैं, जिनका वस्तुनिष्ठ ढंग से अध्ययन करना सम्भव नहीं है। व्यवहारवादियों ने व्यवहार में दैहिक मनोवैज्ञानिक पक्षों को सम्मिलित करके अध्ययन प्रस्तुत किया। मूल रूप में व्यवहारवादी मनोविज्ञान भौतिक एवं यान्त्रिक है। लैशले एवं टोलमैन ने व्यवहारवादी मनोविज्ञान की विषय सामग्री तथा क्षेत्र को अधिक विकसित करने में उल्लेखनीय योगदान दिया ।

सारांश

            संरचनावाद एवं प्रकार्यवाद की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप वाट्सन के नेतृत्व में व्यवहारवाद की स्थापना एवं विकास हुआ। कुछ प्रारम्भिक व्यवहारवादी भी हुए हैं, जिन्होंने व्यवहारवाद मनोविज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान किया है। इस दिशा में मुख्य रूप से वीस, मेयर, हण्टर आदि के नाम उल्लेखनीय है । नवीन व्यवहारवादियों ने जहाँ व्यवहारवाद के क्षेत्र को अधिक विकसित किया वहाँ सीखने के सम्बन्ध में नवीन एवं मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया, जिनका आधुनिक मनोविज्ञान में बहुत महत्व है। नवीन व्यवहारवादियों में टोलमैन, हल, स्किनर, गुथरी आदि प्रमुख हैं।

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